लखनऊ/भोपाल। एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें सिविल सेवा नियमों में बदलाव की तैयारी में जुटी हैं, जिससे सरकारी कर्मचारियों को महंगे गिफ्ट लेने पर छूट जैसी राहत मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के 50 जीएसटी अफसरों पर 200 करोड़ रुपये की जमीन खरीद में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। इन दोनों घटनाओं ने अफसरशाही की पारदर्शिता और जवाबदेही पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
60 साल पुराने नियमों में बदलाव, दीवाली पर राहत
सूत्रों के मुताबिक, 60 साल पुराने सिविल सेवा आचरण नियम (1965) में संशोधन की तैयारी की जा रही है। अब चपरासी से लेकर अफसर तक तीन विकल्पों में से किसी एक का चुनाव करके गिफ्ट ले सकेंगे —
- 10 दिन, 15 दिन या एक महीने के वेतन के बराबर मूल्य का गिफ्ट,
- अथवा 250 से 2000 रुपये तक के उपहार,
- या किसी सहकारी समिति की सदस्यता लेकर विशेष खरीद योजना का लाभ।
इस संशोधन का उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों को त्योहारी अवसरों पर लचीलापन देना बताया जा रहा है। हालांकि पारदर्शिता विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के बजाय गिफ्ट के नाम पर ‘कानूनी कमीशन’ को वैधता मिल सकती है।
200 करोड़ की जमीन घोटाले में 50 अफसरों पर जांच
उधर, उत्तर प्रदेश राज्य वस्तु एवं सेवा कर विभाग के 50 अफसरों के खिलाफ लखनऊ के मोहनलालगंज क्षेत्र में 200 करोड़ रुपये की संदिग्ध जमीन खरीद का मामला सामने आया है। जांच में खुलासा हुआ है कि कोरोना काल में दर्जनों अफसरों ने फर्जी रजिस्ट्रियों और प्राइवेट बिल्डर्स के जरिये अपने नाम पर जमीनें खरीदीं।

विभागीय सूत्रों के अनुसार, ये अफसर राज्य मुख्यालय, मुरादाबाद, मेरठ, गाजियाबाद, प्रयागराज, झांसी, गोरखपुर, वाराणसी, बरेली और आगरा जैसे प्रमुख जिलों में तैनात रहे हैं। सरकार ने अब इन रजिस्ट्रियों की कॉपी लेकर आय स्रोत और खरीद प्रक्रिया की विस्तृत जांच के आदेश दे दिए हैं। प्रारंभिक जांच में कई नामी अफसरों के खिलाफ साक्ष्य मिल चुके हैं।
मप्र में भी चल रही है ‘नियम ढील’ पर बहस
मध्य प्रदेश सरकार भी सिविल सेवा आचार संहिता में संशोधन की दिशा में कदम बढ़ा रही है। अधिकारियों को ‘वेलफेयर सोसाइटी’ के सदस्य बनाकर सामूहिक खरीद या सामूहिक उपहार की अनुमति देने पर विचार चल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तरह की ढील बिना निगरानी दी गई तो भ्रष्टाचार के मौजूदा रूप और गहरे हो सकते हैं।
भ्रष्टाचार की संस्कृति पर दोहरी तस्वीर

एक ओर जहां अफसरों को “कहां से आए गिफ्ट बताना नहीं होगा” जैसी राहत मिल रही है, वहीं दूसरी ओर वही वर्ग करोड़ों के घोटालों में फंसा दिख रहा है। इससे जनता में यह संदेश जा रहा है कि सरकारें “ईमानदारी” की बात तो करती हैं, पर अफसरशाही को राहत देने में कोई कसर नहीं छोड़तीं।
विचारणीय सवाल
क्या सरकारी कर्मचारियों के ‘त्योहारी अधिकार’ के नाम पर पारदर्शिता से समझौता किया जा रहा है? और क्या 200 करोड़ की जमीन खरीद जैसे मामले केवल बर्फ की चोटी हैं? यूपी और एमपी दोनों में हालिया घटनाएं संकेत देती हैं कि अफसरशाही के लिए यह सचमुच “दीवाली का मौसम” है — पर जनता के लिए नहीं।


