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बॉम्बे हाईकोर्ट में दैनिक भास्कर की शिकस्त, पत्रकार के पक्ष में फैसला हुआ, पढ़ें आदेश!

मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने दैनिक भास्कर प्रबंधन (D.B. Corp Ltd.) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए पत्रकार धर्मेंद्र प्रताप सिंह के पक्ष में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने श्रम न्यायालय (Labour Court) के उस निष्कर्ष को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि कंपनी द्वारा कराई गई आंतरिक जांच (Enquiry) के निष्कर्ष ‘perverse’ यानी तथ्यहीन और असंगत थे।

यह आदेश न्यायमूर्ति मनीष पिताले की एकल पीठ ने 23 दिसंबर 2025 को पारित किया।

क्या था मामला?

दैनिक भास्कर प्रबंधन ने धर्मेंद्र प्रताप सिंह की सेवाएं 24 सितंबर 2019 को समाप्त कर दी थीं। इसके पहले कंपनी द्वारा एक विभागीय जांच कराई गई थी, जिसमें लगाए गए आरोपों को सही ठहराया गया था।

हालांकि, इस बर्खास्तगी के खिलाफ श्रम न्यायालय में चले संदर्भ (Reference) में—Part-I Award (04 अप्रैल 2025) में। यह तो माना गया कि जांच प्रक्रिया औपचारिक रूप से सही थी, लेकिन जांच अधिकारी के निष्कर्षों को “perverse” करार दिया गया, यानी वे साक्ष्यों से मेल नहीं खाते थे।

इसी निष्कर्ष को चुनौती देते हुए दैनिक भास्कर प्रबंधन हाईकोर्ट पहुंचा था।

हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा—श्रम न्यायालय ने गवाहों और सबूतों का समुचित मूल्यांकन किया। प्रबंधन के गवाह आरोपों को साबित करने में असफल रहे। जिन व्हाट्सऐप मैसेजों को आधार बनाया गया, वे चार्जशीट जारी होने के बाद की अवधि के थे, इसलिए वे आरोपों को साबित नहीं करते। सिर्फ इसलिए कि श्रम न्यायालय ने संक्षिप्त आदेश दिया, उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) के सीमित दायरे में इस मामले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

याचिका खारिज

इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा—“प्रबंधन इस मामले में श्रम न्यायालय के निष्कर्षों को पलटने के लिए आवश्यक उच्च मानक (High Threshold) को पूरा करने में असफल रहा है।”

अंततः अदालत ने—दैनिक भास्कर की रिट याचिका खारिज कर दी। इसके अलावा सभी लंबित अंतरिम अर्ज़ियां भी समाप्त कर दीं।

कानूनी स्थिति

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि—प्रबंधन को Part-II Proceedings में अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने का अवसर कानून के तहत उपलब्ध रहेगा लेकिन Part-I Award, जिसमें जांच रिपोर्ट को तथ्यहीन बताया गया है, वह पूरी तरह बरकरार रहेगी।


इस मामले में पत्रकार रतन भूषण जी लिखते हैं-

दैनिक भास्कर तो गयो!

अब तेरा क्या होगा कालिया! माफ कीजियेगा, चूंकि एक बार फिर फिल्म शोले नए लुक के साथ लोगों के बीच आई है, तो हमने भी उसके एक संवाद को लिख दिया। वैसे आप सब कालिया की जगह दैनिक भास्कर पढ़िए। मतलब तेरा क्या होगा दैनिक भास्कर!

आपका सवाल हो सकता है कि क्यों? तो संलग्न आदेश का पहला और आखिरी पन्ना देख लें, जो आज ही आया है, के मुताबिक माननीय उच्च न्यायालय बॉम्बे ने हमारे वर्कर भाई धर्मेंद्र प्रताप सिंह के पक्ष में आदेश सुनाया है।

मालिकान यानी दैनिक भास्कर झूठ का पुलिंदा लेकर माननीय के पास गया था। इस नीयत से कि टाइम खींचा जा सके। माननीय ने तर्क के साथ उसे डिसमिस कर दिया। आदेश को आप खुद भी पढ़ समझ सकते हैं। आदेश 19 पन्ने का है।

हम बचपन से यह कहते आ रहे हैं कि धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो…। वक्त आ गया है, वर्कर की जय तय है, अखबार मालिकों का नाश भी निश्चित है। जय संविधान, जय हिंदुस्तान…

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