संजीव चंदन-

मैंने जब सुना तो संभावना पर विचार करने लगा कि कैसे सम्भव है श्लोक पढ़ना सेक्स के दौरान। उत्तेजना के चरम के दौरान पढ़े जाने पर तो इसकी लय टूट जायेगी। संधियों से बनी पंक्तियाँ हैं इसमें-पाणिनि के बाद का श्लोक है, जो एक मात्रा के लाघव से पुत्र उत्पत्ति का सुख जताते हैं।
यदि फोर प्ले के दौरान है, तो उसमें इतने स्वरारोह हैं कि कर्ण सुख से अधिक आघात पैदा करते हैं इसके पाठ-इसमें विध्वंस है। सुख और चरम सुख विध्वंस से पैदा हों तो वह यौन आनंद का सुख बनेगा क्या ! सैडिस्ट सेक्स का कोई दृश्य है क्या फिल्म में, मैं यह सोच रहा था।
भक्त और मंत्री जी सोच रहे हैं कि ‘सेक्स’ जैसे ‘गंदे’ काम के दौरान ईश्वर-हे राम। और ईश्वर कहते हैं, गीता के ईश्वर कहते हैं कि कण-कण में हैं वे। सभी कर्मों के प्रेरक।
मैं सोच रहा हूँ कि यौन आनंद में मृत्यु की प्रेरणा, हत्या की प्रेरणा- बेहद क्रूर प्रसंग है:
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।।
(मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय मैं इन सब लोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ। तुम्हारे प्रतिपक्षमें जो योद्धालोग खड़े हैं, वे सब तुम्हारे युद्ध किये बिना भी नहीं रहेंगे।)
मैंने परमाणु के जनक ओपनहाइमर पर बनी ‘ओपनहाइमर’ फिल्म देखी नहीं है। अपनी प्रेमिका के साथ अंतरंग क्षणों में गीता के संहार-तर्क के इन श्लोकों को पढ़े जाने का दृश्य है शायद। इसपर जो बात होनी चाहिए थी वह वैसी नहीं जो भक्त और ‘हिंदुत्व’ के सिपाही कर रहे हैं।
बात तो यह होनी चाहिए थी कि ओपनहाइमर, जिसने परमाणु बनाया, जो अपने बम के इस्तेमाल से जापान के दो शहरों के नष्ट होने के बाद घोर निराशा में घिर गया, अवसाद से घिर गया, उसने अपने इंटरव्यू में गीता को प्रेरणा बताया था। बात इसकी होनी चाहिए थी कि गीता में नरसंहार के तर्क हैं। गीता हत्या को ‘वध’ बताते हुए उसे धार्मिक और दार्शनिक तर्क देती है। हिंदुत्व के आग्रही उसे अपना आदर्श बताते हैं और भारत के बहुत से लिबरल भी इसमें भारतीय दर्शन की उदात्तता देखते हैं।
शोक का विषय यह नहीं होना था कि सेक्स के दौरान गीता पढ़ी जा रही है, शोक यह होना चाहिए था कि ‘हमारा ग्रन्थ नरसंहार की प्रेरणा बना। ‘ दुखद है कि गीता को हिंदुत्व का आधार मानने वाली जमात नरसंहारों से थ्रील महसूस करती है और ओपनहाइमर जैसा विध्वंस सर्जक अपने विध्वंस के आविष्कार का असर देखकर आनृशंस से भर जाता है-अहिंसा परमो धर्मः की उतपत्ति यहीं से हुई है।
वह भूलकर भी उसके बाद अपने यौन आनंद को विध्वंस से नहीं भरेगा। जब देह की वीणा और उसकी तार उसे पुकार रही हो लय, तरंग और आनंद के लिए तब वह पांचजन्य नहीं बजायेगा। हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध-शुद्ध भारती का पाठ कैसे सम्भव है?
एक बात तो यह। दूसरा यदि सेक्स के दौरान युद्ध और विनाश के इस श्लोक की कल्पना निदेशक ने की है, अंतरराष्ट्रीय ख्याति का निदेशक तो जरूरत है उसके मर्दवाद को समझने की। कई बार सेक्स भी अपने अहम, अपने ईगो, अपने बदले, अपनी क्रूरता का हथियार बन जाता है, अपनी शक्ति का।
उदय प्रकाश की ‘पीली छत्री वाली लड़की’ याद है न। फिर भी प्रेम का आलिंगन प्रेमी को उसके बदले, उसकी क्रूरता के प्रति ग्लानि से भर भी देता है। यही प्रेम की ताकत है, यही सेक्स की। उस वक्त नायक नायिका कुरुक्षेत्र में नहीं होगा, वह तो कुञ्ज गलियन के रास में लिप्त होगा। फिल्म के ओपनहाइमर को, निदेशक को गीता से आगे भी पढ़ना चाहिए था, कृष्ण की रासलीला का आनंद वह जान पाता तो विराट कृष्ण नहीं उसे -छछिया भर छाछ पर नाचता एक बाळक कृष्ण, प्रेम के लय पर नाचता एक किशोर कृष्ण दिखता।
फिल्म के इस दृश्य में धर्म की हानि नहीं हो रही है प्रिय ‘गोली मारो मंत्री’, यहाँ प्रेम की हानि हो रही है, यहाँ स्त्रीवादी स्वपन को नुकसान पहुँच रहा है।
संजीव चंदन
25.7.2023


