सत्येंद्र पी एस-
बौद्ध और जैन सहित कई धर्मों में मांसाहार करीब-करीब वर्जित है. वैष्णव धर्म में भी मांसाहार वर्जित है. वहीं सनातन या वैदिक या ब्राह्मण धर्म में मांसाहार की बड़ी महिमा है.
भारत की बहुसंख्य आबादी मांस का भक्षण करती है. लेकिन शाकाहारियों ने उन पर इतना हमला किया कि मांसाहार करने वाले खुद ही अपराधबोध में आ जाते हैं. जबकि वैदिक ब्राह्मण धर्म में मांसाहार की विशेष महिमा है. शैव और शाक्त देवी देवताओं को मांस प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है.
ऐसे में अगर आप अगर वैदिक व ब्राह्मण धर्म को मानने वाले हैं, मांसाहार करते हैं तो शास्त्रोक्त तरीके से करें। बौद्ध जैन टाइप नास्तिक हैं तो घास फूस खा सकते हैं, लेकिन अगर ब्राह्मण धर्म के अनुयायी हैं तो शास्त्रोक्त भोजन ही करें.
अभी गर्मियां चल रही हैं, गर्मी में क्या खाना चाहिए, यह समस्या होती है… देखिए शास्त्रों ने क्या कहा है….
ग्रीष्म ऋतु तपन भरी और और गर्म होती है। इस ऋतु में रातें छोटी और दिन लंबे होते हैं। हिंदी तिथि के अनुसार वैशाख और जेठ का महीना ग्रीष्म ऋतु का कहा जाता है। वसंत खत्म होते ही गर्मी शुरू हो जाती है। वैशाख या बैसाख अंग्रेजी महीनों के मुताबिक अप्रैल-मई में पड़ता है। वहीं जेठ अथवा ज्येष्ठ महीना मई-जून में पड़ता है। यानी अप्रैल के मध्य से ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत होती है और यह जून के मध्य तक रहती है। इस मौसम में धूल भरी गर्म और शुष्क हवाएं चलती हैं, जिन्हें लू कहा जाता है। इस मौसम में खानपान पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है क्योंकि गर्मी के सीजन में शरीर में एनर्जी सबसे कम होती है। इस मौसम में जंगली पशु-पक्षियों के मांस खाने की सलाह दी गई है, जो तुलनात्मक रूप से लघु माने गए हैं।
मयूखैर्जगतः सारं ग्रीष्मे पेपीयते रविः
स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदाहितम्।
शीतं शर्करं मन्थं जांगलान्मृगभक्षणः
घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन ग्रीष्म न सीदति।
मद्यमल्पं न वा पेयमथवा सुद्हूदकम
लवणाम्ल कटूष्णानि व्याचामं चात्रस वर्जयेत।
दिवा शीतगृह निद्रां निशि चन्द्राशुशीतले
भजेच्चन्दन दिग्यांगः प्रवाते हर्म्यमस्तके।
व्यजनैः पाणिसंस्पर्शच्चन्दनोदक शीतलैः
सेव्यमानो भजेदास्यां मुक्तामणि विभूषितः।
काननानि च शीतानि जलानि कुसुमानि च
ग्रीष्मकाले निपेवेत मैथुनाद्विरतो नरः।
ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों से संसार का सार खींचता रहता है। ऐसे में इस समय मीठा, ठंडा द्रव पदार्थ पीना, चिकनी (घी आदि) चीजों का खानपान हितकारी है। ठंडे और शर्करा मिश्रित सत्तू खाने से, जंगली पशु-पक्षियों का मांस खाने से, घी और दूध के साथ चावल खाने से गर्मी के मौसम में कष्ट नहीं होता है। इस मौसम में शराब नहीं पीनी चाहिए और अगर पीना ही हो तो बहुत पानी मिलाकर पीना चाहिए।
नमकीन, खट्टे और कड़वे, गरम रस पदार्थ तथा व्यायाम इस ऋतु में छोड़ देना चाहिए। दिन के समय में ठंडे मकानों में सोना चाहिए और रात में चंद्रमा की किरणों से ठंडी की हुई मकान की छत पर खुली वायु में शरीर पर चंदन लगाकर सोना चाहिए।
चंदन और पानी से ठंडे किए हुए पंखों से या हाथ के स्पर्श से मोती और मणियों से शोभित होकर पलंग पर सोएं। जंगलों के ठंडे पानी (झरने आदि) को और फूलों का ग्रीष्म काल में सेवन करें। ग्रीष्म ऋतु में मैथुन से अलग रहें।
अगर आप मछली खाने के शौकीन हैं तो आप गर्मी के सीजन में झील की मछली खाएं, वह स्वास्थ्यवर्धक है।
ऋतुप्रभौ निर्झरिणीषु जाता मत्स्या हिता ग्रीष्मऋतौ तु चौण्ड्याः।
तडागजाः प्रावृषि सर्व एव स्निग्धा बलिष्ठाश्च सृजन्ति दोषान्।
शरदृतौ निर्झरजाश्च कौपा हिता हिमर्तौ शिशिरेऽब्धिजाताः।।
ऋतुप्रभु अर्थात् ऋतुराज वसन्त में निर्झरिणियों (नदियों) के, ग्रीष्मकाल में चोण्ड (झील) के मत्स्य हितकर होते हैं। वर्षाकाल में तालाब के मत्स्य दोषकारक होते हैं। ये सभी स्निग्ध व बलिष्ठ होते हैं। शरद् ऋतु में झरनों के तथा हेमन्त में कूप के मत्स्य हितकर होते हैं। शिशिर में समुद्र के मत्स्य हितकर माने जाते हैं।


