
संजय कुमार सिंह-
आज हिन्दुस्तान टाइम्स का पहला पन्ना गागर में सागर है। दूसरे शब्दों में, देश के हालात बताने वाली ज्यादातर खबरें तो हैं ही, सिंगल कॉलम में गुजरात मॉडल का नमूना भी है। सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो मामले में अपने फैसले पर पुनर्विचार से इनकार कर दिया है। खबर से पता चलता है कि गुजरात सरकार यह भी चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट की फैसले में की गई सख्त टिप्पणियों की समीक्षा कर उन्हें हटाया जाये। यह खबर मेरे दोनों हिन्दी अखबारों – अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर नहीं है। द टेलीग्राफ में तीन कॉलम का फ्लैग शीर्षक है, 11 लोगों को जेल भेजने में कोई गलती नहीं, राहत पर कोई समीक्षा नहीं। आज टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और अमर उजाला की लीड का शीर्षक महत्वपूर्ण है। सब एक जैसे ही हैं इसलिए मैं अमर उजाला को उद्धृत कर रहा हूं – “जेल में रखने के लिए जमानत शर्तें नहीं हो सकतीं औजार : सुप्रीम कोर्ट”। जब किसी को जेल में रखने की कोशिश की गई तो तमिलनाडु के पूर्व मंत्री सेंथिल बालाजी को जमानत का मामला भी ऐसा ही है। द हिन्दू में आज यह खबर लीड है। गैर पत्रकार यू ट्यूबर जो सेलिब्रिटी होने के बावजूद राजनीति में न होने और दूसरे कारणों से आम नागरिक की ही श्रेणी में है उसकी खबर पहले पन्ने पर छपने से लग रहा है कि ईडी सामान्य ढंग से भी काम करता है। गैर राजनीतिक मामले भी उसके पास है। हालांकि, लोगों को जेल में रखने की सरकारी कोशिशों में की जांच पीएमएलए के तहत करने का मामला भी हो सकता है। यह खबर आज अकेले अमर उजाला में पहले पन्ने पर है।
शीर्षक है, “यू ट्यूबर एल्विश यादव व गायक फाजिलपुरिया की 55 लाख रुपये की संपत्ति अटैच”। उपशीर्षक है, कोबरा कांड में ईडी की कार्रवाई (चल रही है), यू ट्यूब से कमाये थे 52 लाख। खबर के अनुसार ईडी ने यह कार्रवाई मनी लांड्रिंग जांच के तहत की है। मामला यह है कि मेनका गांधी की संस्था पीपुल्स फॉर एनिमल्स ने एल्विश समेत छह लोगों के खिलाफ वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत केस दर्ज कराया था। उसपर रेव पार्टियों में सांप व सांप का जहर उपलब्ध कराने का आरोप है। बेशक मामला पीएमएलए का हो सकता है पर जिसे 52 लाख यू ट्यूब से मिले हैं उसकी 55 लाख की संपत्ति जब्त होने से लग रहा है कि देश में, “ना खाउंगा ना खाने दूंगा” वाकई लागू हो गया है। वह भी तब जब सबको पता है कि 20,000 करोड़ रुपये के मामले में कार्रवाई नहीं हुई है और उसके कारण के रूप में कई तरह से कई लाख कमाने के उदाहरण और आरोप हैं और उन मामलों में लाभार्थी के इनकार को स्वीकार कर लिया गया है। और तो और, लोकपाल कह चुके हैं कि इस मामले में और सबूत चाहिये। आज ही खबर है, कर्नाटक के मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं देंगे और सीबीआई को दी गई आम सहमति वापस ले ली गई है। यह भी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी करेगा।
