
मुकेश माथुर-
प्रेस फ्रीडम के मामले में दुनिया के नंबर एक देश नॉर्वे की 28 वर्षीया पत्रकार helle lyng को प्रेस फ्रीडम में 157 नंबर के हमारे देश के काले कोट वाले प्राइम टाइम पत्रकार- भारत की छवि ख़राब करने वाली बता रहे हैं।
सवाल पूछने वाले पेशे के ये लोग ऐसा इस पत्रकार द्वारा प्रधानमंत्री मोदी से नॉर्वे दौरे के दौरान सवाल पूछ लिए जाने पर कह रहे हैं। सत्ता से सवाल पूछने से छवि खराब होती है या सवाल न पूछने से, यह नंबर 1 और नंबर 157 के 156 अंकों के अंतर से पता चलता होगा।
“भारत में मानवाधिकार हनन” का सवाल क्यों पूछा इससे भारत की छवि ख़राब हुई है ऐसा काले कोट वालों का कहना है। क्यों न पूछे, आप और आपके साथी पत्रकार भी मॉस्को में पुतिन से ‘थकते क्यों नहीं’ की जगह यूक्रेन में कितने बेगुनाह सिविलियंस की हत्या युद्ध में हुई है यह पूछ सकते थे।
सवाल पूछना पत्रकार का हक है जवाबदेह लोग तार्किक जवाब देकर बता देते कि- तुम्हारा सवाल आधारहीन है।
बहरहाल इस 28 वर्षीया पत्रकार का इंस्टाग्राम पेज सवाल पूछने के बाद से सस्पेंड हो गया है। आई बड़ी आजादी की बातें करने वाली।
विदेशी धरती पर एक सवाल उठा, जिसने भारत की पत्रकारिता को दो हिस्सों में बांट दिया है। it सेल के कार्यकर्ताओं को भी काम मिल गया, जो अभी तक इस बात से बेचैन थे कि लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष की विदेश यात्राओं पर जनमानस में खास चर्चा नहीं हुई। यहां तक कि गठबंधन के लोगों ने भी उसे आगे नहीं बढ़ाया। किसी भी सवाल का अगर तत्काल जवाब दिया जाए तो वह सवाल ही समाप्त हो जाता है। किसी सवाल को पूछने वाले पत्रकार की चरित्र हत्या से जवाब नहीं निकलता, न बिकनी में तस्वीर पोस्ट करने पर। दरअसल एक विदेशी महिला पत्रकार ने भारत की पत्रकारिता को आईना दिखाया है।
-अरविंद कुमार सिंह
नॉर्वे में एक सवाल हुआ, इधर पापा की बिटिया रुबिका और अंजना एक्टिवेट हो गईं
आखिर कौन है ये पत्रकार
आखिर किसने दिया इसे भारत के प्रधानमंत्री से सवाल पूछने का साहस
आखिर कौन है इसके पीछे
आखिर क्यों भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा पर नॉर्वे की बर्फ से हमला किया गया
आखिर क्यों उस देश से सवाल आया जहां सूरज भी आधे साल छुट्टी पर रहता है
आखिर क्यों मोदी जी से पूछा गया कि आप सवाल क्यों नहीं लेते
आखिर यह सवाल था या भारत के लोकतांत्रिक गौरव पर विदेशी कील ठोकने की कोशिश
आखिर यह पत्रकार कौन है
क्या यह सिर्फ पत्रकार है
या पत्रकार के भेष में प्रश्नचिह्न गैंग की अंतरराष्ट्रीय शाखा
क्या इसके पीछे वही ताकतें हैं जो नहीं चाहतीं कि भारत आगे बढ़े
क्या इसके पीछे वही लॉबी है जो भारत को विश्वगुरु बनते नहीं देख पा रही
क्या इसके पीछे वही विदेशी मीडिया है जिसे भारत की सड़कें तो दिखती हैं लेकिन वंदे भारत का दरवाज़ा नहीं दिखता
क्या यह वही इकोसिस्टम है जिसे भारत का चंद्रयान दिखता है तो पेट में दर्द होता है
क्या यह वही गैंग है जो पूछता है प्रेस फ्रीडम, लेकिन कभी नहीं पूछता कि नॉर्वे में समोसे क्यों नहीं मिलते
देश जानना चाहता है
पहले यह बताइए कि सवाल पूछने से पहले आपने नमस्ते किया था या नहीं
आपने भारत की परंपरा का सम्मान किया था या नहीं
आपने अपने सवाल में योग का उल्लेख क्यों नहीं किया
आपने आयुर्वेद का नाम क्यों नहीं लिया
आपने प्रधानमंत्री से सवाल पूछा, लेकिन क्या कभी अपने देश की सरकार से पूछा कि आपकी आबादी हमारी एक कॉलोनी से कम क्यों है
बात सिर्फ एक सवाल की नहीं है
बात भारत के सम्मान की है
बात 140 करोड़ भारतीयों की भावना की है
बात उस तिरंगे की है जिसे देखकर कुछ लोगों का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है
बात उस विकास की है जिसे विदेशी मीडिया चश्मा लगाकर भी नहीं देख पाता
और आज मैं पूछना चाहती हूं
क्यों…क्यों….आखिर क्यों?
