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दिल्ली

दिल्ली जिमखाना क्लब खाली कराने के सरकारी फैसले पर क्या कहते हैं डॉ अभिषेक वर्मा!

The so-called “elitist club culture” slowly became a museum of nepotism, colonial hangover and social gatekeeping!

Portrait of a middle-aged man with a salt-and-pepper beard wearing a saffron kurta, smiling, against an warm orange-toned background resembling a temple setting.

डॉ अभिषेक वर्मा-

दिल्ली जिमखाना क्लब पर केंद्र सरकार का फैसला महज़ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है। यह दिल्ली के सबसे विशेषाधिकार प्राप्त ड्रॉइंगरूम इकोसिस्टम पर बहुत देर से हुआ सुधार है।

मेरा परिवार करीब 27-30 वर्षों तक जिमखाना क्लब के ठीक सामने, 4 सफदरजंग लेन स्थित सरकारी बंगले में रहा। मेरे दिवंगत पिता श्रीकांत वर्मा और मेरी दिवंगत माता वीणा वर्मा दोनों सांसद रहे, लेकिन न उन्होंने और न ही मैंने कभी इस बीमार जगह की सदस्यता लेना जरूरी समझा।

यही बहुत कुछ कह देता है।

दशकों तक ऐसे क्लब निजी गणराज्य की तरह चलते रहे, जहां योग्यता से ज्यादा उपनाम मायने रखते थे, पहुंच को वंशानुगत अधिकार समझा जाता था और सार्वजनिक जमीन कुछ स्वयंभू अभिजात्य लोगों के आरामगाह में बदल दी गई थी।

यह तथाकथित “एलीट क्लब कल्चर” धीरे-धीरे भाई-भतीजावाद, औपनिवेशिक मानसिकता और सामाजिक गेटकीपिंग का संग्रहालय बन गया। जो लोग भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाते हैं, वे सबसे ज्यादा बेचैन हो जाते हैं जब उनके विशेषाधिकारों से लॉन खाली करने को कहा जाता है।

राष्ट्रीय हित हमेशा कॉकटेल संस्कृति वाले विशेषाधिकारों से ऊपर होना चाहिए।

दिल्ली बंद घेरे, खानदानी उपनामों और ओल्ड बॉय नेटवर्क्स की जागीर नहीं है। यह भारत गणराज्य की राजधानी है।

केंद्र सरकार को इस फैसले के लिए बधाई। कुछ क्लबों को सुधार की जरूरत थी, कुछ को खाली कराने की। इस क्लब को स्पष्ट रूप से दोनों की जरूरत थी।

लेखक डॉ अभिषेक वर्मा उद्यमी और शिव सेना के राजनीतिज्ञ हैं.


ओह, तो ये बात भी है-

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