सरकार ने जो किया है और कर रही है उसकी हालत मोटा-मोटी यही है। इन्हें कुछ प्रमुख उदाहरण भी मान सकते हैं। ऐसे में कश्मीर और हरियाणा में चुनाव प्रचार चल रहे हैं और मुकाबला सत्तारूढ़ भाजपा व इंडिया गठबंधन में है। कल खबर थी कि हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने भी उत्तर प्रदेश सरकार की तरह भोजनालयों के मालिकों का नाम सार्वजनिक तौर पर लिखना अनिवार्य कर दिया है। इस पर कल एक मित्र ने कहा कि राहुल गांधी को पहले कांग्रेस के संघियों से निपटना होगा उसके बाद ही वे भाजपा से निपट पायेंगे। आज इंडियन एक्सप्रेस में टॉप पर खबर है, मंत्री ने कांग्रेस को नाराज किया, समन किये गये। जाहिर है, खबर यह भी हो सकती थी कि कांग्रेस भाजपा नहीं है या होगी। भाजपा जैसा काम करने वाले कांग्रेसी मंत्री को समन किया गया। हिन्दुस्तान टाइम्स में शीर्षक है, “भोजनालयों में नाम लिखने पर अभी कोई निर्णय नहीं कांग्रेस में हंगामे के बीच हिमाचल प्रदेश में पुनर्विचार।” इसे कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई या मतभेद के रूप में पेश किया ही जा सकता है। तथ्य यह है कि भाजपा शासित दूसरे राज्यों में यह आदेश नहीं है तो भाजपा में ही इसे लेकर सहमति नहीं है या डबल इंजन वाला बहुप्रचारित मामला नहीं है। लेकिन यही पत्रकारिता है और यही पत्रकारिता की आजादी है जिसे जर्नलिज्म ऑफ करेज भी कहा जाता है।
आप जानते हैं कि खाने-पीने की चीजें बेचने वालों का नाम लिखने की शुरुआत कब और किसलिये हुई थी और उसपर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई के बाद मामला रेस्त्रां और ढाबों की ओर भी बढ़ गया है। इस बीच बैसाखी सरकार ने तिरुपति के प्रसाद में मिलावट और फिर मिलावटी घी का उपयोग किये जाने का मामला बनाया और भारत जैसे देश में यह सेबी के घोटालों से ज्यादा चर्चित हुआ। उधर घी के पुराने आपूर्तिकर्ता की जांच हो रही है और बदल तो उसे पहले दिया गया था। पता नहीं सरकार बदलने के बाद या पहले। जो भी हो, वह मामला पूरी तरह संदिग्ध है और उस पर कई सवाल हैं पर वह अलग मुद्दा है। घी में जानवर की चर्बी साबित करने के लिए कितने दूध से कितना घी बनता है और शुद्ध घी का भाव न्यूनतम 1200-1500 रुपये किलो होना चाहिये जैसा प्रचार किया गया जबकि मैं बचपन से देख रहा हूं कि जरूरत भर घी मलाई से ही निकल जाता है। और लगभग मुफ्त का होता है। बनाते समय कुछ और चीजें निकलती हैं, सो अलग। अगर सस्ते घी में मिलावट की बात की जाये तो पूजा के लिए सस्ता घी मिलता है और उसका उपयोग खूब होता है। उसपर लिखा होता है कि खाने के लिए नहीं है पर मिलावट तो पूजा योग्य होता ही है।
जो भी हो, घी में मिलावट की खबरों के मद्देनजर आज नवोदय टाइम्स में एक दिलचस्प खबर है, मथुरा-प्रयागराज के मंदिरों में चढ़ेगा फल, मिश्री का प्रसाद। लड्डू में मिलावट की खबरों के मद्देनजर अब लड्डू-पेड़ा प्रसाद नहीं होगा यह मेरे जैसे पुजारियों के लिए दुखद है। फल के साथ समस्या तो बेचने वाले से जुड़ी है। इसीलिए फलों के ठेले पर नाम बेचने वाले का नाम लिखने के लिए कहा गया था। अब आज की खबर को कैसे देखा जाये, आप तय कीजिये। जहां तक प्रसाद में फल की बात है, मैंने बचपन में ही गौर किया था कि कुछ घरों में प्रसाद के रूप में पूरा फल मिलता था, कुछ जगह कटा हुआ। कहीं-कहीं पानी फल सिंघाड़ा, बैर, जामुन और अंगूर जैसे छोटे फल ही। बाद में समझ में आया कि मामला हैसियत और पैसे से जुड़ा था। मैंने मान लिया था कि इसीलिए मोहल्ले के मंदिरों में प्रसाद बूंदी का हुआ करता था क्योंकि हर व्यक्ति को बूंदी का एक लड्डू देना महंगा पड़ता। बूंदी लड्डू वाली नहीं होती थी सो अलग। बंगाल के पास के जमशेदुपर में वह बूंदी मीहीदाना (महीन दाने) के नाम से बिकती थी पर उसकी अलग कहानी है। गुरद्वारे के प्रसाद हलवे के बारे में भी मेरा यही मानना था और जब तक नहीं गया था तब तक सोचता था कि जो भर पेट खाना खिलाते हैं वो प्रसाद में पूरा लड्डू क्यों नहीं देते (लड्डू तोड़कर) हलवा क्यों बना देते हैं। जब गया तो पता चला कि प्रसाद एक लड्डू से ज्यादा होता है और कई बार दो से थोड़ा ही कम। समस्या फल और लड्डू दोनों में है और नहीं है तो दोनों में नहीं।
