फ़ैज़ कम्युनिस्ट होने के बावजूद अल्ला में यक़ीन रखते थे : दयानंद पांडेय

Dayanand Pandey : फ़ैज़ का विरोध कर रहे लोगों को जान लेना चाहिए कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी फ़ैज़ के बड़े प्रशंसकों में थे। फ़ैज़ की यह नज़्म हम देखेंगे अटल जी की पसंदीदा नज़्म थी। फ़ैज़ के ही क्यों अटल जी तो मेंहदी हसन के भी मुरीद थे।

याद कीजिए जब अटल जी ने मेहदी हसन का इलाज पाकिस्तान से बुला कर करवाया था। अटल जी को फैज़ की यह नज़्म ‘हम देखेंगे’ इस लिए भी खूब पसंद थी तो इस के पीछे एक बड़ा कारण यह भी था कि फैज़ अहमद फैज़ ने 1977 में यह नज़्म तब लिखी थी जब पाकिस्तान में तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल जिया उल हक़ ने जुल्फिकार अली भुट्टो का तख्ता पलट दिया था। जिया उल हक़ को तब ज़बरदस्त विरोध झेलना पड़ा था।

फैज़ को यह नज़्म लिखने के कारण तब पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था। यह लगभग वही समय था जब भारत में भी इमरजेंसी बस विदा हो रही थी और नई सरकार की दस्तक थी। जब मोरार जी सरकार बनी तब अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने। बतौर विदेश मंत्री जब अटल जी पाकिस्तान गए तो प्रोटोकॉल तोड़ कर वह फ़ैज़ से मिले थे। अटल जी कवि थे, कवि और कविता का मर्म भी समझते थे।

बहरहाल अटल जी ने पाकिस्तान में फ़ैज़ की रचनाएं सुनीं और उन्हें भारत आने का निमंत्रण दिया। फ़ैज़ भारत आए भी और दिल्ली , इलाहाबाद , मुंबई समेत कई शहरों में घूमे। लोगों को यह भी जान लेना चाहिए कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के न्यौते पर फ़ैज़ ने यह नज़्म भारत में सब से पहले इलाहाबाद में पढ़ी थी। कोई चार दशक पहले इलाहाबाद के मुशायरे में यह नज़्म इस कदर पसंद की गई कि फैज़ को इसे बार-बार पढ़ना पड़ा था। हम देखेंगे तभी से भारत के लोगों के दिल-दिमाग में बस गई।

लेकिन क्या कीजिएगा जो लोग साहित्य नहीं जानते , कविता नहीं जानते , इस की पवित्रता नहीं जानते , वही लोग इस तरह की मूर्खता और कुटिलता की बात कर सकते हैं। नफरत और घृणा की राजनीति का हश्र यही होता है। फ़ैज़ और उन की इस मशहूर नज़्म के साथ यही हो रहा है। फ़ैज़ कम्युनिस्ट थे। और कम्युनिस्ट लोगों का एक मशहूर जुमला है कि धर्म अफीम है। लेकिन फ़ैज़ कम्युनिस्ट होने के बावजूद अल्ला में यक़ीन रखते थे। लगभग हर पढ़ा लिखा कम्युनिस्ट रखता है। वह भी मुसलमान पहले हैं…. कम्युनिस्ट, नागरिक वगैरह बाद में। फ़ैज़ भी इन्हीं में शुमार थे।

हम देखेंगे नज़्म में आख़िरी बंद में लिखते ही हैं , बस नाम रहेगा अल्लाह का। बस विवाद इसी का है। अरे , आप अल्ला की जगह भगवान लिख लीजिए , भगवान पढ़ लीजिए। दिक्क्त क्या है। उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा का मतलब आप अहम् ब्रह्मासि में तलाश लीजिए। लेकिन किसी कविता का, किसी शायर का फ़ैसला लेने वाले आप होते कौन हैं। इस अल्ला का मेटाफ़र अगर आप को नहीं समझ आता तो यह आप की बदकिस्मती है। फ़ैज़ की नहीं।

फ़ैज़ से आप किसी बात पर, उन की नज़्म या किसी ग़ज़ल पर, किसी कहे पर असहमत हो सकते हैं। निंदा कर सकते हैं। यह आप का अधिकार है। लेकिन फ़ैज़ की किसी रचना पर कोई फ़ैसला देने वाले आप होते कौन हैं। लेकिन क्या है कि एक साइकिल है जो चल रही है। एक समय था कि यही कम्युनिस्ट लोग अपनी मूर्खता और नफ़रत में एक समय तुलसीदास को ले कर आक्रामक थे। अब भी हैं। तुलसीदास को ब्राह्मणवादी आदि, इत्यादि क्या-क्या नहीं कहते रहते हैं। बिना अर्थ, संदर्भ और भाषागत तथ्य और सत्य को जाने।

जैसे कि रामचरित मानस के सुंदरकांड में उल्लिखित ढोल, गंवार, शूद्र, पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी को लेते हैं। दलितों और स्त्रियों को भी इसी बहाने भड़का कर अनाप-शनाप लिखने बोलने लगते हैं। यह सिलसिला अनवरत जारी है।

अब सोचिए कि तुलसी के रामचरित मानस की जुबान क्या है? अवधी। और अवधी में ताड़ना का अर्थ होता है, खयाल रखना, केयर करना। तो तुलसी ने क्या गलत लिखा है? पहले जुबान समझिए, भाषा समझिए। भाषा का मिजाज समझिए। फिर कुछ कहिए और लिखिए। तुलसी दुनिया के सब से बड़े कवि हैं लेकिन लोग तो तुलसी को भी गाली देते हैं। निंदा करते हैं। नफरत करते हैं। तुलसी के यहां तो आलम यह है कि एक ही चौपाई में एक ही शब्द के अर्थ अलग-अलग हैं। देखिए यह एक चौपाई :

सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथ अमित अति आखर थोरे॥

जिमि मुख मुकुर, मुकुर निज पानी । गहि न जाइ अस अदभुत बानी ॥

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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