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सियासत

इंडिगो के सामने सरकार ने समर्पण कर दिया!

पिछले दो दिन से इंडिगो एयरलाइन्स को लेकर भारत की जनता में जमकर नाराजगी पसरी है। उड्डयन मंत्रालय भी कुछ नहीं कर पा रहा है। हजारों उड़ाने रद्द हुईं। जनता को जमकर मूर्ख बनाया गया। कंपनियों ने सही मायनों में आपदा में अवसर खोजा और जमकर मनमानी कीमत वसूल की। अब लोग कह रहे हैं कि इंडिगो के सामने सरकार ने पूरी तरह घुटने टेक दिए। नीचे पढ़िए


डॉ मुकेश कुमार-

इंडिगो के सामने सरकार ने समर्पण कर दिया। पायलट और क्रू को उनके हाल पर छोड़ दिया। इंडिगो उनका शोषण जारी रखेगा। इंडिगो को दंडित नहीं किया जाएगा। राहुल गाँधी इसे ही मोनोपली कह रहे हैं। यही मोनोपली पूरे देश में दादागीरी चला रही है। हर सेक्टर में इनका शोषण और मनमानी चल रही है, मगर सरकार उनके साथ है इसलिए उनका बाल बांका नहीं होने वाला।


रवीश कुमार-

सरकार को झुकना ही था। जिस सरकार के पास ED है उसे इंडिगो ने झुका दिया। बड़ी बात है। बाकी यात्रियों की असुविधा के लिए इस देश में किसे खेद है? हज़ारों यात्रियों से लूटा गया है। भरोसा भी और पैसा भी। अब आदेश और जाँच का नाटक होगा लेकिन इंडिगो का काम हो गया। बाकी अगर अदाणी और टाटा बिजली काटने की धमकी दे दें, सरकार तुरंत बिजली बिल बढ़ाने की अनुमति दे देगी। हवाई यात्री की हालत बिहार जाने वाले रेल यात्री से भी बदतर हो गई है।


एंडी मुखर्जी-

यह जो दो कंपनियों का डुओपॉली था, उसने ग्राहकों को भी धोखा दिया, कर्मचारियों को भी निराश किया और उस नियामक (रेगुलेटर) को भी पूरी तरह बेइज्जत कर दिया जो “Too Big to Discipline” यानी इतना बड़ा कि उसे सज़ा देना ही मुश्किल—ऐसी स्थिति से निपटना ही नहीं जानता।

और चिंता की बात यह है कि भारत के लगभग हर सेक्टर में आर्थिक एकाग्रता (economic concentration) लगातार बढ़ रही है। कुछ हाथों में ताकत सिमटती जा रही है।

नतीजा? ऐसे ही हालात बार-बार देखने को मिलेंगे। डुओपॉली और मोनोपॉली—दोनों ही अंत में देश की अर्थव्यवस्था, उपभोक्ताओं और रोज़गार—तीनों को चोट पहुंचाते हैं।


गौरव पंधी-

इंडिगो के ध्वस्त होने ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राहुल गांधी 100% सही थे। पिछले साल अपने लेख में उन्होंने साफ चेतावनी दी थी—मोदी का नकली अर्थतंत्र, जिसे चंद मोनोपॉली दोस्त और रिग्ड डील्स चला रहे हैं, आखिरकार आम लोगों को ही कुचल देगा।

और अब देखिए नतीजा—एक ही एयरलाइन, जिसके पास लगभग 60% मार्केट शेयर था, जब ठप हुई तो पूरा देश रनवे पर अटक गया!

यह वही होता है जब किसी देश की अर्थव्यवस्था मोनोपॉलियों के भरोसे चलने लगे। बंदरगाह, हवाईअड्डे, टेलीकॉम—हर जगह वही कहानी। मोनोपॉली देश को कभी महान नहीं बनाती। कभी नहीं।


कुणाल शुक्ला-

कलयुग के इस अमृतकाल में ज़िम्मेदारी का अभाव है, हज़ारों हवाई यात्रियों की परेशानी और मुसीबत का ज़िम्मेदार कौन?

दरअसल इस अमृतकाल में ट्रेनों को झंडी दिखाने से लेकर थाली-ताली बजाने जैसे भव्य इवेंट तो समय-समय पर आयोजित होते रहते हैं, लेकिन असल ज़िम्मेदारियों को तय करने और निभाने का कोई ठोस इरादा नज़र नहीं आता। विमानन क्षेत्र इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है, जहाँ हज़ारों यात्रियों की परेशानी को अनदेखा कर दिया गया।

नवंबर 2025 में इंडिगो एयरलाइंस ने कुल 1,232 फ्लाइटें रद्द कीं। दिसंबर 2025 (5 दिसंबर तक) में यह संख्या 1,300 से अधिक हो चुकी है, जिसमें 3 दिसंबर को 200+, 4 दिसंबर को 550+, और 5 दिसंबर को 400+ फ्लाइटें शामिल हैं।

ये आंकड़े डीजीसीए (DGCA) की रिपोर्ट और विभिन्न न्यूज़ स्रोतों पर आधारित हैं, जो क्रू शॉर्टेज, नई फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिट (FDTL) नियमों, मौसम और तकनीकी खराबियों को मुख्य कारण बताते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये बहाने पर्याप्त हैं? सरकार और रेगुलेटर ने तो जाँच शुरू कर दी है, लेकिन मेरा सवाल है यात्रियों को मुआवज़ा या वैकल्पिक व्यवस्था कब मिलेगी?


