
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में कोचिंग सेंटर पहले पन्ने पर लगभग नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर छापा है, डूबने से मौत पर एमसीडी की रिपोर्ट खुद को छोड़कर हर किसी पर आरोप लगाती है। अकेले टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने पर सेकेंड लीड है। यहां भी शीर्षक वैसा ही है, पानी भरने के लिए नाले नहीं कोचिंग सेंटर जिम्मेदार है – एमसीडी। अमर उजाला ने चार कॉलम में छापा है, राव कोचिंग सेंटर ने किया ड्रेनेज सिस्टम ब्लॉक। कहने की जरूरत नहीं है, मौतों का ठीकरा कोचिंग इंस्टीट्यूट पर फोड़ दिया गया है। शीर्षकों की मानें तो केंद्र सरकार तो छोड़िये एमसीडी ने भी खुद को बरी कर लिया है। और इस तरह मामला ठंडा हो गया है। इसलिए इसकी खबर नहीं है।
आप यह भी समझ सकते हैं दूसरी बड़ी खबरें हैं इसलिए कोचिंग सेंटर नहीं है। संभव है ऐसा ही हो पर आज हेडलाइन मैनेजमेंट वाली दो खबरें हैं और वो पहले पन्ने पर हैं। वायनाड की खबर अपवाद है। बड़ी संख्या में मौतें हुई हैं, भारी तबाही की खबर है इसलिए पहले पन्ने पर ठीक है। लेकिन बाकी कई खबरों की जगह कोचिंग सेंटर में हादसे की खबर हो सकती थी। कहने की जरूरत नहीं है कि अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है जिससे आश्वस्त हुआ जा सके कि दोबारा मौतें नहीं होंगी। मेरा मतलब बेसमेंट में मौत से है और जरूरी नहीं है कि वह कोचिंग के छात्र ही हों। हालांकि, कम किराया होने के कारण छात्र उनमें रहते हैं तो हादसा हो ही सकता है पर बेसमेंट में गाड़ियां भी क्यों डूबनी चाहिये और बेसमेंट में गाड़ियां नहीं डूबेंगी तो क्या सड़क पर नहीं डूबेंगी। क्या सड़क पर अब पानी नहीं भरेगा। सब उपाय हो गये। सभी दोषियों की शिनाख्त औऱ उन्हें सजा हो गई?
जाहिर है, कुछ नहीं हुआ है। जो गिरफ्तार किये गये हैं वो भी छूट जायेंगे। और एक हादसे के कारण सरकार की छवि पर जो सवाल उठे थे वो अब खत्म हो चले। सरकार और उसके समर्थकों ने मुद्दे को भटका कर खुद को बचा लिया है। मुझे याद नहीं है कि कांग्रेस के जमाने में ऐसा होता था या कांग्रेस के समर्थक मुद्दे को ऐसे घुमाने में लग जाते थे। मैंने पहले भी लिखा है कि मुद्दा यह नहीं था कि बेसमेंट में लाइब्रेरी थी। पार्किंग होता तो गाड़ियों को नुकसान होता। उसके साथ सवारी या चालक होते तो उन्हें भी नुकसान हो सकता था। मुद्दा यह होना चाहिये था कि बेसमेंट में पानी भरा कैसे? और इसका सीधा जवाब था कि सड़क पर पानी भरा था, सीवर जाम थे और बैक फ्लो था। इन कारणों से बेसमेंट में पानी भरना कोई बड़ी बात नहीं है और मौत का कारण पानी भरना था न कि लाइब्रेरी होना। अगर बेसमेंट अवैध है तो पार्किंग के लिए भी नहीं होना चाहिये और है तो पार्किंग में भी पानी नहीं भरना चाहिये।
