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साहित्य

‘बखेड़ापुर’ वाले हरेप्रकाश उपाध्याय का जन्मदिन : छोटे से कद के इस इंसान की खोपड़ी गज़ब है!

द्वारिका प्रसाद अग्रवाल-

छोटे से कद के इस इंसान की खोपड़ी गज़ब है. ‘बखेड़ापुर’ नामक उपन्यास से इस लेखक ने हिंदी साहित्य के दरवाज़े पर जब दस्तक दी तो किसी को अनुमान नहीं था कि यह ठिगना मनुष्य अपना जीवन साहित्य को सौंपने का निर्णय ले चुका है.

हरे प्रकाश उपाध्याय का उपन्यास ‘बखेड़ापुर’ हमारे भारत के गांवों की निर्मम चित्रकथा है। बखेड़ा का अर्थ है- विवाद जबकि इस ‘बखेड़ापुर’ में उद्घाटित तथ्य निर्विवाद से लगते हैं। उपन्यास में कालखंड की चर्चा नहीं है इसलिए एक प्रश्न खड़ा हो गया है कि सुदूर ग्रामीण अंचलों में क्या हमारा भारत अब भी ऐसा है?

गाँव और गरीबी का चोली-दामन का साथ होता है, गरीबी का अभाव के साथ, अभाव का मजबूरी के साथ और मजबूरी का शोषण के साथ. यह दुष्चक्र इस तरह मनुष्यता को ध्वस्त करता है कि मनुष्य के पास उसका हाड़-मांस भर रह जाता है, कोई जैसा चाहे व्यवहार कर ले. ‘बखेड़ापुर’ उसी व्यवस्था की करुण महागाथा है.

इस कृति के चौदह, पंद्रह और सोलहवें अध्याय में वर्णित पात्र भूअर के बीमारी, उसका उपचार और उसकी परिणिति के विवरण को हरे प्रकाश ने ऐसी विलक्षणता से लिखा है कि पाठक का दिल दहल जाए. इन तीन अध्यायों को ‘रक्त में डुबाकर कलम से लिखी गई’ जैसी उपमा दी जा सकती है. यह उस भारत की तस्वीर है जिसे हम महान कहते हैं जबकि हमें आज भी अपने देश में ऐसा ‘होने’ पर शर्मिन्दा होना चाहिए.

इस कथा को पढ़ते हुए बरबस ‘राग दरबारी’ (श्रीलाल शुक्ल) की याद आती है क्योंकि दोनों कथाएँ ग्रामीण परिवेश पर लिखी गई और एक सी शैली में पिरोई गई हैं, फिर भी, ऐसा समझ में आता है कि गरीबी और बेरोजगारी की जो ज़द्द-ओ-ज़हद ‘राग दरबारी’ में छूट गई थी उस कमी को ‘बखेड़ापुर’ ने दूर कर दिया.

एक साहित्यिक पत्रिका शुरू की, ‘मंतव्य’, जो देखते ही देखते हिंदी साहित्य के आकाश में चमकते सितारे की तरह स्थापित हो गयी. साल भर बीता नहीं कि एक प्रकाशन संस्था शुरू कर दी, ‘रश्मि प्रकाशन’, देश भर के आलसी प्रकाशकों के मुंह पर करार तमाचा. मालूम नहीं, क्या हुनर है इसके पास, जिस काम में हाथ डालता है, चमक जाता है.

मेरा अनुमान है कि यह व्यक्ति न किसी नौकरी में है, न कोई व्यापार है; भला कैसे अपना परिवार चलाता होगा!

आज जन्मदिन है मेरे इस अद्भुत मित्र का. मुझे अपूर्व संतोष है आपसे इनका परिचय करवाने में…Hareprakash Upadhyay मैं अपनी और आपकी ओर से भी बधाई दे रहा हूँ…युग-युग जियो और अपने जैसी नयी पौध तैयार करो ताकि हिन्दी साहित्य की यह बेल सब तरफ फैले और तुम्हारे जैसे साहित्यानुरागी घर-घर में जन्म लें.

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