मनोज अभिज्ञान-
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 90 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। हर वर्ष इस पर लगभग 150 से 200 अरब डॉलर तक खर्च होता है। सरकार का दावा है कि पिछले एक दशक में एथेनॉल मिश्रण से लगभग ₹1.55 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बचाई गई। पहली नजर में यह आंकड़ा बड़ा दिखाई देता है, लेकिन यदि इसे पूरे आयात बिल के संदर्भ में देखें तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। विशेषज्ञों के अनुसार, 20 प्रतिशत मिश्रण की स्थिति में भी तेल आयात में वास्तविक बचत कुल आयात बिल का केवल 2 से 3 प्रतिशत के आसपास ही बैठती है।
यानी एथेनॉल आयातित तेल की जगह नहीं ले सकता। यह सीमित विकल्प है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि उपभोक्ता को सस्ता ईंधन नहीं मिला और आयात में भी बहुत बड़ी कमी नहीं आई, तो इस नीति का सबसे बड़ा लाभ किसे मिला?
एक दशक पहले तक देश की अधिकांश चीनी मिलें अधिशेष उत्पादन, कम चीनी कीमतों, भारी कर्ज और किसानों के बकाया भुगतान जैसी समस्याओं से जूझ रही थीं। लेकिन एथेनॉल खरीद की सरकारी व्यवस्था ने उनके लिए नया और सुनिश्चित बाजार तैयार कर दिया। तेल विपणन कंपनियों द्वारा निश्चित कीमत पर खरीद, आसवन संयंत्र लगाने के लिए आसान ऋण और लगातार बढ़ते मिश्रण लक्ष्य ने इस उद्योग का आर्थिक ढांचा बदल दिया।
आज भारत की एथेनॉल उत्पादन क्षमता 20 अरब लीटर प्रतिवर्ष से अधिक पहुंच चुकी है और विभिन्न आकलनों के अनुसार 2027 तक यह लगभग 24 अरब लीटर तक पहुंच सकती है। इसके विपरीत ई-20 कार्यक्रम के लिए सालाना आवश्यकता लगभग 11 अरब लीटर ही है। औषधि, रसायन और पेय उद्योग मिलाकर लगभग 3 से 3.5 अरब लीटर एथेनॉल की खपत करते हैं। यानी कुल मांग के बाद भी लगभग 7 अरब लीटर उत्पादन क्षमता ऐसी बचती है जिसके लिए बाजार उपलब्ध नहीं है। इसका अर्थ है कि यदि मिश्रण का लक्ष्य आगे नहीं बढ़ेगा तो उद्योग के सामने अतिरिक्त क्षमता की समस्या खड़ी हो सकती है।
भारत में एथेनॉल की मांग का सबसे बड़ा स्रोत सरकार की अनिवार्य ब्लेंडिंग पॉलिसी है। सरकार तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) को निश्चित मात्रा में एथेनॉल खरीदने का निर्देश देती है और खरीद की कीमत भी काफी हद तक सरकार ही तय करती है। इससे एथेनॉल उत्पादकों, विशेषकर चीनी मिलों और डिस्टिलरी को लगभग गारंटीड मार्केट मिल जाता है। यदि यह सरकारी खरीद न हो, तो वर्तमान उत्पादन क्षमता का बड़ा हिस्सा बाजार में खप ही नहीं पाएगा।
यह व्यवस्था उचित मानी जा सकती है, यदि इससे किसानों की आय बढ़े, तेल आयात घटे, पर्यावरण को लाभ हो और उपभोक्ता पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। लेकिन यदि उपभोक्ता को ईंधन सस्ता न मिले, माइलेज घटने की शिकायतें बढ़ें, विदेशी मुद्रा की बचत कुल आयात बिल का केवल 2 से 3 प्रतिशत ही रहे और दूसरी ओर उद्योग को सुनिश्चित बाजार तथा स्थिर लाभ मिलता रहे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि नीति का सबसे बड़ा लाभार्थी कौन है। इसीलिए इस व्यवस्था की स्वतंत्र कॉस्ट-बेनेफिट एनालिसिस जरूरी है।
पहले एथेनॉल उत्पादन मुख्यतः गन्ने के उपोत्पाद शीरे से होता था, लेकिन बढ़ती मांग के कारण मक्का और अन्य अनाज का उपयोग भी तेजी से बढ़ा है। इसका असर कृषि बाजार पर दिखाई देने लगा है। कुछ वर्षों पहले तक भारत एशिया के प्रमुख मक्का निर्यातकों में था, लेकिन हाल के वर्षों में मक्का आयात बढ़ा है। इससे खाद्य और चारे की आपूर्ति पर भी दबाव बढ़ रहा है। यानी तेल आयात कम करने की कोशिश में कृषि क्षेत्र में नई निर्भरता पैदा होने का जोखिम भी सामने आया है।
भारत में लाखों ऐसे वाहन अभी भी चल रहे हैं जिन्हें मूल रूप से ई-20 ईंधन के लिए डिजाइन नहीं किया गया था। नीति आयोग ने अपनी रोडमैप फॉर एथेनॉल ब्लेंडिंग रिपोर्ट में पहले ही संकेत दिया था कि पुराने वाहनों में ई-20 के उपयोग से औसतन 6 से 7 प्रतिशत तक माइलेज कम हो सकता है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि ई-20 पेट्रोल को कीमत में कुछ सस्ता रखा जाए ताकि उपभोक्ता को माइलेज में होने वाले नुकसान की भरपाई हो सके। लेकिन ऐसा मूल्य अंतर लागू नहीं किया गया।
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पारदर्शिता है। यदि किसी सार्वजनिक नीति से उद्योग, किसान, उपभोक्ता और सरकार सभी प्रभावित होते हैं, तो उसके लाभ और लागत दोनों का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए। विदेशी मुद्रा बचत या पर्यावरणीय लाभ बताना पर्याप्त नहीं है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उपभोक्ता की जेब पर वास्तविक असर कितना पड़ा, वाहन रखरखाव की लागत में क्या बदलाव आया और सरकारी वित्त पर कुल बोझ कितना बढ़ा।