सरकार, प्रशासन, दिल्ली नगर निगम आदि को छोड़कर मामला कोचिंग संचालकों पर छोड़ दिया गया या उनकी ओर भी मोड़ दिया गया। मुझे आश्चर्य है कि आईएएस की तैयारी करने वालों को यह बात समझ में नहीं आई और वे भी कोचिंग संचालकों के खिलाफ नारे लगाने लगे जबकि आम आदमी पार्टी के एक वीडियो में दिख रहा था कि अधिकारी के पास मंत्री के लिए समय नहीं था। मंत्री किसी भी समय के लिए तैयार थे पर अधिकारी ने कोई पक्का समय नहीं बताया। आम आदमी पार्टी का कहना था कि ऐसे अधिकारी जिम्मेदार हैं और इनके खिलाफ कार्रवाई का अधिकार आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार को नहीं है। मुख्यमंत्री जेल में हैं सो अलग। ऐसे में आम आदमी पार्टी या मुख्यमंत्री को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया और सबको घेरकर केंद्र की भाजपा सरकार को लगभग क्लीन चिट रही। वह भी तब जब दिल्ली की जनता जानती है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देना भाजपा की मांग रही है। अब भाजपा की सरकार है (दस साल से) पर दिल्ली को पूर्ण राज्य का मामला ठंडे बस्ते में है और अब मुख्यमंत्री को जेल भेजकर एलजी के जरिये भाजपा दिल्ली पर राज कर रही है। जनता ने भी दिल्ली ही नहीं, पूरे एनसीआर में भाजपा उम्मीदवारों को चुनाव जिताया है।
दिल्ली के काम में एलजी की दखलंदाजी जग जाहिर है लेकिन एलजी या भाजपा पर उंगली नहीं उठी। यह भी दिलचस्प है कि कुछ लोग कोचिंग संचालकों के लापता होने, उनके चुप रहने या कोई बयान नहीं देने या शोक संदेश जारी नहीं करने पर ताने मार रहे थे। मुझे लगता है कि कोचिंग संचालक भी व्यवस्था के शिकार हैं। भले उनकी मौत नहीं हुई छात्रों की मौत उनके लिए भारी नुकसान और सदमे से कम नहीं होगा। फिर भी उन्हें (दूसरे कोचिंग वालों को भी) जिम्मेदार ठहराया गया। मेरा मानना है कि इन स्थितियों में कोचिंग चलाने के लिए उनकी प्रशंसा करनी चाहिये और फीस ज्यादा है तो उसका कारण समझना चाहिये। जो भी हो, कल कोचिंग संचालकों में से एक का बयान आया था। समस्या के निपटारे के लिए उसमें तर्क संगत बातें हैं और हादसे का कारण है इसलिए आज इसका उल्लेख उसी प्रमुखता से होना चाहिये था जिस प्रमुखता से इस्तीफे की मांग हो रही थी।
दृष्टि आईएएस के विकास दिव्यकीर्ति ने 30 जुलाई 2024 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में शनिवार (27 जुलाई) को राजिंदर नगर स्थित एक कोचिंग संस्थान की बेसमेंट में हुई त्रासद घटना तथा उसके बाद बनी परिस्थितियों पर अपना पक्ष रखने में देरी के लिए खेद जताया है और कहा है, वस्तुतः हम नहीं चाहते थे कि अधूरी जानकारी के आधार पर कुछ कहें। शनिवार की दुर्भाग्यपूर्ण घटना, जिसमें तीन विद्यार्थियों श्रेया यादव, तान्या सोनी और निविन डाल्विन की असमय व दर्दनाक मृत्यु हुई, उनके लिये यदि हम किसी भी तरह कुछ कर सकेंगे तो कृतज्ञता महसूस करेंगे। मुझे नहीं पता है कि सरकार ने अभी ऐसा कुछ करने की पेशकश की है या नहीं। विज्ञप्ति में आगे कहा गया है, इस दुर्घटना को लेकर विद्यार्थियों में जो रोष दिख रहा है, वह पूरी तरह न्यायसंगत है। बहुत अच्छा होगा यदि इस रोष को सटीक दिशा मिले और सरकार कोचिंग संस्थाओं के लिये निश्चित दिशानिर्देश लागू करे। इस संबंध में हम सरकार के साथ सक्रिय सहयोग करने को तत्पर हैं।
