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दैनिक जागरण के दफ्तर में ऐसे कई चेहरे रोज देखता था, गहरी हताशा में डूबे हुए!

पंकज मिश्रा-

2003 में अमर उजाला में नौकरी मांगने वीरेन सर के पास गया था। बरेली के सिविल लाइंस वाले घर में वे अपने उसी बेतकल्लुफ अंदाज़ में मिले, जैसे फिर हमेशा मिलते रहे। मेरे बारे में विस्तार से पूछा। मैंने बताया कि पीएचडी कर रहा हूँ तो वे अचानक थोड़ा गंभीर हो गए। उस समय तक उनकी बातचीत से मुझे लगने लगा था कि नौकरी लगभग तय है।

लेकिन पीएचडी सुनते ही उन्होंने कहा— “अभी संघर्ष करो, तुम्हारे पास मौका है। अखबार में नौकरी तुम्हारे जैसे युवा को कभी भी मिल जाएगी।”

उन्होंने नौकरी देने से साफ़ इंकार कर दिया। उस समय बुरा लगा। लगा— खुद संपादक बनकर जलवा लूट रहे हैं और मुझे ज्ञान दे रहे हैं। खैर, मैं भी जलवा लूटने दैनिक जागरण आ गया। नौकरी मिल गई। फिर अमर उजाला, हिंदुस्तान में टहलते हुए 2016 में पत्रकारिता को आखिर सलाम बजाकर निकल आया।

अखबार की नौकरी के दौरान बहुत-से साथियों को विपन्नता में देखा, लेकिन बातें लाट साहबों जैसी करते थे। अजीब नशा था, जो आदमी को जमीन पर उतरने ही नहीं देता था। बहुत-सी बातें अब याद आती हैं। जिन सलाहों को उस समय नहीं माना, उनमें डंगवाल जी की बात भी थी— और उसका अफसोस अब कहीं भीतर बना रहता है।

कल से दो पत्रकारों के न रहने की खबरें तैर रही हैं। एक ने परेशान होकर सु साइड किया था। मैं दोनों को नहीं जानता था, लेकिन दैनिक जागरण के दफ्तर में ऐसे कई चेहरे रोज देखता था, गहरी हताशा में डूबे हुए। जैसे किसी भूल का पश्चाताप करते हों। उन्हें देखकर कई बार सोचता था– कहीं यही मेरा भविष्य तो नहीं।

निर्जीव चीजों से आखिर कितना मोह। सब माया है। जितना उसके ठगे जाने से बच जाएँ, उतना अच्छा। एक-एक कर बहुत कुछ छोड़ता गया— नौकरियाँ, नौकरियों जैसे रिश्ते-नाते, और दूसरों को खुश रखने की वह वेश्यावृत्ति भी।

जो जब तक साथ है, ठीक है। नहीं रहेगा, तब भी शायद ठीक ही होगा। बस, तकलीफदेह जगहों से जितनी जल्दी हो सके, पीछा छुड़ा लेना ठीक है।

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