क्योंकि सवाल पूछना आसान है
लेकिन सवाल पूछने वाले से सवाल पूछना असली पत्रकारिता है
आप पूछेंगी मोदी जी सवाल क्यों नहीं लेते
हम पूछेंगे आप सवाल क्यों पूछती हैं
आप पूछेंगी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं होती
हम पूछेंगे आपकी नीयत प्रेस वाली है या प्रेशर वाली
आप पूछेंगी मीडिया स्वतंत्र है या नहीं
हम पूछेंगे आपने यह सवाल अंग्रेज़ी में क्यों पूछा, हिंदी में क्यों नहीं पूछा, संस्कृत में क्यों नहीं पूछा, और अगर पूछा भी तो पूछने से पहले भारत माता की जय क्यों नहीं बोला
क्योंकि सीधी सी बात है भामाकीजै से पहले बोला कोई भी वाक्य अपने आप प्रमाणित हो जाता है, उसके बाद अगर आप सबूत मांगते हैं तो समझिए आपकी आत्मा में विदेशी निवेश आ चुका है, भामाकीजै से पहले अगर कहा गया है कि भिंडी दरअसल जलपरी की उंगली है, तो है, ना नुकुर करने वाले तेरा मुँह सोरोस
आखिर कौन सिखा रहा है विदेशी पत्रकारों को ये सवाल
कौन भेज रहा है इन्हें
किसके इशारे पर नॉर्वे की ठंडी हवाओं से भारत पर गर्म हमला किया जा रहा है
क्या यह संयोग है कि नॉर्वे में बर्फ गिरती है और सवाल भी वहीं से गिरा
क्या यह संयोग है कि सवाल सफेद देश से आया
क्या यह संयोग है कि पत्रकार ने प्रधानमंत्री को चलते हुए रोका
चलते हुए आदमी को रोकना क्या भारतीय संस्कृति में ठीक माना गया है
क्या यह हमारी अतिथि देवो भव परंपरा पर हमला नहीं है
और सबसे बड़ा सवाल
जब प्रधानमंत्री आगे बढ़ गए तो आप भी आगे क्यों नहीं बढ़ीं
रुक क्यों गईं
क्यों अटक गईं
क्यों रिकॉर्ड किया
क्यों वायरल किया
क्यों बताया दुनिया को कि आपने सवाल पूछा
क्या यह पत्रकारिता है या कंटेंट क्रिएशन
हमारे साथ पैनल में हैं चार मेहमान
एक कहेंगे यह विदेशी साज़िश है
दूसरे कहेंगे यह भारत की छवि बिगाड़ने की कोशिश है
तीसरे कहेंगे नेहरू जिम्मेदार हैं
चौथे को हम बोलने नहीं देंगे क्योंकि वो मुद्दे पर आ जाएगा
लेकिन ब्रेक से पहले बड़ा सवाल
क्या विदेशी मीडिया भारत की तरक्की से परेशान है
क्या मोदी जी का चुप रहना ही उनका सबसे बड़ा जवाब था
क्या जवाब न देना भी एक आध्यात्मिक उत्तर हो सकता है
क्या मौन ही नया मास्टरस्ट्रोक है
क्या प्रधानमंत्री ने कुछ न कहकर सब कह दिया
और क्या विदेशी पत्रकार उस मौन की गहराई समझने में विफल रही
ये सवाल नहीं है दोस्तों
ये हमला है
ये भारत पर हमला है
ये प्रधानमंत्री पर हमला है
ये उस भारत पर हमला है जो चाय से चला था और आज दुनिया को जवाब न देकर भी जवाब दे रहा है
और नॉर्वे की पत्रकार से हमारा सीधा सवाल
आपको भारत से समस्या क्या है
आपको मोदी जी से समस्या क्या है
आपको मौन से समस्या क्या है
आपको विकास से समस्या क्या है
आपको 140 करोड़ लोगों की सामूहिक चुप्पी से समस्या क्या है
आपको इन सारे सवालों के जवाब देने ही होंगे मैडम
उधर वो नॉर्वे की बिटिया का सीपीआर चल रहा है, सुनने में आया है इतने सवालों की अंधाधुंध फायरिंग में घायल हो गई है।-असीम तिवारी
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