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डिजिटल युग और पत्रकारिता का बदलता चेहरा: सत्ता, तकनीक, भीड़ के नए सवाल

मनोज अभिज्ञान-

आज मीडिया जिस मोड़ पर खड़ा है, वह सिर्फ तकनीकी बदलाव की कहानी नहीं है। यह हमारे समय का बौद्धिक और नैतिक संकट भी है। दुनिया भर में दार्शनिकों, संचार सिद्धांतकारों और लोकतंत्र चिंतकों के बीच साझा बेचैनी दिखती है कि सूचना अब पहले जैसी नहीं रही। वह सत्ता के नए रूप गढ़ रही है, हमारे देखने की दिशा तय कर रही है, और ऐसी भीड़ बना रही है जो अलग-अलग टुकड़ों में बंटी है, लेकिन अपनी-अपनी आवाज़ को ही अंतिम मानने पर उतारू है। मीडिया, तकनीक और समाज के इस जटिल अंतरसंबंध पर वैश्विक चर्चा लगातार तेज हुई है, और इसका सबसे अहम हिस्सा तीन बड़े मुद्दों पर केन्द्रित है: मीडिया में सत्ता के नए रूप, एल्गोरिद्म की चुनौती, और डिजिटल भीड़ की नैतिकता।

दुनिया भर में यह मान्यता तेजी से मजबूत हुई है कि पत्रकारिता अब सिर्फ राज्य या राजनीतिक दलों से प्रभावित नहीं होती। सत्ता अब ज्यादा बारीक और अमूर्त रूप में मौजूद है। आज सूचना पर वास्तविक नियंत्रण टेक कंपनियों, प्लेटफॉर्म मालिकों, विज्ञापन मॉडलों और डेटा आधारित बाजार के पास है। यह सत्ता न तो हमेशा दिखाई देती है, और न ही पारंपरिक तरीके से जवाबदेह है। विचारकों का कहना है कि एक समय था जब मीडिया को चौथा खंभा कहा जाता था। लेकिन डिजिटल अर्थव्यवस्था के आने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि यह खंभा अब किसके सहारे खड़ा है। दुनिया भर के शोध इस बात की ओर इशारा करते हैं कि बड़ी टेक कंपनियों ने समाचार वितरण की प्रकृति को ही बदल दिया है। किसी भी प्रकाशन की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि वह कितनी गहरी रिपोर्टिंग करता है, बल्कि यह कि उसका कंटेंट प्लेटफॉर्म पर कैसा परफ़ॉर्म करता है।

इस बदलाव ने पत्रकारिता के मूल चरित्र को प्रभावित किया है। जनता की आवाज़ उठाने का पुराना नैतिक आधार टूटता सा दिखता है। सत्ता अब सेंसरशिप के खुले रूप में नहीं आती। वह रूप बदलकर हमारे “अटेंशन” को नियंत्रित करने लगी है। किस चीज़ पर हम रुकें, किस पर प्रतिक्रिया दें, और किससे विचलित हो जाएँ—अब इन सब पर एक अदृश्य ढांचा काम करता है। सूचना का यह नया तंत्र दुनिया की समझ को सरल बनाकर नहीं, उलझाकर पेश करता है। यह केवल बताता नहीं, दिशा देता है। यह निर्णय नहीं करता, बल्कि निर्णय लेने की प्रवृत्ति को प्रभावित करता है।

डिजिटल युग में खबरें सिर्फ लिखी नहीं जातीं, चुनी भी जाती हैं—और यह चयन अब इंसानों से अधिक एल्गोरिद्म करते हैं। यह बदलाव जितना तकनीकी लगता है, उतना ही वैचारिक है। कारण यह कि एल्गोरिद्म अब पहचान, झुकाव और दिशा बनाते हैं, और विडंबना यह है कि यह दिशा हमेशा वास्तविकता की दिशा नहीं होती।

दुनिया भर में यह चिंता बढ़ी है कि एल्गोरिद्म वस्तुनिष्ठ नहीं होते। वे तटस्थ निर्णय नहीं लेते। उन्हें डेटा सिखाता है, और डेटा वही होता है जो पहले से जमा है—यानी हमारी आदतें, हमारी पसंद, हमारा इतिहास। एल्गोरिद्म उसी को लौटाते हैं, और बार-बार लौटाते हैं। इससे एक तरह की ‘सूचना प्रतिध्वनि’ (Information Echo) बनती है, जिसमें व्यक्ति उन चीजों को ही बार-बार देखता है जिनसे वह पहले से ही सहमत है।

वास्तविकता अब बाहर नहीं, बल्कि स्क्रीन पर बनती है। टेक कंपनियों की यह प्रक्रिया सत्य के लिए नहीं, उपयोगकर्ता की ‘एंगेजमेंट’ के लिए काम करती है। इसका नतीजा यह है कि पत्रकारिता की जगह अब ‘कंटेंट’ ने ले ली है, और कंटेंट की गुणवत्ता सत्य से नहीं, बल्कि क्लिक और समय से मापी जाती है।

