गिरीश मालवीय-
भाई कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय पर RSS और प्रधानमंत्री मोदी का अपमान करने का आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज की गई है पिछले कुछ सालों में यह तीसरी एफआईआर है जो उनके खिलाफ दर्ज की गई है।
आखिरकार कार्टून से या कार्टूनिस्ट से यह सरकार इतनी डरती क्यों है? जवाब यह है कि सभी कलाओं में, कार्टून तानाशाहों के खिलाफ सबसे आगे खड़े हैं।”
“Of all the arts, cartoons stand on the frontline against dictators.”
यह तब है जब दुनिया के इतिहास में, कोई भी सरकार एक कार्टून के कारण नहीं गिरी है। न ही कार्टून के कारण किसी राजनेता को बदला गया, उसके बावजूद भी तानाशाह कार्टून से बहुत घबराते हैं।
दरअसल कार्टूनिस्ट उस निडर छोटे बच्चे जैसा होता है जो सम्राट को यह बताने की हिम्मत रखता है कि उसने कोई कपड़े नहीं पहने हैं वह नंगा है,
समाचार पत्रों के स्वर्णिम काल में एक कार्टून को हजारों शब्दों के बराबर माना जाता रहा है यह कहा जाता था कि किन्हीं विषयों पर एक लंबा चौड़ा संपादकीय जितनी गहराई से अपनी बात नहीं कह पाता वह एक छोटा सा कार्टून कह देता है। इंटरनेट के इस वायरल होने युग में तो कार्टून अब ओर अधिक मारक हो गया है। जमाना बहुत बदल गया है।
मजे की बात है कि हेमंत के खिलाफ यह FIR इंदौर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने दर्ज कराई है 1990 के दशक में भारत के केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी , जो संघ के आजीवन सदस्य भी रहे हैं उन्होंने एक दिन देश के जाने-माने कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग को फोन किया और पूछा कि “तुम मुझसे गुस्सा क्यों हो?” तैलंग ने हैरान होकर जवाब दिया। “लेकिन मैंने आज आपका कोई कार्टून नहीं बनाया।” जोशी जी ने गहरी सांस ली और कहा….”यही तो समस्या है,” ….. “मैं छह महीने से आपके कार्टून में नहीं हूं।
क्या मैं भारत के राजनीतिक जीवन में इतना महत्वहीन हो गया हूं?”
पिछली सदी के अंत तक, एक नेता को उसकी अखबार में छपी फोटो के बजाय उसके कैरीकेचर से ज्यादा पहचाना जाता था।पुराने नेता अपने ऊपर बनाए कार्टून का संग्रह करते थे और इन्हें अपने दफ्तर में लगाया करते थे। क्योंकि वे कार्टूनों को जनता से सीधे जुड़ने का साधन मानते थे।
इंदिरा गाँधी ने, नेहरू पर बनाए गए शंकर पिल्लई के कार्टूनों के संग्रह की अपनी प्रस्तावना में लिखा था, ‘‘कार्टून आधुनिक समाज के प्रबुद्ध जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। कुछ निंदा के इरादे के बिना कार्टून बनाते हैं, कुछ मुखौटा हटाते हैं और समाज को आईना दिखाते हैं। थोड़े बहुत असम्मान के बिना कोई कार्टून नहीं बन सकता।’’
1990 में कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग को तत्कालीन सरकार ने एक बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी उपलब्ध कराया…. छह महीने बाद तैलंग ने उसे रखने से इनकार कर दिया तैलंग ने कहा कि यह हास्यास्पद है क्योंकि कोई भी कार्टूनिस्ट पर एक गोली बर्बाद नहीं करेगा। इस देश में मारे जाने के और भी योग्य लोग हैं,”
हम 1990 में नहीं है यह 2025 है यह नया भारत है।
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