सच्चे पत्रकार को चुनकर सम्मान खो चुकी संस्था के तेवर वापस लाएं!

Anil Kumar-

लंबे समय बाद मौका मिला है कि एक पत्रकार को चुनकर सम्मान खो चुकी संस्था को पुनः सम्मान दिलाया जाये. अध्यक्ष पद पर बहुतेरे लोग हैं, जिनका चरित्र सभी साथियों को पता है. ज्ञानेंद्र शुक्ला ऐसे पत्रकार हैं, जिन्होंने मीडिया करियर के उतार चढ़ाव के बीच बहुतेरे लोगों की तरह दलाली और कमीशनखोरी में करियर बनाने की बजाय बच्चों को पढ़ाने का सम्मानजनक पेशा चुनने को प्राथमिकता दी. मैथ से एमएससी करनेवाले ज्ञानेंद्र जी के लिए वोट इसलिए भी जरूरी है कि जो व्यक्ति अपने लिये सम्मानजनक राह चुनता है, वो कभी आपके सम्मान पर आंच नहीं आने देगा.

जाहिर है कि जब हम अपने लिए सम्मान जनक रास्ता नहीं तलाश सकते तो अपने साथियों को सम्मान दिलाना दूर की कौड़ी है. आपका लीडर दलाली में लिप्त होगा तो आपकी छवि भी दलाल की बनायेगा. इसलिए चुनाव के इस बेहतर मौके का उपयोग अपने लिए एक सम्मान पैदा करने वाले पत्रकार को अध्यक्ष बनाकर कीजिए. उम्मीद है कि जितने भी पढ़ने लिखने वाले पत्रकार हैं वो एक पत्रकार को प्राथमिकता देंगे किसी दलाल और पत्रकारिता का धंधा करने वाले को नहीं. धन्यवाद. जागो पत्रकारों.


Gyanendra Shukla-

यूपी मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव के संदर्भ में अपनों के लिए ख़त…

आप सभी अवगत हैं कि मैं यूपी मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहा हूं. चूंकि हमारी पत्रकार बिरादरी हमेशा सत्ता से पक्ष से विपक्ष से सवाल करती है. लिहाजा सवाल पूछे जाने व समझे जाने जरूरी हैं कि आंतरिक चुनावी प्रक्रिया में आखिर किन वजहों से मेरे जैसे बेहद आम पत्रकार को समिति के चुनावी दंगल में उतरना पड़ा… कामकाज को लेकर पत्रकारों को असुविधा से निजात पाने के लिए निर्मित हुई समिति में पहले आपसी सौहार्द से पदाधिकारियो का चयन हो जाता था.

मूर्धन्य पत्रकारों ने इस समिति की गरिमा में चार चांद लगाए. यूं तो समिति का कोई वैधानिक अस्तित्व नहीं रहा लेकिन स्वस्थ परंपराओँ ने इसका मान सदैव ऊंचा रखा. पत्रकारीय सरोकारों से जुड़े तमाम अहम मुद्दों को लेकर समिति के रुख को सत्ताधीश स्वीकृत देते रहे. पर बदलते वक्त के साथ समिति जेबी संस्था में तब्दील हुई तो इसकी साख व सम्मान धूमिल हुए. जिस समिति को मैंने पत्रकारिता जीवन के प्रारंभ से बेहद सम्मानित पाया बदलते वक्त के साथ उसकी साख पर बट्टा लगते देखना निजी तौर से निराशाजनक रहा. चूंकि तमाम मुद्दों को लेकर सदैव मुखर रहा हूं तंत्र-सरकार-पक्ष-विपक्ष की आलोचना करता रहा पर अपनी ही बिरादरी के भीतर पनप रही विसंगतियों को लेकर मुखर न होने की बेचैनी भी पलती रही. डेढ़ वर्ष पूर्व साजिशन केस में फंसाए गए एक जूनियर साथी की मदद को लेकर जब समिति के पदाधिकारियों से मदद का आग्रह किया गया तो तमाम किंतु-परंतु, मान्यता-गैर मान्यता, बड़े-छोटे के पेंच फंसाकर मदद से इंकार कर दिया गया हालांकि अदालत के जरिए न्याय की राह प्रशस्त हुई. पत्रकारों के खिलाफ केस हों या उनकी नौकरियों के संकट समिति ने रस्म अदायगी से अधिक कुछ नहीं किया जिसने दिल मे चुभन पैदा की. कोरोना काल में तो सबके मानिंद पत्रकारों पर भी कहर टूट गया. जब सारी जनता घरों में बंद थी तब स्वास्थ्य कर्मियों व खाकीधारियों की तरह पत्रकार भी तमाम खतरे उठाते बाहर थे. पर पत्रकारों को कोरोना वॉरियर्स का तमगा तक नहीं मिला, अपने फर्ज की अदायगी के दौरान तमाम पत्रकारों का निधन हो गया. हजारों की तादाद में नौकरियां छिन गईं, सैलरी में बेतहाशा कटौती कर दी गई. पर हमारी समिति मूकदर्शक बनी रही.