विज्ञप्ति में यह भी कहा गया है कि कोचिंग संस्थानों से जुड़ी यह समस्या ऊपर से जितनी सरल दिखती है, उतनी है नहीं। इसके कई पक्ष हैं जिनके तार कानूनों की अस्पष्टता और अंतर्विरोध से जुड़ते हैं। डीडीए, एमसीडी तथा दिल्ली फायर डिपार्टमेंट के नियमों में असंगति है। इसी तरह, ‘दिल्ली मास्टरप्लान-2021’, ‘नैश्नल बिल्डिंग कोड’, ‘दिल्ली फायर रूल्स’ और ‘यूनिफाइड बिल्डिंग बाई-लॉज़’ के प्रावधानों में भी काफी अंतर्विरोध है। ‘दिल्ली मास्टरप्लान-2021’ को छोड़कर किसी भी दस्तावेज़ में कोचिंग संस्थानों के लिये स्पष्ट प्रावधान नहीं दिये गए हैं। जाहिर है यह सब केंद्र सरकार और इस समय जैसी सरकार है उसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही देखना है। पर अखबारों में तो छोड़िये भावी आईएएस और पूर्व में इन्हीं स्थितियों से गुजर कर आईएएस बने लोगों में से किसी ने इसकी परवाह की हो तो मुझे जानकारी नहीं है और इसके बिना स्थिति सुधरने की उम्मीद भी नहीं है। यहां मैं सिर्फ मीडिया की भूमिका की बात करता हूं पर यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
जहां तक कोचिंग इंस्टीट्यूट की बात है, विज्ञप्ति में कहा गया है, हम पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि टीम दृष्टि विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर अत्यधिक सतर्क रहती है। वर्तमान में हमारी मैनेजमेंट में ‘फायर एन्ड सेफ्टी ऑफिसर’ का विशेष पद है जिस पर कार्यरत अधिकारी नैशनल फायर सर्विस कॉलेज (नागपुर) से पढ़े हुए हैं और बड़े अस्पतालों तथा मॉल्स में 14 वर्षों तक यही कार्य कर चुके हैं। वे प्रत्येक भवन का नियमित रूप से सेफ्टी ऑडिट करते हैं। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक भवन के लिये एक-एक अधिकारी की ज़िम्मेदारी होती है कि वह रोज़ सुरक्षा के 16 बिंदुओं को चेक करे और इसकी सूचना ‘बिल्डिंग मेंटेनेंस ग्रुप’ पर अपडेट करे। हमारे क्लासरूम जिन भी भवनों में हैं, उनमें आने-जाने के लिये कम से कम दो रास्ते हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति में बच्चे सुरक्षित निकल सकें।
दृष्टि आईएएस के विकास दिव्यकीर्ति के अनुसार, इस समस्या का स्थायी समाधान यह है कि सरकार दिल्ली में तीन-चार क्षेत्रों को चुनकर उन्हें कोचिंग संस्थानों के लिये नियत करे। अगर सरकार क्लासरूम्स, लाइब्रेरीज़, होस्टल खुद तैयार कराएगी तो न ज़्यादा किराए की समस्या रहेगी और न ही सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों की। इस विषय की जटिलताओं को स्पष्ट करने के लिये हम जल्दी ही एक विस्तृत विश्लेषण (लेख या वीडियो) जारी करेंगे ताकि सभी विद्यार्थियों व अन्य हितधारकों को भी सभी पक्षों का अनुमान हो सके। हमें विश्वास है कि जब सारे पक्ष सामने होंगे, तब समाधान की सही राह निकलेगी। हम विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर और ज़्यादा सतर्क रहने का भरोसा दिलाते हैं। मुझे नहीं लगता है कि इसमें कुछ रह गया है और मामले को समझने में किसी को कोई दिक्कत होनी चाहिये। आज के अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है तो शायद इसलिए भी कि यह उनके लिए आईने की तरह है और उन्हें अपनी खबरों का खोखलापन समझ में आ गया होगा। जहां तक दिल्ली नगर निगम द्वारा दूसरे कोचिंग इंस्टीट्यूट के बेसमेंट सील किये जाने की बात है, मैं उससे सहमत नहीं हूं और वह समस्या का हल नहीं है।
