गोलीबारी और सर्जिकल स्ट्राइक कर सिर्फ गाल बजाने से काम नहीं चलेगा मोदी जी

आतंकी हमले नहीं होंगे, यह कौन सुनिश्चित करेगा… जम्मू के सुंजवान में शनिवार तड़के आतंकियों ने एक बार फिर नापाक हरकत की। सुंजवान सैन्य शिविर में केवल सैनिक ही नहीं बल्कि उनके परिजन भी थे। इस हमले का संदेह जैश-ए-मोहम्मद पर ही जा रहा है। इससे पहले उरी और पठानकोट पर भी आतंकियों ने इसी तरह हमला किया था। पिछले साल सेना ने 213  आतंकियों को मार गिराया, यह उनकी हताशा का परिचायक है। लेकिन इस तथ्य से मन को बहलाया नहीं जा सकता है। पाकिस्तान की ओर से सीमा पर गोलीबारी, घुसपैठ का सिलसिला थम नहीं रहा है। शायद ही कोई दिन बीतता हो, जब हमारे जवान शहीद न होते हों। इस बार हमले में शहीद हुए लेफ्टिनेंट मदन लाल चोधरी की एक रिश्तेदार गर्भवती थीं, वे भी घायल हुई पर उन्हें किसी तरह बचाया गया और उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया।

हमले के चुने गए स्थान से साफ है कि आतंकी सेना के भारी दबाव और अक्रामक रुख के कारण घाटी से जान बचाकर भाग रहे हैं और जम्मू में पैठ बना रहे हैं। सुंजवान के जिस शिविर पर हमला किया गया है, वह जम्मू का नजदीकी शांत क्षेत्र है। यहां उन जवानों के परिवार रहते हैं, जो घाटी में तैनात हैं। आतंकियों द्वारा आसान स्थल को निशाना बनाना दर्शाता है कि वे बड़ी साजिश के तहत घुसे और संदेश देना चाहते है कि हम कमजोर नहीं पड़े है।

दरअसल ऐसा हमला पहली बार नहीं हुआ है। कालूचक में सेना के कैम्प पर 2002 में ऐसा ही हमला हुआ था। इसमें सेना के 22 जवानों समेत 34 लोगों की जान गई। भारत ने उस वक्त खुद को दिलासा देकर, घटना को भुला दिया था। सरकार यह नहीं देखती है कि उसकी नीतियों और नाकामियों का खामियाजा सैनिकों और उनके परिजनों को उठाना पड़ा रहा है।  वहीं केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आश्वस्त रहिए, हमारी सेना और सुरक्षा बल प्रभावी तरीके से अपना काम कर रहे हैं और अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वे कभी भी किसी भी भारतीय का सिर शर्म से झुकने नहीं देंगे।

जनवरी 2016 में पठानकोट हमले के बाद सैन्य ठिकानों की सुरक्षा मजबूत करने के लिए 2000 करोड़ रुपये अलग से दिए जाने की मांग की गई थी। लेकिन पिछले साल रक्षा मंत्रालय ने इस मांग को वाजिब नहीं माना था। अब बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए मंत्रालय ने कुछ दिन पहले लगभग 1487.27 करोड़ रुपये जारी करने का फैसला किया है। शायद साल के अंत तक सैन्य शिविरों का सुरक्षा घेरा बढ़ जाए। लेकिन इससे आंतकी हमले होने रुक जाएंगे, यह कौन सुनिश्चित करेगा। वहीं जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भाजपा विधायकों ने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता अकबर लोन ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए। लोन का कहना है कि यह उनका निजी मामला है, इस पर किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। आतंकी त्रासदी के बाद पाक जिंदाबाद के नारे लगाना तो दुखद है ही, उससे भी दुखद यह है कि विधायक लोन इसे अपना निजी मामला बता रहे है। जब वे भारतीय लोकतांत्रिक पद्धति के तहत जीत कर विधानसभा पहुंचे हैं, और भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे में वे विधानसभा में पाक जिंदाबाद के नारे लगाने को अपना निजी मामला कैसे बता सकते है।

एक तरफ दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बातचीत चल रही है, वहीं सीमा पार से अघोषित युद्ध जारी है। हमें ये भी पता है कि पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत का कोई मतलब नहीं है। हम सिर्फ कूटनीति से ऐसे हमले नहीं रोक पाएंगे। केवल बातचीत बंद करने, या फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे धकेलने से उसकी नीयत सुधरती नजर नहीं आती है। बड़ा सवाल ये है कि हम कब ऐसे हमलों से निपटेंगे। कब हम ऐसी हरकतों पर रोक लगा पाएंगे। हमारे सत्ताधीशों को समझना होगा कि गोलीबारी और सर्जिकल स्ट्राइक कर गाल बजाने से काम नहीं चलेगा।

कुशाग्र वालुस्कर
भोपाल, मध्यप्रदेश
kushagravaluskar@rediffmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *