यशवंत सिंह-
दिलीप मंडल दिलीप मंडल दिलीप मंडल दिलीप मंडल दिलीप मंडल! हमारे दौर का सबसे घटिया पत्रकार। हमारे दौर का सबसे बड़ा अनैतिक पत्रकार! क्या इस पर सचमुच दबाव रहता है रोज रोज सरकार के कुकर्मों को सही साबित करने का? या ये अपने मन से सरकार के पक्ष में कुछ भी अल्ल बल्ल सल्ल गल्ल लिखता बकता रहता है? मैंने इस आदमी को कभी कुछ नहीं लिखा कभी कुछ नहीं कहा डायरेक्ट लेकिन आज अब नहीं रहा गया। ये दर चादरमोद आदमी है, इसमें कोई दो राय नहीं। इसके मुँह पर आक थू! इसका बेटा बेटी भी कुचल कर मर जाएँगे तो क्या ये यही सब लिख कर भगदड़ को सही साबित करता रहेगा? बहुत बहुत गिरा हुआ इंसान है ये तो भाई!
Rakesh Chand Meena-
क्या ही विचित्र तर्क है! पहले की पीढ़ियाँ जब तीर्थ यात्रा पर निकलती थीं, तो क़र्ज़ चुकाकर, परिजनों को विदा करके निकलती थीं—यह तो उनके समय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति थी, न कि कोई नैतिक आदर्श। इसका यह मतलब नहीं कि व्यवस्थाओं की दुर्गति पर आज सवाल न उठाया जाए।
पहले की तीर्थ यात्राएँ कठिन थीं, अनिश्चित थीं। रास्ते में डाकू मिल सकते थे, बीमारियों से मरने का खतरा था, साधन सीमित थे। इसलिए लोग यात्रा को अंतिम विदाई जैसा मानकर चलते थे। लेकिन आज, जब टेक्नोलॉजी विकसित हो चुकी है, रेलवे और परिवहन की व्यवस्थाएँ बेहतर हो सकती हैं, तो किसी को यह हक़ नहीं कि बदइंतजामी को तीर्थ यात्रा के भाव के नाम पर जस्टीफाई करे।
यह कैसा हास्यास्पद तर्क है कि पहले लोग तकलीफ उठाते थे, इसलिए आज भी उठानी चाहिए? अगर ऐसा ही है, तो फिर घोड़ों और बैलगाड़ियों पर ही सफर कीजिए, बिजली-पानी जैसी सुविधाओं को छोड़ दीजिए। लेकिन ऐसा कोई नहीं करेगा, क्योंकि मूल सवाल यह नहीं है कि “पहले क्या था?” बल्कि यह है कि “आज क्या होना चाहिए?”
अगर किसी ने रेलवे या ट्रांसपोर्ट सिस्टम की अव्यवस्था पर सवाल उठाया, तो वह व्यवस्था सुधारने की बात कर रहा है, न कि तीर्थ यात्रा की भावना पर हमला कर रहा है। व्यवस्था पर सवाल करना ही नागरिक चेतना की निशानी है। लेकिन जो लोग हर बदहाल स्थिति का महिमामंडन करने में लगे हैं, वे असल में अपने दिमाग पर ताले लगाकर बैठे हैं।
Anupam Anand Diwakar-
ये आदमी कहना चाह रहा कि पुराने लोग ऐसा किया करते थे… आप लोग आज भी ऐसा ही करो… मर जाओ रास्ते में… पहुँच के भीड़ में दब जाओ। इमोशनल इंटेलिजेंस का घटिया उपयोग। एकदम बेहूदा तर्क।
Keshav Sagar Kripa-
मंडल का कहना है कि लोग तीर्थ यात्रा मरने के लिए ही करते थे . तो आज भी वही निकलें जो मरना चाहते हैं . मंडल सरकार को क्यों नहीं समझा पा रहा है! जब लोग मरने के लिए ही निकले हैं तो फिर मरने पर पैसा क्यों दे रही है …घायलों को भी गंगा में धक्का देकर मरवा दे .. आखिरकार मोक्ष पर हर तीर्थयात्री का हक है…
MK Gohil-
साफ साफ बोल भड़वे जो भगदड़ में मरे हैं उनकी मौत को जायज ठहरा रहा है. सच में तेरे सामने दुनिया के सारे भड़वो को तुने छोटा साबित कर दिया.
Manju Aggarwal-
इसका कहने का मतलब है पुराने दिन आ गए हैं जब साधन नहीं थे और तीर्थ यात्रा का मतलब था खतरे मोल लेना। आज विश्व में एआई का जमाना है और कहां ये बुलेट ट्रेन का वादा कर रहे थे और अब कह रहे हैं बैलगाड़ी वाले जमाने में चलो और जैसे पहले लोग मरते थे वैसे ही मरो।। पुराने जमाने में तो हैजा से पूरे गांव के गांव खत्म हो जाते थे चेचक से लोग मर जाते थे गर्भवती औरतें मारी जाती थी प्रसव के दौरान ।। अब सब कुछ ऐसे ही होगा क्या??? क्या इसी को रामराज कहा जाएगा बेवकूफ इंसान
सुशील मानव-
महत्वाकांक्षी व्यक्ति कभी किसी विचारधारा का होकर नहीं रह सकता है. वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरी करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है…
कभी बहुजनवाद का झंडा उठाने वाला दिलीप जायसवाल मंडल को छोड़कर कमंडल हो चुका है. यह नीच फ़ासीवाद, नस्लवाद की ज़बान बोल रहा है.

यह कह रहा है कि भारत अगर अमेरिका की तर्ज़ पर अवैध विदेशियों को भेजेगा तो कुछ पार्टियाँ अपने वोट बैंक के लिए ‘मानवाधिकार’ की दुहाई देने लगेंगी. यहां अवैध विदेशी से इस दुष्ट का आशय मुस्लिम समुदाय से है.
समाजवादी पार्टी सहित तमाम दलों को उन लोगों से सतर्क रहने की ज़रूरत है जो रात दिन बहुजनवाद का नारा लगाते रहते हैं लेकिन गिरने की हद तक महत्वाकांक्षी हैं.


