डॉ ओम शंकर-
मेरा जन्म एक खुशहाल परिवार में हुआ था, जहाँ हर तरफ प्यार और हँसी बिखरी रहती थी। मेरे माता-पिता मुझे बेहद प्यार करते थे और मेरा छोटा भाई, जो मुश्किल से दो साल का था, हमारे घर की रौनक था। उसके द्वारा कहे कुछ शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजता रहता है। जीवन सरल था, लेकिन खूबसूरत था—तब तक, जब तक एक निर्दयी दिन हमारी पूरी दुनिया को हमेशा के लिए बदल नहीं दिया।
मेरा नन्हा भाई अखिल, जो हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी था, जापानी इंसेफेलाइटिस की चपेट में आ गया। यह बीमारी अचानक आई और कुछ ही समय में हमारे सपनों को तहस-नहस कर दिया। वह छोटा सा मासूम बच्चा, जो कभी उछलता-कूदता, घर के नौकरों संग बट्टो हो, बीसो हो कहकर चिढ़ाता, हँसता और खेलता था, अब बिस्तर पर बेबस पड़ा था। वह अब सिर्फ साँस ले सकता था, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। न चल सकता, न बोल सकता—वह हर चीज़ के लिए हम पर निर्भर हो गया था।
उसकी बीमारी ने न सिर्फ हमारे दिलों को तोड़ा, बल्कि हमें आर्थिक रूप से पूरी तरह बर्बाद कर दिया। इलाज के खर्चों ने हमारी सारी जमा-पूंजी खत्म कर दी। हमने सब कुछ खो दिया—हमारी जमा पूंजी, हमारा घर, हमारी शांति। गरीबी हमारी सच्चाई बन गई। सुख-सुविधाएँ एक सपना बन गईं। दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया। नए कपड़े मिलना एक सपना बन गया था—पुराने कपड़ों को उलट-पलटकर सिलना ही हमारी मजबूरी थी। एक नई चप्पल का मतलब था, टूटी हुई चप्पल को लोहे की तार से जोड़ लेना।
चार-पाँच साल की उम्र में, मुझे दो सालों तक अकेले घर में एक नौकर के साथ रहना पड़ा, जब मेरे माता-पिता अखिल के इलाज और ज़िंदगी बचाने के लिए अस्पतालों में संघर्ष कर रहे थे। मैं उनके साथ रहना चाहता था, लेकिन उससे भी ज़्यादा, मैं अपने भाई को फिर से दौड़ते-भागते देखना चाहता था, और उसे किसी भी हाल में खोना नहीं चाहता था, क्योंकि वो मेरे जीने का मकसद था।
हमारी सारी कोशिशों के बावजूद, मेरा भाई कभी ठीक नहीं हुआ। वह 18 सालों तक बिस्तर पर पड़ा जीने के लिए संघर्ष करता रहा। मैं हर रोज उसके आंखों की दर्द को देखता और महसूस करता जैसे कि वो कह रहा हो कि भैया मुझे फिर से पहले की तरह चलना है, दौड़ना है, कूदना है, हंसना है, रोना है मेरी मदद करो। उसकी इसी आशा और अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए एक रास्ता ढूंढा,मैंने एक सपना पाला—डॉक्टर बनने का। मुझे लगता था कि शायद, एक दिन मैं उसे डॉक्टर बनकर फिर उसे पहले जैसे चलने – फिरने लायक बना सकूँगा।
लेकिन ज़िंदगी इतनी बेरहम निकली कि जब मैं मेडिकल स्कूल के दूसरे वर्ष में हीं था, तो मैंने हमेशा के लिए एक दिन उसे खो दिया। वह सिर्फ़ 18 साल का था। मैं बहुत रोया, चीखा – चिल्लाया लेकिन वो फिर कभी वापिस नहीं लौटा। फिर से उसने कभी मुझे ताई कहकर नहीं पुकारा।
उसके जाने के साथ हीं, मैंने अपना मकसद, अपनी उम्मीद, जीने की इच्छा—सब कुछ खो दिया। उसके जाने का दर्द इतना गहरा था कि मैं पढ़ाई छोड़ बैठा। जीवन में कभी न भर पीनेवाले एक खालीपन बन गया था।
