राजकेश्वर सिंह-
पत्रकारों से बड़े शिष्टाचार से पेश आने वाले पूर्व मंत्री/गवर्नर माता प्रसाद का निधन
चंचल जी का लिखा बढ़िए! नीचे है। कभी राजनीतिक शिष्टाचार इस बुलंदी पर था, जहां पत्रकारों व राजनेताओं के बीच वैचारिक आदान-प्रदान बड़े मुकाम पर था। तब राजनेता, मंत्री और नौकरशाह पत्रकारों को न तो धमकाते थे और न गिरफ्तार कराते थे। FIR कराने का तो सवाल ही नहीं था, मंत्री/नेता आलोचनात्मक खबरों को अपने कामकाज में सुधार की ज़रूरत के रूप में लेते थे, लेकिन फिर तो ऐसा दौर आ गया कि यदि वाहवाही वाली पत्रकारिता नहीं की तो एक पत्रकार के साथ क्या होगा? समझा जा सकता है…दर्द की हद से गुजारे तो सभी जायेंगे…
चंचल-
‘जी! हम बीमार गवर्नर नहीं है आडवाणी जी! हमारा स्वास्थ्य ठीक है, धन्यवाद।’
वहां से शुरू करें – ‘दिनमान’ डूब चुका था। नए संपादक बने थे कन्हैया लाल नंदन। सुरेंद्र प्रताप सिंह दिल्ली आ गए थे या आने के जुगाड़ में थे। लेकिन नमूदार दिल्ली थे में। चौथी दुनिया अपने उरोज पर था। संतोष भारतीय संपादक थे, जिम्मेदारी से इस रिसाले को मकबूल करने में जो लोग लगे थे उसमें सब एक से बढ़ कर एक थे। राम कृपाल, कमर वहीद नकवी, अजय चौधरी (मरहूम) धीरेंद्र अस्थाना, राजीव कटारा, अर्चना झा, आलोक पुराणिक, सुनीता वगैरह। सुधेन्दु पटेल बाद में आये। इसी में यह खादिम भी जुड़ा रहा और जिम्मे था, मुख्तसर सा एक कालम था – लंमरदार कहते भये’/ इस कालम में हमें छूट थी कि मनमाफिक लिखो। लिखा। जम कर लिखा।
दिल्ली में उन दिनों पत्रकारों का ‘राष्ट्रीय कार्यक्रम’ किन्ही वाजिब पत्रकार के घर पर ही आयोजित होता था। एक दिन की सांझ पत्रकार उदयन शर्मा के घर पर आयोजित थी। सुरेंद्र प्रताप, राम कृपाल, नकवी जी अक्षय उपाध्याय यह खादिम सब हाजिर। उस दिन मेजबानी मिली थी राजीव शुक्ला को।
इतने में तीन कांग्रेस के धुरंधर आ पहुंचे। पंडित नारायण दत्त तिवारी, मुरली देवड़ा और तारिक अनवर। इनको देखते ही अक्षय उपाध्याय पर्दे के अंदर से ही चहके – वो ssss! आइये, न नर है न नारी है,,,,, । जोर का ठहाका उठा और हंसने वालों में नारायण दत्त तिवारी जी सबसे ऊपर थे। फिर तिवारी जी बोले – कहाँ है समाजवादी! चंचल भी हैं क्या? हम बाहर निकले और पंडित जी प्रणाम किये।
उन दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे नारायण दत्त तिवारी जी। हमारे बहुत अच्छे रिश्ते रहे। वे वित्त मंत्रालय भी देखते थे। उन्होंने उत्तर प्रदेश का बजट पेश किया था, जिसपर हमने अपने में लिखा था- ‘उत्तर प्रदेश बजट : न नर है न नारी है, ये नारायण दत्त तिवारी है।’
गो कि इस हेडिंग पर नकवी जी ने कहा था – चंचल जी! इसमें कुछ तब्दीली आ सकती है? हमने कहा बदला जा सकता है – उत्तर प्रदेश का बजट : गाय गाभिन, बरधा भी गाभिन।
राम कृपाल समेत जिसमे नकवी जी भी शामिल रहे जोर का ठहाका लगा और पहली ही हेडिंग ध्वनिमत से चौथी दुनिया मे चस्पा हो गयी। वही मुख्यमंत्री सामने बैठे हैं। न कोई मलाल न रंज। तिवारी जी ने पूछा जौनपुर के क्या हाल हैं? हमने कहा – कांग्रेस ने जौनपुर को सियासी नक़्शे से बाहर कर दिया।
- वो कैसे?
- आपके कैबिनेट में एक भी मंत्री जौनपुर से नहीं है
- कोई नाम बताओ जो होने के काबिल हों?
- माता प्रसाद जी
इधर तो ध्यान ही नहीं दिया। एक वायदा है मंत्रिमंडल विस्तार में जिम्मेदार ओहदे पर होंगे माता प्रसाद जी। उनके साथ बहुत अन्याय होता रहा है। और माता प्रसाद जी मंत्री बने, इसका अर्थ यह मत लगाइए कि माता प्रसाद जी को चंचल ने मंत्री बनवाया। कांग्रेस को मंत्रिमंडल बैलेंस करने के लिए एक पिछड़ी जाति को ऊपर लाना ही था सो माता प्रसाद जी को हरिजन होने का नीतिगत लाभ मिला और वे वित्त मंत्री बने। कालांतर में यही माता प्रसाद जी अरुणांचल प्रदेश के गवर्नर बने।
केंद्र से कांग्रेस की सरकार हटी और अटल जी सरकार के घरमंत्री बने आडवाणी जी को जो कई काम मिला, एक काम था, कांग्रेस के बनाये राज्यपालों को वापस बुलाने का। गिरोही आदत और चरित्र के अनुसार आडवाणी जी ने माता प्रसाद जी को फोन कर कहा कि आप स्वास्थ्य का बहाना बना कर इस्तीफा दे दीजिए। माता प्रसाद जी का क्या जवाब था – सबसे ऊपर लिख दिया है पढ़ लें। ये रहे माता प्रसाद जी। हटते-हटते गिरोह को उघार कर आये –
‘हम बीमार गवर्नर नही हैं आडवाणी जी! हमारा स्वास्थ्य ठीक है। धन्यवाद।’
उस समय के ‘आज तक’ की ब्रेकिंग न्यूज।
कल शाम, माता प्रसाद जी का स्वास्थ्य ही साथ छोड़ गया। अलविदा माता प्रसाद जी!



