इमरजेंसी के दौरान किसी भी नेता को उत्पीड़ित नहीं किया गया था सिवाय नक्सल आंदोलन से जुड़े युवाओं को छोड़ कर और वह तो आज भी जारी है। लेकिन फ़िल्म की पटकथा लिखने वालों ने इसका ग़लत वर्णन किया है…

शंभूनाथ शुक्ल-
कंगना रनौत अभिनेत्री शानदार है किंतु उसे राजनीति में नहीं आना चाहिए। न ही उसे राजनीतिक या ऐतिहासिक विषयों पर फिल्मों का निर्माण करना चाहिए। राजनीति का उसे क ख ग भी नहीं पता। जैसे उसने इमरजेंसी फ़िल्म में बेहतरीन अभिनय किया है। किंतु स्क्रिप्टिंग में गुड़-गोबर हो गया है। उसे इस फ़िल्म को विस्तार दे कर ‘इंदिरा गांधी: अ आयरन लेडी’ नाम से फ़िल्म बनानी थी। इस फ़िल्म में उसने इंदिरा गांधी का किरदार बहुत बढ़िया निभाया है और कुछ दृश्यों को छोड़ दें तो उसने ईमानदारी से इंदिरा गांधी का चित्रण पूरी बेबाकी से किया है। ऐसे शानदार अभिनय के लिए उसे बधाई।
इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तब मैं कक्षा सात में पढ़ता था। पढ़ाई पूरी की, नक्सल आंदोलन का सिंपैथाइज़र रहा। शादी हुई, बच्चे हुए और दिल्ली में जनसत्ता की नौकरी भी करने लगा। एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब अखबार के पहले पन्ने पर इंदिरा गांधी को न देखा हो। न ही वे आम जनता की ज़िंदगी से बाहर हुईं। बीच में वे ढाई साल सत्ता से बेदख़ल ज़रूर रहीं पर लौटीं तो उसी वेग के साथ।
नेहरू जी के राज की याद नहीं और इंदिरा गांधी के बाद उन जैसा कोई नेता नहीं देखा। वे जनता के बीच अपार लोकप्रिय थीं। अंदर से सॉफ्ट थीं और कठोर भी। कभी ममतामयी माँ लगतीं तो कभी दुर्गा और कभी अटल एवं चरण सिंह की बहन। इमरजेंसी जब लगी तब उसका लगना भी जरूरी था। नहीं तो वे ऐसे चक्रव्यूह में घिर जातीं, जिससे निकलना मुश्किल था। उस समय जो राजनेता थे, वे उन्हें लीलने को तत्पर बैठे थे। उनकी पार्टी के भीतर भी और विपक्षी नेता भी।
अंतर्राष्ट्रीय स्थितियां ऐसी थीं कि अमेरिका और उसके साथी नाटो देश भारत हड़पने को आतुर थे। इंदिरा जी का चित्रण करते समय कंगना को एक बात का ध्यान रखना चाहिए था, कि इंदिरा जी ने पहला सिक्सर तब मारा था, जब उन्होंने 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। तभी इंदिरा कांग्रेस जबरदस्त बहुमत से सत्ता में लौटी थी। उस समय कांग्रेस के धाकड़ नेताओं को लगा था जहाँ इंदिरा वही असली कांग्रेस। जब वे विशाल बहुमत से चुनाव जीतीं तब संविधान में 26वाँ संशोधन कर पूर्व नरेशों का प्रिविपर्स बंद किया उनके सभी विशेषाधिकार एक ही झटके में छिन लिए। इंदिरा गांधी तब तक देश में खूब लोकप्रिय नेता बन चुकी थीं।
जब ईस्ट पाकिस्तान को उन्होंने बांग्ला देश बनवाया तब तो वे अंतर्राष्ट्रीय हस्ती बन गईं। उन्हें अमेरिका से कोई भय नहीं था। अलबत्ता अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन उनके पीछे पड़ गया था। जबकि उसका पूर्ववर्ती जॉनसन इंदिरा जी से मिलने अमेरिका के भारतीय राजदूतावास आ गया था। उसने पूछा, क्या मैं आपको मैडम प्राइम मिनिस्टर कह सकता हूँ। उन्होंने कहा, मेरा स्टाफ़ मुझे मैडम सर बोलता है। यह थी इंदिरा गांधी की ताक़त। उस दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अमेरिका के दौरे पर थीं।
किंतु 1971 में जब बांग्ला देश बना तो इंदिरा गांधी अमेरिका की आँख में कंकड़ की तरह चुभने लगीं। राष्ट्रपति निक्सन ने उनके विरुद्ध षड्यंत्र किए। इमरजेंसी उसी का नतीजा थी। यह अवश्य हुआ कि इस वजह से भारत के लोकतंत्र को नुक़सान पहुँचा। इसमें भी कोई शक नहीं कि उनका बेटा संजय कुछ गड़बड़ था पर राजनीति और उसके कुचक्र को वह भी समझ रहा था।
एकाध दृश्यों को छोड़ दिया जाए तो इस फ़िल्म में कंगना ने इंदिरा जी के उस उज्जवल चरित्र को ही उभारा है। अपने सिख बॉडी गार्ड्स के साथ उनका वत्सल भाव, उनकी गिरफ़्तारी जो तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह का पोलिटिकल फ़ेल्योर था। फिर उनका उनका बेलछी जाना और छा जाना। इसके बाद वे कानपुर आईं और फूलबाग में जो रैली की, उसमें कई लाख लोग जुटे थे। मैं खुद उसे देखने गया था। वे वहाँ कानपुर शहर कांग्रेस अध्यक्ष नरेश चतुर्वेदी के घर गई थीं। रैली में लोग अपनी भूल के लिए रो रहे थे। यह था उनका क्रेज़!