इस एक साल में बेहद आम पत्रकारों ने अपने सीमित संसाधनों के बूते तमाम साथियों की मदद की, पर निजी कोशिशों को छोड़ दें तो किसी ठोस मदद की न तो समिति की कोशिशें दिखीं न ही मंशा. जाहिर है जब बेहद मुश्किल दौर में पत्रकार बिरादरी को सहानुभूति व मदद की दरकार थी तो पत्रकारों के रहनुमा शांत व नदारद रहे. जब भी हमारी बिरादरी को मदद और साथ देने की जरूरत रही हमारे रहनुमा निजी हितों व आपसी खींचतान में ही मशगूल रहे हमें जायज मांगों तक को पूरा करने के लाले पड़ने लगे. तंत्र ने अपनी सहुलियत के लिहाज से मान्यता प्राप्त-गैर मान्यता प्राप्त, छोटे-बड़े पत्रकार के भेदभाव को बढ़ावा दिया. नतीजतन हमारे हालात बद से बदतर होते गए. छोटे-मंझोले अखबार निकालने वाले पत्रकारो के सामने अस्तित्व का संकट है. दुर्भाग्य से हमारे पेशे के लिए ये पंक्तियां सटीक हो रही हैं….

“हालाते जिस्म, सूरती—जाँ और भी ख़राब
चारों तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब”.

इन भयावह हालातो में ये साफ हो गया कि जब तक समिति में मौजूदा निजाम कायम रहेगा तब तक हम पत्रकारों की बात और जज्बात सत्ता-समाज-सियासत के सामने ठोस तरीके से रखना नामुमकिन होगा. पर बात वहीं आकर फंसी दिखी कि आखिर बदलाव हो कैसे, साम-दाम-दंड-भेद-छल-कपट से जीत का व्यूह रचने वालों से मुकाबले के लिए कौन आहूति दे?कौन आगे आए? पर कहते हैं कि सिर्फ आलोचना करने/ उंगली उठाने/सवाल करने से बात नहीं बनती.. किसी न किसी पत्रकार को आगे आना ही पड़ता तो मेरे जैसे साधारण पत्रकार ने झिझक व संकोच तोड़ आगे बढ़ने का बीड़ा उठाया. समिति को जेबी संगठन के ठप्पे से मुक्त करने के लिए मैंने खुद को अर्पित करने का निर्णय लिया. समिति पर कब्जेदारी की श्रंखला तोड़ने की कड़ी में ये भी संकल्प लेता हूं कि चुने जाने के बाद दोबारा इस पद के लिए दावेदारी कदापि नहीं करूंगा. इस संकल्प के साथ मैदान हूं कि आम पत्रकारो की आवाज मजबूती से उठाऊंगा, आसमानी तारे तोड़ लाने का वायदा तो नहीं करता पर ये पुख्ता भरोसा जरूर दिलाता हूं कि समिति की साख व सम्मान को इस कदर मजबूत करूंगा कि हमारी बिरादरी की छवि पक्ष-विपक्ष-तंत्र के सामने निखर सकेगी…रोजी-रोटी-सम्मान का हक़ पाने के साथ छोटे-बड़े की विसंगति को हटाकर हम अपनी बात व मुद्दों को ठोस तरीके से रख सकेंगे.

शायद छल-छद्म-धनबल-कपट की इस निर्णायक लड़ाई में पत्रकार साथियो का स्नेह और विश्वास मेरा हौसला है….इन पंक्तियो के साथ अल्प विराम लेता हूं..

“यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है
हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है”

ज्ञानेन्द्र कुमार शुक्ला
प्रत्याशी, अध्यक्ष पद
यूपी मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति, लखनऊ

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