दया शंकर शुक्ल सागर-
लोग लाखों करोड़ों खर्च करके अपना घर बनवाते हैं। लेकिन अक्सर देखा है बहुत शौक से अपने बनाए घर में उस व्यक्ति का रहना नहीं हो पाता जिसने उसे अपने रहने के लिए बनवाया था। इसकी बहुत सारी वजहें हो सकती हैं। शायद इसीलिए अंग्रेजी में कहावत प्रचलित है-“Fools build houses and wise men live in them,” यानी “मूर्ख घर बनाते हैं और बुद्धिमान लोग उनमें रहते हैं।”
खैर अभी इसी प्रसंग में मैं एक पौराणिक कथा पढ़ रहा था, जो मुझे खासी दिलचस्प लगी। सोचा शेयर करुं। भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती के संग कैलास पर्वत पर रहते थे। पार्वती उनसे अक्सर कहती कि देखिए देवता कैसे-कैसे बड़े आलीशान महलों में रहते हैं। और एक हम हैं जो पर्वत-पर्वत भटकते रहते हैं। क्यों न हम अपना कहीं सुंदर-सा घर बनावाएं। लेकिन शिव हर बार इस बात को टाल जाते। कहते-‘हमारे भाग्य में अपना घर नहीं है।’
पार्वती को लगता शिव हर बार ऐसा कह कर बहाना बनाते रहते हैं। ये कैसे संभव है कि दुनिया के भाग्य विधाता का अपना भाग्य कोई और तय करे। एक दिन पार्वती ज़िद पर अड़ गईं। शिव ने भी हार मान ली। शिव ने विश्वकर्मा और कुबेर को इस काम पर लगाया। दोनों ने मिलकर शिव के लिए बहुत मन से सोने की लंका तैयार की। लंका एक शानदार नगरी बनी। ऐसी नगरी की इन्द्र व अन्य देवता भी इसे देखकर जलने लगे।
शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ वहां रहने की तैयारी कर रहे थे। पार्वती शिव को छेड़ने भी लगीं कि आप तो कहते थे कि घर हमारे भाग्य में नहीं। देखिए क्या शानदार नगरी बनी है हमारे लिए। शिव सिर्फ हंस देते।
गृह प्रवेश के पूजन के लिए उस दौर के सबसे ज्ञानी और विख्यात ऋषि विश्रवा को बुलाया गया। ऋषि विश्रवा की कई संतानें थीं जिनमें रावण, कुबेर, कुंभकर्ण, अहिरावण, शूपर्णखा और विभीषण आदि शामिल थे। लेकिन लंका इतनी सुंदर नगरी बन गई कि ऋषि विश्रवा के मन में लोभ आ गया।
गृह प्रवेश पूजन के बाद दक्षिणा देने का समय आया तो ऋषि विश्रवा ने भगवान शिव से लंका को ही मांग लिया। शिव तो जानते ही थे कि अपना घर उनके भाग्य में नहीं है। वह मुस्कुराए और उन्होंने लंका नगरी ऋषि विश्रवा को दे दी। लेकिन बेचारी पार्वती का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने ऋषि विश्रवा को श्राप दिया कि न वह लंका में रह पाएंगे न उनका कुल खानदान। उनके कुल का समूल नाश हो जाएगा। और ये लंका भी एक दिन शिव का कोई अवतार जला कर भस्म कर देगा।
पार्वती का इतना गुस्सा और सम्पूर्ण कुल के नाश के शाप से ऋषि विश्रवा घबरा गए। उन्हें लगा की बड़ी भूल हो गई। पर अब करते भी क्या? बहुत माफी मांगने पर पार्वती ने उनके एक पुत्र की जान बक्श दी। वह उनके छोटे पुत्र विभीषण थे।
खैर कहानी कहती है कि दक्षिणा में छल से लंकापुरी लेने के बाद ऋषि विश्रवा ने बहुत भारी मन से अपनी पहली पत्नी देवांगना से हुए अपने पुत्र कुबेर को लंका नगरी का राजा बना दिया। लेकिन इसके बाद से ही उनके घर में कलह शुरू हो गई। ऋषि विश्रवा की दूसरी पत्नी कैकसी के रावण आदि पुत्रों ने कुबेर को राजा मानने से इंकार कर दिया और आपस में लंका नगरी के लिए लड़ने झगड़ने लगे।
लेकिन जल्द कुबेर से लंका हथियाने के बाद रावण लंका का राजा बन गया। पर अभी वह कुछ ही समय लंका में राज कर पाया था कि उसने सीता का हरण कर लिया। फिर जो रामायण हुई वह सबके सामने हैं।