आरके धवन की वफादारी, अपने सेवकों के प्रति उनका ममत्व आदि सब कुछ फ़िल्म में बहुत ही अच्छी तरीके से दिखाया गया है। मुझे याद है, इमरजेंसी के दौरान किसी भी नेता को उत्पीड़ित नहीं किया गया था सिवाय नक्सल आंदोलन से जुड़े युवाओं को छोड़ कर और वह तो आज भी जारी है। लेकिन फ़िल्म की पटकथा लिखने वालों ने इसका ग़लत वर्णन किया है। इस फ़िल्म में वह सब कुछ है जो इंदिरा जी के चरित्र को महान बताता है। जैसे ही वे चुनाव हारती हैं, एक सफ़दरजंग को फौरन ख़ाली कर देती हैं। उनके पास न कोई घर है न पैसा।
कुल मिला कर यह फ़िल्म कांग्रेस को ताक़त देती है। पर कांग्रेसी इसलिए नाराज़ हैं क्योंकि इसका नाम इमरजेंसी है और भाजपाई इसलिए क्योंकि इसमें इंदिरा गांधी के उज्जवल चरित्र को उभारा गया है। मैं तो कहता हूँ, कांग्रेसियों को यह फ़िल्म जरूर देखनी चाहिए। यह अवश्य हुआ है कि फ़िल्म की पटकथा लिखने वाले ने खूब गुड़ गोबर किया है। चूँकि कंगना के पास ख़ुद की बौद्धिकता का अभाव है और सत्ता पक्ष के नेताओं ने उसके साथ भितरघात किया इसलिए मैं तो राय दूँगा कि कंगना को अगले सत्र में संसद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। वह फ़िल्मों में अभिनय करे और किसी नेता अथवा बॉलीवुड के दादाओं से अपना पिंड छुड़ाये। एक अच्छी अदाकारा को अपने काम में ध्यान देना चाहिए।
इमरजेंसी फ़िल्म में नेहरू जी के चरित्र की भी सराहना है। वे कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी से कहते हैं, इंदु तुम बहुत ज़िद्दी होती जा रही हो। तुमने केरल की चुनी हुई सरकार गिरवाई। फ़िल्म में कुछ ग़लत तथ्य हैं। जैसे आनंद भवन को नेहरू जी ने विजय लक्ष्मी पंडित के नाम कर दिया। वह उनके पिता की संपत्ति थी। उसका मनमाना बँटवारा नहीं कर सकते थे। सत्य यह है कि इंदिरा गांधी ने उसे कांग्रेस को सौंप दिया था।
इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी से मैत्री और कटुता भी कई जगह अतिरंजित है। परंतु यह फ़िल्म है कोई इतिहास नहीं। शास्त्री जी की मृत्यु को आल इंडिया रेडियो ने हार्ट फेल बताया था। अख़बारों ने भी यही छापा था। पर कुछ दिनों बाद पत्रकार कुलदीप नैयर ने इसे रहस्यमयी मौत बताया था। इसी तरह नेहरू द्वारा इंदिरा को उत्तराधिकार सौंपने की इच्छा भी कुलदीप नैयर द्वारा उड़ाई गई, इसका कोई आधार नहीं है। कुलदीप नैयर ने शास्त्री जी के हवाले से ऐसी खबरें परोसीं, यह ग़लत है।




Bipendra Kumar
January 20, 2025 at 9:24 pm
फिल्म की समीक्षा के बहाने आपने पोस्ट में कुछ बातें घुसेड़ दी है जिसका कोई आधार नहीं है। जैसे आपने लिखा है, “ नेहरू द्वारा इंदिरा को उत्तराधिकार सौंपने की इच्छा भी कुलदीप नैयर द्वारा उड़ाई गई, इसका कोई आधार नहीं है।”
हकीक़त तो यह है कि 18 जून 1957 को ही दुर्गा दास ने हिंदुस्तान टाइम्स के अपने साप्ताहिक कॉलम में लिखा था ,“It is wrong to suggest that Mr. Nehru is trying to build up Mr. Menon, or any one else,as his successor. If Mr. Nehru is consciously building up any one ,he is building up his daughter.”
इस कॉलम के छपने के बाद नेहरू ने दुर्गादास को बुलाया। दुर्गादास ने किस तरह उन्हें निरुत्तर किया यह India from Curzon to Nehru and After में पढ़ा जा सकता है।
दरअसल नेहरू की इच्छा क्या है यह तो उसी दिन उजागर हो गई थी जिस दिन कांग्रेस अध्यक्ष ढेबर ने पार्टी संगठन में बिना किसी पूर्व अनुभव के इंदिरा को कार्यसमिति का सदस्य बना दिया था। फिर साल भर के अंदर ही ढेबर का इस्तीफा हुआ और इंदिरा को कांग्रेस अध्यक्ष बनवा कर नेहरू अपनी मंशा को अगले पायदान पर ले गए। इंदिरा को अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए नेहरू सुनियोजित तरीके से सक्रिय रहे।
इमर्जेंसी के दौरान किसी नेता को प्रताड़ित नहीं किया गया,ऐसा कहना सच्चाई से बिल्कुल परे है।