गौरव सिंह सेंगर-

इंडिगो की गुंडई- DGCA और मंत्रालय नतमस्तक-

हज़ारों पैसेंजर को इंडिगो ने फँसाया.. DGCA ने Indigo के दबाव में फ़ैसला पलट दिया है,उड़ानें फिर सामान्य हो जाएगी लेकिन सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? पता नहीं…. जनता की परेशानी की किसे सज़ा क्या मिलेगी? पता नहीं…

जनता भगवान भरोसे या तो सिक्योरिटी मिलेगी या फिर उड़ान. इंडिगो की गुंडई यूँ ही चलेगी !!

हज़ारों यात्री परेशान हैं, किसी को विवाह में जाना था, किसी को अस्पताल जाना था, किसी को महत्वपूर्ण बैठक में जाना था, उनका प्लान बर्बाद हो गया, इंडिगो ने सॉरी बोल के मामला रफा दफा कर दिया, DGCA और मंत्रालय इंडिगो की बजाई धुन पर नाच रहें हैं, इन्हें अपना काम काज भी इंडिगो को सौंप देना चाहिए!


खुशदीप सहगल-

कौन सुनेगा, किसको सुनाएं…देश के एयरपोर्ट्स पर फंसे हज़ारों यात्रियों का यही हाल है. मसला इंडिगो और उसके पायलट्स-क्रू मेम्बर्स के बीच का, भुगतना पड़ रहा बेचारे यात्रियों को…

DGCA के आदेश देश की सबसे बड़ी एयरलाइंस (इंडिगो) ने नहीं माने तो ये देखना किसकी ज़िम्मेदारी थी? नए FDTL (फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिट) नियमों के तहत, पायलटों के लिए साप्ताहिक आराम की अवधि 36 घंटे से बढ़ाकर 48 घंटे कर दी गई. रात में लैंडिंग की संख्या पहले के छह से घटाकर दो कर दी गई…

और एयरलाइंस ने तो ये नियम मान लिए लेकिन इंडिगो ने नहीं. देश की कुल घरेलू उड़ानों में 62 फीसदी इंडिगो की होती है. इंडिगो के पायलट्स-क्रू मेंबर्स का ऐसी स्थिति में अधिक घंटे ड्यूटी देने से नाराज़ होना स्वाभाविक था. नतीजा सैंकड़ों फ्लाइट्स कैंसिल…

ऐसे में और एयरलाइंस ने यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाना शुरू कर दिया. अपने टिकट्स के दाम कई गुना बढ़ा दिए. ‘Surge Prices’ का हवाला दिया. वही Demand & Supply का तर्क. पहले तो मुझे ‘Surge Prices’ (ऊंचे किराए) का कंसेप्ट ही समझ नहीं आता. ‘One Flight, One Ticket’ का सिद्धांत यहां क्यों लागू नहीं. सिर्फ़ फ्लाइट ही नहीं ये ट्रेवल के हर साधन पर लागू होना चाहिए…

चलो एक बार मान भी लिया जाए कि Organic Demand बहुत ज़्यादा है तब Surge Price समझ भी आती है. लेकिन इंडिगो संकट तो एयरलाइंस के मिस मैनेजमेंट की वजह से हुआ, यहां भी ऊंचे किराए की मार पहले से बेहाल यात्रियों पर…

सुना है कि डीजीसीए ने ही कुछ नियम वापस ले लिए लेकिन इस गफ़लत के लिए इंडिगो पर कोई डंडा नहीं चला. इंडिगो से ऐसी क्या मुहब्बत है भाई…उड़ानों के कर्ताधर्ता मंत्री राम मोहन नायडू हैं…चंद्र बाबू नायडू के चहेते…वही चंद्र बाबू जिनके समर्थन पर ही सब टिका है…

ऐसे में कार्रवाई की उम्मीद करना बेमानी है…यात्रियों का क्या है, रो-खप कर चुप हो ही जाएंगे…मीडिया वालों रूसी राष्ट्रपति वापस चले गए हैं, अब ज़रा एयरपोर्ट्स पर भी नज़र दौड़ा लो…

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