नया नहीं है प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी का मनमाना और तानाशाहीपूर्ण रवैया

प्रो गिरीश चंद्र त्रिपाठी और आईआईटी बीएचयू,  वाराणसी के बोर्ड आफ गवर्नर की चौथी बैठक के मिनट्स का विवाद

शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ ही साथ बनारस के आम लोगों का यह मानना है कि प्रो त्रिपाठी का अपने पद पर बने रहना ; कुलपति होने के नाते बीएचयू के कार्यपरिषद और साथ ही आईआईटी.बीएचयू के बीओजी का चेयरमैन बने रहना न सिर्फ़ इन दोनो प्रतिष्ठित संस्थाओं के हित में नहीं है बल्कि इन पदों की गरिमा का अवमूल्यन है। ऐसे में यह आवश्यक है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय राष्ट्रीय महत्व के इन दो संस्थानो के हितों की सुरक्षा के लिए तत्काल आवश्यक क़दम उठाये…

-कुमार अनिर्वाण-

बीएचयू के कुलपति प्रो गिरीश चन्द्र त्रिपाठी अपने प्रतिगामी रवैये से न केवल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की गरिमा को नुकसान पहुंचा रहे हैं बल्कि अपने अड़ियल और तानाशाही पूर्ण रुख से विश्वविद्यालय के कई विभागों और संकायों के काम-काज को अवरुद्ध करने की रिग्रेसिव भूमिका भी निभा रहे हैं। ऐसा एक ज्वलंत मामला आई आई टी का पता चला है।
आईआईटी बीएचयू के बोर्ड आफ गवर्नर की चौथी बैठक 8 जुलाई 2016 को बीएचयू के कुलपति निवास पर हुई। ज्ञातव्य है कि बीएचयू के कुलपति आईआईटी बीएचयू के बोर्ड आफ गवर्नर के पदेन चेयरमैन भी हैं। इस बैठक में कतिपय महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। लेकिन खेद की बात है कि बैठक होने के चार महीने के बाद ; अब तो एक साल से भी अधिक हो गया है; भी इस बैठक का कार्यवृत (मिनट्स) अभी तक संपुष्ट नहीं हो सका है जिसकी वजह से बैठक में लिए गए तमाम निर्णय लागू नहीं हो पाए हैं। इस सम्बंध में कुलपति महोदय से बार.बार अनुरोध के बावजूद उनके कानों पर जूँ भी न रेंगी। उन्हें इस बात का न कोई इल्म है न ही फ़िक्र  कि मिनट्स नहीं संपुष्ट होने से संस्थान के कामकाज में अवरोध पैदा हो रहा है।

इस घटना-दुर्घटना का सिलसिलेवार संक्षिप्त विवरण कुछ इस प्रकार है। बोर्ड आफ गवर्नर के सदस्यों को मिनट्स का मसौदा भेजने में दो महीने से भी अधिक का समय लगा। यह पूरा घटनाक्रम ग़ौरतलब है। दिनांक 8 जुलाई 2016 को बीओजी की बैठक सम्पन्न। 23 जुलाई 2016 को निदेशक द्वारा अग्रसारित मिनट्स का मसौदा चेयरमैन के पास अनुमोदन के लिये भेजा गया। 2 अगस्त 2016 को मिनट्स के मसौदे में हो रहे विलम्ब के सम्बंध में अनुस्मारक दिया गया‌। 5 सितम्बर 2016 को मसौदे में कतिपय परिवर्तन करने का निर्देश। 12 सितम्बर 2016 को चेयरमैन के द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों को शामिल करने के बाद मिनट्स के मसौदे को भेजा गया। कई सदस्यों ने मिनट्स के भेजने में विलम्ब को लेकर चिंता जतायी और साथ ही उनको इस बात पर भी आपत्ति थी कि बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर जो निर्णय लिए गए थे, मिनट्स उनके बिलकुल विपरीत था।

