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उत्तर प्रदेश

खेवली में मनाई गयी धूमिल जी की जयंती

वाराणसी : जंसा क्षेत्र के खेवली गाँव में कल दिन भर बड़ी चहल पहल रही, बड़ी संख्या में साहित्यकार, कवि, लेखक और सामजिक कार्यकर्त्ता जुटे थे. वजह थी इस गाँव में ही जन्म लिए समकलीन कविता के स्तम्भ जन कवि स्व सुदामा पाण्डेय की जयंती. वे अपनी कविताएँ “धूमिल” उपनाम से लिखते थे.मात्र 38 वर्ष की ही कुल अवस्था में उन्होंने अनेक काव्य संग्रहों की रचना की और साहित्य में अमर हो गए.धूमिल जी का जन्म खेवली में हुआ था. खेवली में सुबह से ही आस पास के गाँव के बच्चे उनके निवास पर एकत्र होने लग गये थे.श्रम दान द्वारा गाँव में साफ़ सफाई की गयी. 10 बजे से एक सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता आयोजित हुयी जिसमे उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले 20 बच्चो को एक सामाजिक संस्था “आशा” ट्रस्ट द्वारा रोचक बाल साहित्य देकर पुरस्कृत किया गया.

वाराणसी : जंसा क्षेत्र के खेवली गाँव में कल दिन भर बड़ी चहल पहल रही, बड़ी संख्या में साहित्यकार, कवि, लेखक और सामजिक कार्यकर्त्ता जुटे थे. वजह थी इस गाँव में ही जन्म लिए समकलीन कविता के स्तम्भ जन कवि स्व सुदामा पाण्डेय की जयंती. वे अपनी कविताएँ “धूमिल” उपनाम से लिखते थे.मात्र 38 वर्ष की ही कुल अवस्था में उन्होंने अनेक काव्य संग्रहों की रचना की और साहित्य में अमर हो गए.धूमिल जी का जन्म खेवली में हुआ था. खेवली में सुबह से ही आस पास के गाँव के बच्चे उनके निवास पर एकत्र होने लग गये थे.श्रम दान द्वारा गाँव में साफ़ सफाई की गयी. 10 बजे से एक सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता आयोजित हुयी जिसमे उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले 20 बच्चो को एक सामाजिक संस्था “आशा” ट्रस्ट द्वारा रोचक बाल साहित्य देकर पुरस्कृत किया गया.

इसके बाद एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय था “दूसरे प्रजातंत्र की तलाश और धूमिल”. गोष्ठी के पूर्व धूमिल जी के चित्र पर उनकी धर्मपत्नी श्रीमती त्रिमूर्ति देवी सहित अन्य लोगों ने माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की. गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा की आज 4 दशक बाद धूमिल की रचनाएँ सामयिक और व्यवहारिक लगती हैं. प्रजातंत्र में आम आदमी की व्यथा और दुर्दशा को धूमिल ने ह्रदय से महसूस किया और उनकी लेखनी में उसका सजीव चित्रण भी दीखता है.उन्होंनेउपनी रचनाओं में लोकतंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और व्यवस्था की खामियों पर बड़ी बेबाकी से प्रहार किया.वे छाहते थे की कविताओं का इस्तेमाल जनता की भाषा में होना चाहिए. धूमिल आम आदमी की समस्याओं का जिक्र अपनी कविताओं में प्रभावशाली ढंग से करते थे.  वक्ताओं में प्रमुख रूप से प्रो श्रद्धानंद जी, प्रो शिव कुमार मिश्र, डा सदानंद मिश्र, डा गोरख नाथ पाण्डेय, डा रमाकांत राय, श्री प्रकाश राय, हौसिला प्रसाद, अशोक पाण्डेय, रत्न शंकर पाण्डेय, प्रभाकर सिंह, अभिलाष सिंह, संतोष कुमार सिंह, देवी शरण सिंह आदि विचारक, लेखक और साहित्यकार शामिल थे

गोष्ठी के बाद बच्चो द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए किये गए.आशा सामाजिक विद्यालय के बच्चों ने पंचायती प्रणाली में महिलाओं के नेत्रित्व की जरूरत को उजागर करने वाला नाटक ” किसनी की जीत” प्रस्तुत कर सभी को प्रभावित किया. धूमिल जयंती समारोह का आयोजन धूमिल शोध संसथान,  विवेकानंद काशी जन कल्याण समिति, सझासंस्कृति मंच, आशा ट्रस्ट, लोक समिति, धूमिल जन संपर्क समिति और स्थानीय निवासियों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था.

कार्यक्रम के आयोजन में प्रमुख रूप से मनीष कुमार, राम कुमार, आनंद शंकर पाण्डेय, कन्हैया पाण्डेय, अशोक पाण्डेय, धनञ्जय त्रिपाठी, प्रदीप सिंह, दीन दयाल सिंह, राजबली वर्मा, नंदलाल मास्टर, सुरेश राठोर, सूरज पाण्डेय, इंदुशेखर सिंह आदि का विशेष योगदान था.

भवदीय:
वल्लभाचार्य पाण्डेय
साझा संस्कृति मंच

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