विष्णु नागर-
हिंदी अखबार कितने संवेदनहीन हो चुके हैं, इसकी बानगी तरह- तरह से मिलती रहती है। आज ही ‘दैनिक भास्कर ‘ की तीन कालम में एक हेडलाइन है- ‘ 26 बड़े हमलों का मास्टर माइंड एक करोड़ का ईनामी नक्सली हिड़मा ढेर।’ ढेर शब्द पर गौर कीजिए।
जो मारा जा चुका उससे भी पाठक नफ़रत करें, इसके लिए उसके नाम के आगे कितने विशेषण लगाए गए हैं!

संपादक जी आपके अखबार का काम पहले पेज पर खबर देना है, अपनी राय नहीं। नक्सलवाद के बारे में आपकी राय के लिए आपके पास आठ कालम का संपादकीय पृष्ठ है। उस पर लिखिए बल्कि उसके सामने के पेज पर भी लिखिए-नक्सलवाद के खिलाफ, कौन रोकता है? आपका, आपके मालिक का अखबार है। पाठक भी आपके हैं लेकिन एक आदमी मारा जा चुका है, उसे हाड़- मांस का इंसान होने की इज्जत तो बख्शिए! कोई कुत्ता भी मारा जाता है तो आप इस तरह नहीं लिखते!
यही एक नहीं इस तरह की अनेकानेक खबरों के शीर्षक इसी तरह के छपते हैं। इंसान के इंसान होने की तमीज तो बचाकर रखिए संपादक जी! वह होगा बड़े हमलों का मास्टर माइंड, उस पर रखा होगा, सरकार ने एक करोड़ का ईनाम! आपके अखबार को भी नफ़रत है नक्सलवाद से, हिड़मा से मगर फिर भी आप तो इंसानी तमीज तो मत छोड़िए, बुनियादी मानवीय समझ से तो अपने को रिक्त मत कीजिए! इंसान को कम से कम इंसान तो समझिए, चाहे वह कोई हो!
ज़रा अंग्रेजी अखबार देखिए। वे भी नक्सलवाद के समर्थक नहीं हैं मगर वे खबर को खबर रहने देते हैं। वे भी सरकार समर्थक हैं, नरेन्द्र मोदी को व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित करते हैं मगर इंसान की मौत पर खुशी का इजहार नहीं करते! इंसान कोई भी हो, किसी विचारधारा का हो, उसका मरना या मार दिया जाना खुशी का विषय नहीं बनाया जा सकता। इसे पुलिस राज्य बनाने में आगे बढ़कर सहयोग मत दीजिए। सरकार और पुलिस से अपने को एकमेक मत कीजिए। फिर आपका तो दावा भी है कि आप सच्ची बात बेधड़क कहते हैं! कहते हैं न! मत कहिए मगर इंसान को इंसान तो रहने दीजिए।
हमारे प्रधानमंत्री जी को तो कांग्रेस भी अर्बन नक्सली नजर आती है, लीगी- माओवादी नज़र आती है, क्या कीजिएगा!



Raj
November 20, 2025 at 4:04 pm
अब समझ में आया कुछ लोग लादेन जी कसाब जी और हमारे दस सैनिकों की हत्या करने वाले को कुछ लोग यासीन मलिक साहब क्यों कहते हैंl
Atul Gupta
November 22, 2025 at 10:29 pm
Urban Naxaliyon ka BAAP mara gaya hai. Sabhi se nivedan hai ki jale par namak chhidken.