एल्गोरिद्म के कारण समाज के भीतर कई अलग-अलग विश्व बनने लगे हैं। दो लोग एक ही घटना को बिल्कुल अलग तरह से देख सकते हैं, क्योंकि उनकी स्क्रीन उन्हें अलग-अलग व्याख्याएँ दिखाती हैं। यह सिर्फ सूचना का विभाजन नहीं है; यह अनुभव का विभाजन है।

दुनिया भर में यह व्यापक चिंता उभरी है कि जब अनुभव ही विभाजित हो जाए, तो लोकतंत्र किस आधार पर टिकेगा? संवाद कैसे होगा? असहमति का क्या अर्थ बचेगा?

डिजिटल दुनिया ने एक नई किस्म की भीड़ पैदा की है। यह भीड़ सड़क पर नहीं उतरती, लेकिन स्क्रीन पर हमेशा मौजूद रहती है। यह भीड़ त्वरित प्रतिक्रिया देती है, और कुछ क्षणों में एक विचार को नायक और दूसरे को खलनायक बना देती है। यह भीड़ तर्क से अधिक भावनाओं पर चलती है, और अपनी भावनाओं को नैतिक अधिकार मानती है।

पत्रकारिता पर वैश्विक विमर्श अब इस बिंदु पर सबसे ज्यादा चिंतित है। सवाल यह नहीं है कि लोग आवाज़ उठा रहे हैं, बल्कि यह है कि यह आवाज़ कितना न्यायपूर्ण है, कितनी विचारशील है, और कितना स्थायी है।

कई विचारक कह रहे हैं कि डिजिटल भीड़ का स्वभाव तात्कालिक नैतिकता का है। वह तुरंत निर्णय करती है, तुरंत सजा देती है, और तुरंत अगले मुद्दे पर बढ़ जाती है। इस त्वरित नैतिकता ने अभिव्यक्ति को डराया है और कई बार पत्रकारों की स्वतंत्रता पर खतरा पैदा किया है।

इस विमर्श में यह बात भी गहराई से उभर रही है कि भीड़ संख्या का खेल है, न्याय का नहीं। लोकतंत्र में जनता का दबाव शक्ति है, लेकिन जब वही दबाव बिना विचार के, केवल डिजिटल प्रवाह के आधार पर चलता है, तो वह संस्थाओं को अस्थिर करता है। पत्रकारिता का काम भीड़ की नकल करना नहीं है, बल्कि उसके सामने संतुलन बनाना है। लेकिन आज पत्रकार भी उसी डिजिटल मानस के दबाव में जी रहे हैं।

मीडिया में सत्ता का बदलना, एल्गोरिद्म का हस्तक्षेप, और डिजिटल भीड़ की तात्कालिकता, अलग-अलग समस्याएँ नहीं हैं। ये मिलकर एक बड़ा ढांचा बनाती हैं, जिसका असर दुनिया के हर लोकतंत्र और हर समाज पर दिख रहा है। आज सत्ता यह नहीं कहती कि क्या छापना है, बल्कि यह तय करती है कि क्या दिखेगा। एल्गोरिद्म वह तय करते हैं जो लोकप्रिय दिखता है। और भीड़ उसे न्याय का रूप दे देती है।

इस संयुक्त ढांचे ने पत्रकारिता को दो हिस्सों में तोड़ दिया है—एक वह जो बाजार के लिए काम करती है, और एक वह जो न्याय के लिए। समस्या यह है कि न्याय वाले हिस्से की आवाज़ कम होती जा रही है। डिजिटल शोर में विवेक अक्सर पीछे छूट जाता है।

दुनिया भर में विचारक इस बात पर सहमत हैं कि पत्रकारिता को बचाने का अर्थ केवल तथ्य बचाना नहीं है। इसका मतलब संवाद, विवेक और धैर्य को बचाना है।

कुछ प्रमुख बिंदु जो वैश्विक विमर्श में सामने आए हैं:

  • मीडिया को अपनी पारदर्शिता खुद तय करनी होगी।
  • एल्गोरिद्म की भाषा और प्रक्रिया पर समाज का नियंत्रण जरूरी है।
  • भीड़ की ऊर्जा को दिशा देने के लिए मजबूत सार्वजनिक संस्थान चाहिए।
  • पत्रकारों को सिर्फ खबर बताने के बजाय अर्थ बनाने की भूमिका निभानी होगी।

भविष्य की पत्रकारिता का सबसे बड़ा काम यह होगा कि वह डिजिटल शोर में भी अर्थ की खोज जारी रखे। वह एल्गोरिद्म द्वारा बनाए गए सीमित अनुभवों को तोड़कर समाज को फिर से साझा वास्तविकता दे।और वह भीड़ के तात्कालिक आवेग में डूबने के बजाय, समय, विवेक और न्याय की लंबी परंपरा को आगे बढ़ाए।

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