भारत के एथनॉल बाज़ार में विदेशी हिस्सेदारी तेज़ी से बढ़ रही है। ये बहुत दुखद है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में अमेरिका से भारत को एथनॉल का निर्यात अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचने की ओर है। जनवरी से सितंबर 2025 के बीच भारत को करीब 35.39 लाख बैरल एथनॉल निर्यात किया गया, जो औसतन 3.93 लाख बैरल प्रति माह से अधिक है। यह आंकड़ा भारत की ऊर्जा जरूरतों, एथनॉल ब्लेंडिंग नीति और घरेलू उत्पादन क्षमता पर नए सवाल खड़े करता है। पढ़िए दो पत्रकारों का विश्लेषण-
अभिषेक सिंह-
पहले हम कच्चा तेल इंपोर्ट कर रहे थे. फिर समोसे ने कहा कि एथनॉल डालो तो तेल कम खरीदना पड़ेगा. अब हम तेल और एथनॉल दोनों इंपोर्ट कर रहे हैं. साथ में मक्का भी बस कुछ दिनों की बात है. फिर गन्ने का जूस भी बाहर से आयेगा. ये बात सत्य है की अगले के पास 200 करोड़ महीने का कमाने वाला दिमाग़ है लेकिन जिनका घुटनों में है उनका क्या कर सकते हैं.
प्रभात डबराल-
हमें बताया गया था कि एथेनाल के इस्तेमाल से कच्चे तेल का आयात कम होगा लेकिन हुआ क्या?
पिछले एक साल में कच्चे तेल का आयात 3 परसेंट बढ़ गया… एथनॉल अपने देश में बनना था.. लेकिन हुआ क्या?
पिछले एक साल में एथेनॉल आयात भी 20 प्रतिशत बढ़ गया…. देश में एथनॉल का उत्पादन अपने ही यहाँ पैदा हुए गन्ने और मक्का से करना था, पर हुआ क्या?
पिछले एक साल में मक्का का आयात “एक हज़ार परसेंट” बढ़ गया …… (तेल का आयात तो कम नहीं हुआ, एथेनाल और मक्का का आयात बढ़ गया)
होता ये है कि भारत जो कच्चा तेल आयात करता है उसे रिफाइन करने के बाद जो तेल देश में बेचना है उसमें तो एथनॉल मिला दिया जाता है लेकिन जो निर्यात करना है उसे शुद्ध गैसोलीन के रूप में बेचा जाता है.
यहाँ भी एक पेंच है. निर्यात (9०%) रिलायंस और नायरा करती है जबकि देश में बिक्री का कारोबार (90%) सरकारी कंपनियों के हाथ में है.
एथनॉल की मिलावट करने के बाद जो शुद्ध तेल बचता है वो रिलायंस और नायरा का निर्यात बढ़ाने के काम आता है. जितना ज़्यादा एथनॉल मिलाओगे, उतना ज़्यादा शुद्ध तेल निर्यात के लिए बचेगा.
हर “मास्टर स्ट्रोक” अंबानी/ अडानी के दरवाज़े पर जाकर ही ख़त्म होता है…. इति सिद्धम्….


