सी एम सिटी गोरखपुर के जिला अस्पताल में व्याप्त आकंठ भ्रष्टाचार के प्रकरण को लेकर लखनऊ में एक भयानक दृश्य देखा गया। इस मामले के महत्वपूर्ण गवाह को पत्र भेजकर सबूतों सहित स्वास्थ्य भवन बुलाया गया। गवाह को ‘स्वास्थ्य भवन’ में बुलाकर अधिकारी ने उसका स्वास्थ्य नापने का फैसला किया। लेकिन जैसे ही गवाह पहुँचा, आरोपियों ने उसकी ‘रेकी’ करानी शुरू कर दी। गवाह को यह बुलावा किसी सरकारी सेवा के तहत नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के मामले में सबूत पेश करने के लिए बुलाया गया था। गवाह को बुलाकर उसकी सुरक्षा खतरे में डालते हुए उसके आने का डेट और समय लीक कर दिया गया और जैसे ही गवाह का नाम लीक हुआ, सारे खेल का मिजाज एकदम से बदल गया।

सूचना यह थी कि गवाह 4 फरवरी 2025 को अपराह्न एक बजे स्वास्थ्य भवन लखनऊ में निदेशक के सामने दस्तक देने वाला है। अब ये सूचना कैसे लीक हुई, इसका जवाब तो कोई नहीं दे रहा, लेकिन सवाल यह उठता है कि किसी मामले में गवाह की सुरक्षा का ख्याल रखे बिना उसकी आने-जाने की जानकारी देना किसी के हित में तो नहीं हो सकता। जैसे ही गवाह स्वास्थ्य भवन पहुँचा, भ्रष्टाचार के आरोपियों ने उनका पीछा कराना शुरू कर दिया। क्या यह इत्तेफाक था या योजना का हिस्सा ? अब यह तो वही जानें जो इस योजना के मास्टरमाइंड थे । गवाह ने जब स्थिति भाँपनी शुरू की तब उसने स्वास्थ्य भवन की जगह पहले थाने का रूख किया और पुलिस से संपर्क किया लेकिन यहाँ जो हुआ वो और भी दिलचस्प था। पुलिस ने सुरक्षा देने की बजाय, गवाह को ऐसी ‘सलाह’ दी, जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह जाएगा। पुलिस ने हाथ खड़े करते हुए कहा, “आप वापस अपने शहर लौट जाओ, हम आपकी सुरक्षा नहीं कर सकते।” अब इस घटना के बाद सवाल यह उठता है कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना इतना खतरनाक है कि पुलिस तक इसकी जिम्मेदारी लेने से डरने लगे ? या फिर यह भी एक रणनीति हो सकती है, जहां किसी गवाह को डराकर उसे चुप कराया जाए ताकि वह कभी भी उस मामले में गवाही देने और सबूत पेश करने का साहस न जुटा सके ?

बहरहाल आपको बता दें कि उक्त मामले के गवाह कोई और नही बल्कि गोरखपुर के वही बेबाक पत्रकार सत्येंद्र हैँ जिन्होंने इस पूरे मामले का खुलासा किया था और खुलासे के बाद इनके खिलाफ एफ. आई.आर. दर्ज कर दी गयी थी । बड़ी विचित्र बात यह है कि भ्रष्टाचार के इस मामले में खुलासा करने की वजह से सरकार का पुलिसिया तंत्र एक तरफ पत्रकार सत्येंद्र पर मुकदमा लिख देता है तो दूसरी तरफ सरकार का स्वाथ्य तंत्र पत्रकार सत्येंद्र को महत्वपूर्ण गवाह मानते हुए बाइज्जत सबूत पेश करने के लिए अपने पास लखनऊ बुलाता है । बहरहाल लखनऊ पुलिस ने गवाह की सुरक्षा को लेकर अपने हाथ भले खड़े कर दिए हों लेकिन डर कर वापस लौटने की बजाए पत्रकार सत्येंद्र निदेशक से मिलने भी गए और अपने सबूतों का पुलिंदा भी उनके सामने रख दिया ।
उपरोक्त स्थिति आज सिर्फ किसी गवाह की नहीं, बल्कि हमारे समूचे समाज की है, जहाँ भ्रष्टाचार के आरोपियों का तो ख्याल रखा जाता है, लेकिन जो इस व्यवस्था का विरोध करते हैं, उनकी कोई सुरक्षा नहीं होती। इस पूरे घटनाक्रम को देखकर तो यही कहना पड़ेगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अब पुलिस और सरकार के भरोसे पर नहीं, बल्कि कुछ आम लोगों की उन उम्मीदों पर है, जिनमें विश्वास और साहस बचा है।
सुनें पुलिस से बातचीत का ऑडियो-