इस सम्बंध में प्रो धनंजय पांडे ;13 सितम्बर 2016, प्रो जे एस राजपूत ;14 सितम्बर 2016,  प्रो राजीव संगल ;निदेशक; 15 सितम्बर 2016, प्रो ऒंकार सिंह ;16 सितम्बर 2016,  प्रो नरेंद्र आहूजा ; 20 सितम्बर 2016 और प्रो गणेश बागरिया ; 23 सितम्बर 2016 ने ईमेल लिखा। इन सबकी यह माँग थी कि मिनट्स में व्यतिक्रम के आलोक में बीओजी की बैठक तत्काल बुलायी जाये ताकि उसे सुधारा जा सके और उसकी पुष्टि की जा सके। इस सम्बंध में एक सुझाव यह भी था कि बीओजी की बैठक की कार्यवाही की  वीडियो  रिकॉर्डिंग की जाये ताकि ग़लत मिनट्स न दर्ज किए जायें। स्वयं निदेशक ने भी इस सम्बंध में चेयरमैन से कई बार अनुरोध किया कि वे मिनट्स को संपुष्ट करने के लिए बीओजी की बैठक बुलायें। 23 सितम्बर  2016 को चेयरमैन से  बीओजी की बैठक दो हफ़्ते के अंदर बुलाने के लिए अनुरोध  किया गया  क्योंकि  मिनट्स के संपुष्टि के अभाव में संस्थान का कामकाज प्रभावित हो रहा था । 8 अक्टूबर  2016 को चेयरमैन को बीओजी की बैठक दो हफ़्ते के अंदर बुलाने के लिए फिर से अनुरोध   किया गया चूँकि पिछली बैठक के मिनट्स तीन महीने बीत जाने के बाद भी अभी भी असंपुष्ट थे । 23 अक्टूबर 2016 और 4 नवम्बर 2016 को फिर अनुरोध किया गया।

चेयरमैन महोदय ने बीओजी के सदस्यों के ईमेल के जवाब में चुप्पी साध रखी है। यही नहीं, मौखिक अनुरोध के बावजूद उन्होंने अभी तक बीओजी की बैठक के लिए कोई तिथि मुकर्रर नहीं की है। मिनट्स के संपुष्टि के अभाव में संस्थान के समक्ष एक संकटपूर्ण  स्थिति उत्पन्न हो गयी है क्योंकि चार महीने पहले हुए बीओजी की बैठक में जो निर्णय लिए गये थे वो अभी तक लागू नहीं हो पाए हैं। 8 जुलाई 2016 की बैठक के बाद बीओजी की अब तक सिर्फ़ एक विशेष बैठक हुई है। जबकि संस्थान के प्रावधान  के अनुसार प्रति वर्ष बीओजी की कम से कम दो साधारण बैठक होना अनिवार्य है।

सबसे बड़ी बात यह है कि चेयरमैन और सदस्यों के बीच न सिर्फ़ परस्पर गहरा मतभेद है बल्कि सदस्यों का चेयरमैन के प्रति गहरा अविश्वास है। प्रो गिरीश चंद्र त्रिपाठी जो बीएचयू के कुलपति और आईआईटी.बीएचयू के बीओजी के चेयरमैन हैं, लगातार छात्रों और शिक्षकों से संबंधित तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करते रहे हैं। अभी हुई तात्कालिक घटनाएं छात्राओं का विरोध और उन पर हुआ बर्बर लाठी चार्ज इस बात का प्रमाण है।   

अभी हाल में ही मीडिया के हवाले से ख़बरें आई हैं कि  हाल में बीएचयू की कार्यपरिषद की बैठक में प्रो गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने अपने तानाशाही और निरंकुश रवैए का परिचय दिया। और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी उनके इसी रवैए के चलते कार्य परिषद के सदस्य प्रो  मीशेल दनिनो ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया। शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ ही साथ बनारस के आम लोगों का यह मानना है कि प्रो त्रिपाठी का अपने पद पर बने रहना ; कुलपति होने के नाते बीएचयू के कार्यपरिषद और साथ ही आईआईटी.बीएचयू के बीओजी का चेयरमैन बने रहना न सिर्फ़ इन दोनो प्रतिष्ठित संस्थाओं के हित में नहीं है बल्कि इन पदों की गरिमा का अवमूल्यन है।  ऐसे में यह आवश्यक है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय राष्ट्रीय महत्व के इन दो संस्थानो के हितों की सुरक्षा के लिए तत्काल आवश्यक क़दम उठाये।

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Comments on “नया नहीं है प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी का मनमाना और तानाशाहीपूर्ण रवैया

  • yashwant singh says:

    शायद भारतीयों का डीएनए ही रेपिस्ट वाला है.. सदियों से चले आ रहे सामंती और पितृसत्तात्मक समाज का असर जो है..इन्हें देखिए… बस 11 साल के हैं ये. इनने 11 महीने की बच्ची से रेप किया. फिलहाल ये जेल यानि बाल सुधार गृह की हवा खा रहे हैं. यहां मुद्दा ये भी है कि 11 साल की उम्र में एक बच्चा कैसे सेक्सुअली एक्टिव हो जाता है? क्या गलत संगत का असर है या फोन में पोर्न वगैरा देखने से ऐसा हुआ या फिर कुछ और कारण… ये एक क्राइम केस के अलावा सामाजिक समस्या भी है…

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