दीपाली पोरवाल-
10 साल बेमिसाल: आज मुझे जॉब करते हुए 10 साल पूरे हो गए. कल जब पापा को याद दिलाया तो उन्होंने कहा कि 10 साल लगातार कहो. दरअसल, मैंने बीच में कभी ब्रेक नहीं लिया. अगर आज नोटिस पीरियड ख़त्म हुआ है तो बस कल से नई जगह पर जॉइनिंग वाला सीन रहा हमेशा. 10 साल सुनने में कम लग सकते हैं, यह सफ़र बहुत छोटा लग सकता है लेकिन ऐसा है नहीं. इन 10 सालों में प्रिंट से डिजिटल मीडिया का हाथ थाम लिया, कोविड देख लिया, अब AI भी देख रहे हैं.
पहले रेमिंग्टन से मंगल टाइपिंग सीखने का दबाव रहता था, quark से indesign पर आने का प्रेशर था, लेकिन अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में अपनी मौलिकता को बरक़रार रखने की जंग है.
ख़ैर, यह तो हो गया कि मीडिया कितना बदला. लेकिन आज बात इसकी नहीं, मेरी है. ठीक 10 साल पहले यानी 1 जून 2015 को ग्रेजुएशन फाइनल ईयर की यह लड़की जब कानपुर से नोएडा के जागरण सखी ऑफिस पहुंची तो सब इसे देखकर चौंक गए थे. वजह वाज़िब थी, यह तो बहुत छोटी है, सखी के सीरियस आर्टिकल कैसे लिखेगी?
जल्दी जल्दी काम सीखा, इंटर्नशिप के बाद मास्टर्स की पढ़ाई का प्लान था. लेकिन कुछ मुझे यहां अच्छा लगने लग गया और कुछ लोगों को भी मैं अच्छी लगने लगी. सखी में एक पोजिशन वेकेंट हुई और मुझे भी इंटरव्यू के लिए भेज दिया गया. ज्यादा उम्मीद नहीं थी, मन में डर भी था, वो मेरी लाइफ का फर्स्ट इंटरव्यू जो था. सखी की एडिटर प्रगति गुप्ता जी (संजय गुप्ता जी की वाइफ) से मुलाक़ात हुई. उन्होंने कुछ सवाल पूछे, मेरे कुछ बायलाइन आर्टिकल्स के बारे में पूछा.
उन्हें समझ में आ गया कि कॉलेज गोइंग गर्ल पेरेंटिंग से लेकर गार्डनिंग और घर में स्टोरेज एरिया कैसे बनाएं तक सब लिख ले रही है. फिर बात आई फैशन, ब्यूटी और इंग्लिश आर्टिकल्स की. सखी के साथ 16 पन्नों का एक सप्लीमेंट जाता था, Delhi Desire, जिसके आधे से ज्यादा पेजेस इंग्लिश या हिंग्लिश में थे. फिर बात आई सैलरी पर, न खोने का डर था, न पाने की कुछ उम्मीद. 20 हजार बोलकर निकल आए.
डेस्क पर वापस आए तो पता चला कि 7-8 साल एक्सपीरियंस वाले लोग भी 15 हजार सैलरी तक बोल कर आए हैं. थोड़ा अफ़सोस हुआ पर फिर मास्टर्स का प्लान याद आया और बात आई गई हो गई. उसके बाद प्रगति मैम ने मेरा फीडबैक लिया होगा. पूरी तसल्ली के बाद नौकरी पक्की हो गई.
सखी मैगज़ीन और जागरण फीचर की टीम एक साथ बैठती थी. वो सब बहुत अनुभवी थे. उनमें से कई के बच्चे मेरी उम्र के या मुझसे 1-2 साल छोटे थे. ऐसे में लाड-प्यार, सलाह-मशविरा सब मिलता था वहां. आज मैं जो हूं, लिखना-पढ़ना, फीचर गढ़ पाना, हार्ड न्यूज़ को फीचर में बदल पाना… जो कुछ भी जानती हूं, सब सखी और फीचर टीम की देन है.
इन 10 सालों के सफ़र में हर तरह के लोगों से मेल-जोल हुआ. कुछ 10 सालों से अभी तक हर कदम पर साथ हैं, कुछ कहीं छूट गए हैं. इस 1 दशक में मीडिया इंडस्ट्री में बहुत बदलाव आए, आगे भी आते रहेंगे.. हर बदलाव के साथ हम लोग भी शुरुआती दौर की तरह नौसिखिया बन जाते हैं. सीखने, पढ़ने और लिखने की चाहत बरक़रार रहे और आप लोगों का साथ बना रहे, ज़िंदगी बस इतनी है.
हां, शुरुआत में सब कहते थे कि साल-2 साल का शौक है, ज्यादा दिन काम नहीं कर पाओगी. आज मीडिया में जॉब करते हुए 3,653 दिन हो गए. इस बीच दैनिक जागरण से POPxo हिंदी गए, फिर ज़ी न्यूज़ और अब न्यूज़18 में हूं नोएडा से काम किया, दिल्ली और गुरुग्राम से भी, वर्क फ्रॉम होम मिल जाने पर कानपुर से काम किया और कुछ वक्त मुंबई में भी गुज़ारा. ऑफिस डेस्क से लेकर बेड पर लेटकर काम करने और समुद्र किनारे नारियल पानी पीते हुए तक, हर तरह से ख़बरें फाइल करने का पूरा अनुभव है.
इस सफ़र के कुछ यादगार पल बीच-बीच में शेयर करती रहूंगी.. यादों की पोटली खुल गई है तो अब खजाना बांटना भी ज़रूरी है.



Reynold Paul
June 9, 2025 at 9:44 pm
ईश्वर खूब बरकत दे।