उसी समय, मेरी माँ, जो खुद अपने एक बेटे के जाने के असहनीय दर्द से जूझ रही थीं, अपना दूसरा बेटा भी नहीं खोना चाहती थी, उसने मुझे अपने आँचल में समेट लिया और रोते हुए मेरे कानों में कुछ ऐसे शब्द कहे, जिन्होंने मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
उन्होंने कहा, “ओम, यह दर्द सिर्फ हमारा नहीं है। आज इस दुनियां में करोड़ों परिवार हमारी हीं तरह इस दर्द से गुजर रहे हैं, जो उसकी गरीबी, लाचारी, बेबसी और दुःख की सबसे बड़ी वजह है। अगर तुम अपने भाई को नहीं बचा सके तो क्या हुआ, उन करोड़ों लोगों में अखिल को तलाशो, अब अपने बचे हुए जीवन में उसको बचाने की कोशिश करो।
एक ऐसा डॉक्टर बनने की कोशिश करो, जो निराशा में ऐसे लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन सके। हर मरीज़ को अपना भाई समझो और उनकी तकलीफ को अपना दर्द मानकर उन्हें राहत दो।”
माँ के इन शब्दों ने मुझे एक बार फिर से जीने का नया मकसद दिया।
मुझे एहसास हुआ कि स्वास्थ्य सिर्फ़ एक ज़रूरत नहीं है, बल्कि एक अधिकार है। ऐसा अधिकार, जो हर नागरिक को मिलना चाहिए। मैंने देखा कि स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी लाखों लोगों को गरीबी में धकेल रही है, ठीक उसी तरह जैसे हमें धकेला था। मैंने खुद से एक वादा किया कि मैं अपने भाई की याद में, और उन सबके लिए लड़ूँगा जो इस पीड़ा को चुपचाप सह रहे हैं।
उस दिन के बाद से, मैंने अपना जीवन इस मिशन को समर्पित कर दिया। मैंने कई कठिनाइयों, विरोधों और आलोचनाओं का सामना किया। कई बार मैंने अपनों की सलाह के खिलाफ जाकर अपने दिल की सुनी। मैंने बलिदान दिए, जो शायद कुछ लोग समझ नहीं सके। मुझे पता है कि इस सफर में मैंने अपनों को तकलीफ भी दी है, जिसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। लेकिन यह संघर्ष ही मेरी ज़िंदगी का सहारा है। यही मेरी प्रेरणा है।
कुछ लोगों के लिए जीने का सहारा संगीत होता है, आस्था होती है, कला होती है। मेरे लिए, हर इंसान को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा दिलाने का संघर्ष ही मेरा सहारा है। यही मेरी ज़िंदगी को मायने देता है। यही मेरे भाई की याद को जिंदा रखता है।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि मेरी लड़ाई सिर्फ मेरे भाई के लिए नहीं थी। यह उन लाखों लोगों के लिए थी, जो चुपचाप दर्द सहते हैं, उन बच्चों के लिए जो इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं, और उन माता-पिता के लिए जो अपनी ज़िंदगी की हर खुशी गँवा देते हैं अपने बच्चों की जान बचाने के लिए।
यह मेरी कहानी है—दर्द, खोने और फिर से खड़े होने की कहानी। एक ऐसे बच्चे की कहानी, जिसने सब कुछ खो दिया लेकिन अपने दर्द में ही एक मकसद खोज लिया। और अगर मेरी यह यात्रा किसी एक व्यक्ति को भी सही के लिए लड़ने की प्रेरणा दे सके, तो मेरा हर संघर्ष, हर आँसू, हर त्याग सार्थक होगा।
बस इतनी छोटी सी थी मेरी कहानी, जिसे लिखते वक्त, इसे याद करके मैं खुद कई बार भावुक हो गया।