मुझे लगता है कि इन दिनों (पहले भी होती होगी) हर बात में राजनीति होती है और भाजपा या केंद्र सरकार और नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बोलने की हिम्मत या इच्छा किसी की नहीं है। मौके पर सब मन की बात करना चाहते हैं और इसमें जनहित छोड़कर निजी रागद्वेष तो होता ही है, निजी खुंदक और मौके पर हिसाब बराबर करने की इच्छा भी होती है। मैं गलत हो सकता हूं पर संक्षेप में मेरा मानना है कि मामला व्यवस्था का है और अगर इस व्यवस्था में कोचिंग चलाने की स्थितियां नहीं हैं इसलिए कोचिंग नहीं चलाना चाहिये तो यह एक विचार है। जरूरी नहीं है कि हर कोई इससे सहमत हो। सहमत नहीं होने का कारण यह है कि कोचिंग चल इसीलिए रहे हैं कि उनकी जरूरत है और बाजार का सिद्धांत हैं कि मांग है तो पूर्ति भी होगी और पूर्ति कम हुई तो कीमत ज्यादा होगी। सरकार को कीमत का ख्याल रखते हुए पूर्ति बढ़ाने की व्यवस्था करनी चाहिये जो नहीं कर रही है। सिद्धांत रूप में इसकी जरूरत नहीं है तो बंद कर दिया जाये पर वह घोषित रूप से हो। उसका नफा-नुकसान बताते हुए हो। हालांकि आज के समय में आम अभिभावकों के लिए यह संभव नहीं है कि वे खर्च करके, मेहनत करके, बच्चों को योग्य बनाकर, सुविधायें देकर आईएएस बना ही दें। कोचिंग भी गारंटी नहीं है और दूसरी ओर अंजलि बिड़ला और पूजा खेदकर जैसे सफल उम्मीदवार हैं।
जाति जनगणना से परेशानी
जहां तक आज की बाकी खबरों की बात है जाति जनगणना को अनुराग ठाकुर ने मुद्दा बना दिया है। प्रधानमंत्री ने उनके वीडियो को ट्वीट करके उसकी प्रशंसा की ही है और इस तरह राजनीति को भाजपा के पक्ष में करने की कोशिश चल रही है। जाति का मुद्दा भाजपा के लिए कितना महत्वपूर्ण है इसे इससे समझिये कि नीतिश कुमार ने बिहार में जाति जनगणना करा दी और इंडिया गठबंधन की तैयारी शुरू हुई तो भाजपा ने उन्हें अपने पाले में कर लिया। यह भाजपा और नीतिश कुमार की राजनीति है पर प्रधानमंत्री इसे व्यंग कह रहे हैं और रमेश बिधूड़ी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो अनुराग ठाकुर का पूरा समर्थन किया गया। महुआ मोइत्रा कह चुकी हैं कि भाजपा को इस राजनीति का नुकसान हुआ उन्हें सजा देने वाले ज्यादातर सांसद दोबारा नहीं जीते। इसलिए भाजपा और प्रधानमंत्री जो कर रहे हैं उसे समझिये। साफ दिख रहा है कि हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले जाति प्रथा के खिलाफ नहीं हैं।
बजट का हलवा आज की दूसरी खबर बजट के हलवे पर है। वित्त मंत्री ने कहा है कि हलवा समारोह की आलोचना करना कर्मचारियों का अपमान है। नवोदय टाइम्स ने इसे इसी शीर्षक से पहले पन्ने पर छापा है। मुझे लगता है कि हलवा समारोह की आलोचना किसी ने नहीं की है। फिर भी वित्त मंत्री को अधिकार है कि वे अपने किये का बचाव करें। अमर उजाला में शीर्षक है, बजट पर दुष्प्रचार भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने की साजिश है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने शीर्षक लगाया है, विकसित भारत को पटरी से उतारने की साजिश है आलोचना। हालांकि, आज हावड़ा मुंबई मेल के पटरी से उतरने और इसमें दो लोगों की मौत की खबर भी है। अखबारों ने इस खबर को बजट के बचाव से ज्यादा महत्व दिया है।


