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सुख-दुख

डायबिटीज को गंभीरता से लें अन्यथा किडनी फेल होने का खतरा है!

यशवंत सिंह-

भाभी की तेरहवीं कल थी। इसमें वो डॉक्टर भी आए जिन्होंने भाभी का लंबे वक्त तक इलाज किया। ऊपर की तस्वीर में दाहिने मेरे साथ डॉ डीके वर्मा हैं। गाजीपुर की जान हैं क्योंकि मरीजों के लिए ये भगवान हैं। बलिया के निवासी हैं। गाज़ीपुर में मेडिकल कॉलेज में सेवारत हैं। केजीएमसी लखनऊ से इन्होंने पढ़ाई और ट्रेनिंग की। एमडी हैं। बेहद विनम्र और सेंसिटिव।

शनिवार रविवार दो दिन के लिए ये अपने गांव चले जाते हैं और वहाँ गांव में ही बीमारों को देखना शुरू कर देते हैं। ये अदभुत सेवा भावना है। अपनी जमीन से प्रेम है। जड़ों से जुड़ाव है।

डॉक्टर डीके वर्मा के बारे में मुझे लगातार सकारात्मक फीडबैक भाभी के पुत्र दिग्विजय सिंह देते रहे। इससे मेरी धारणा बनी कि ग़ाज़ीपुर जिले को एक अच्छा डॉक्टर मिला है।

भाभी का केस डॉ डीके वर्मा ने बहुत संजीदगी से हैंडल किया। कई वर्ष से वे इन्हीं डॉक्टर के कारण ज़िंदा रहीं। लाखों रुपये इनके कारण बचे क्योंकि मेडिकल कॉलेज में इलाज और डायलिसिस सब बेहद मामूली दाम पर हुआ।

हर दिन बिगड़ती बनती सेहत को मैनेज करते रहे। हाई शुगर, हाई ब्लड प्रेशर समेत कई समस्याओं के कारण किडनी का ट्रीटमेंट बहुत सम्भाल के करते रहे।

भाभी को बीच में किसी के कहने पर डॉ विश्वरूप रॉय चौधरी के आयुर्वेदिक सेंटर लखनऊ में भर्ती कराया गया जहाँ पैसा और सेहत दोनों बर्बाद हुआ। लगा कि बचेंगी ही नहीं। डॉ डीके वर्मा ने देखना शुरू किया और सब कुछ सही कर दिया। डायलिसिस हफ़्ते में दो दिन होती रही। बाद में मल्टी ऑर्गन फ़ेल्योर होने लगा और नहीं बचीं।

डॉक्टर डीके वर्मा से इलाज के दौरान भाभी और उनके परिवार का भावनात्मक जुड़ाव हो गया। एक तरह से फ़ेमिली मेम्बर जैसे हो गए थे। तभी वो तेरहवीं में आए। अन्यथा कौन डॉक्टर किसी मरीज़ के गुज़र जाने पर उसकी तेरहवीं में जाता है।

डॉ डीके वर्मा से कल मैंने विस्तार से बात की। किडनी फेल्योर की बढ़ती घटनाओं पर उनसे पूछा तो साफ़ कहा कि डायबिटीज के कारण ऐसा होने लगा। डायबिटीज हर उम्र के लोगों को होने लगी है और बहुत से लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। अंततः किडनी पर असर पड़ने लगता है। डायबिटीज हो जाने के बाद लाइफस्टाइल बिल्कुल चेंज कर देने की आवश्यकता है।

रोजाना तीन चार सौ पेशेंट गाजीपुर मेडिकल कॉलेज में देखने वाले डॉ डीके वर्मा से मैंने पूछा कि यहां काम करते हुए किसी किस्म का प्रेशर महसूस करते हैं?

जवाब में उन्होंने बताया कि मरीजों के लोकल होने का एक प्रेशर होता है। विश्वास का बड़ा संकट है। इलाज में हमें दस हज़ार रुपये का इंजेक्शन भी लगाना पड़ता है। मान लीजिए इस महंगे इंजेक्शन को लगाने के बाद भी मरीज़ को न बचा पाए तो मरीज़ के घर वाले डॉक्टर को खलनायक मान रियेक्ट करने लगते हैं। केजीएमसी लखनऊ में मरीज दूर-दूर से आते हैं इसलिए हम लोग बिना किसी दबाव में काम वहाँ कर पाते थे। वहाँ आए मरीज डॉक्टरों पर ट्रस्ट करते हैं। यहाँ ग़ाज़ीपुर में लोकल मरीज़ होते हैं तो हम लोग थोड़ा दबाव तो महसूस करते हैं। इलाज के दौरान बड़े और कड़े निर्णय लेने के दौरान कई बार सोचना पड़ता है।

डॉक्टर डीके वर्मा का फीडबैक मेरे लिए बहुत कीमती रहा। अगर आपको यकीन है कि डॉक्टर अच्छा है तो उस पर भरोसा करना चाहिए। उन पर दबाव नहीं बनाना चाहिए। इलाज के दौरान सारे निर्णय लेने की छूट देनी चाहिए।

डीके वर्मा जैसे डॉक्टर ग्रामीण इलाकों से आए ग़रीब मरीजों के लिए भगवान ही होते हैं। आज के युग में विशेषज्ञ डॉक्टर से बिल्कुल सस्ता और एकदम शानदार इलाज पाना बड़ी बात है। तभी तो गाजीपुर वाले डॉ डीके वर्मा को अपनी जान मानने लगे हैं। जान है तो देह ज़िंदा है और देह स्वस्थ है तो सब कुछ मंगल है। इसी देह में जान को क़ायम रखने वाले डॉक्टर हैं डीके वर्मा तो इन्हें जिले की जान कहना अतिशयोक्ति नहीं!

जै जै

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