माहौल को बेबात सांप्रदायिक बनाने की कोशिशें बताने के बाद चुनाव प्रचार पर आता हूं। नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार, राहुल गांधी ने एक चुनावी रैली में कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने व्यवस्थित रूप से रोजगार व्यवस्था को खत्म किया है। मैं इससे शत प्रतिशत सहमत हूं और राहुल गांधी से पहले से लिख रहा हूं। पर यह खबर आज कहीं और नहीं दिखी। दूसरी ओर, भाजपा की ओर से दावा किया जा रहा है और नवोदय टाइम्स में वह भी पहले पन्ने पर है। अमित शाह ने कहा है – आतंकवाद को दफना दिया गया है उसे लौटने नहीं दिया जायेगा। यही नहीं, उन्होंने आगे कहा है और यह उपशीर्षक है, नेशनल कांफ्रेंस – कांग्रेस सत्ता में लौटी तो लागू करेगा पाक का एजंडा। आप जानते हैं कि कश्मीर में भाजपा सहयोगी दल के साथ सत्ता में थी। उससे गठबंधन टूट गया सरकार गिर गई। अनुच्छेद 370 हटा, पांच साल चुनाव नहीं हुए और अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हो रहे हैं तो भाजपा अपना काम, अपनी योजना नहीं बता रही है कांग्रेस और विपक्ष की आलोचना कर रही है वह भी निराधार। वैसे ही जैसे कर्नाटक में किया था फिर भी हार गई। इससे लगता है कि उसके पास कुछ नया है नहीं पर वह अलग मुद्दा है।
आप जानते हैं कि कोई भी, कुछ भी नहीं बोल सकता है और मोदी के खिलाफ बोलने के लिए राहुल गांधी की शिकायत हुई थी और सजा भी हुई। संसद की उनकी सदस्यता तक चली गई, बंगला खाली करना पड़ा आदि आदि। अब आज खबर है कि शिवसेना नेता संजय राउत को 15 दिन की जेल और 25 हजार रुपये का जुर्माना हुआ है। इससे उनकी सदस्यता नहीं जायेगी पर कार्रवाई तो हुई है। खबरों के अनुसार उन्होंने भाजपा नेता किरीट सोमैया और उनकी पत्नी पर 100 करोड़ रुपये के घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया था और सबूत नहीं दे सके। आप जानते हैं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री और दूसरे नेता बिना सबूत महीनों जेल में रहे (सिर्फ आरोप पर और उसमें अनुभवी चोर होने का प्रधानमंत्री का आरोप शामिल है)। दूसरी ओर भाजपा नेता पर घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाने भर से सजा हो गई। पुलिस जब आरोप लगाती है तो वह सरकार की तरफ से होता है, अदालत में साबित नहीं होता है और लोगों की बदनामी हो जाती है। पर कोई कार्रवाई नहीं होती। मुकदमा भी नहीं कर सकते हैं।
विपक्षी दल का नेता अगर सत्तारूढ़ पार्टी के नेता पर आरोप लगाये तो कार्रवाई होती है। यह व्यवस्था है और रेखांकित करने लायक है। ऐसे में न्यायपालिका और मुख्य न्यायाधीश से अपेक्षा की जाती है कि वे सरकार के साथ मिलकर काम नहीं करेंगे। लेकिन आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री गणेश पूजन करने प्रधानमंत्री के घर चले गये, इसका बचाव किया और उनके प्रचारकों में से एक, गौरव बल्लभ ने लेखकर लिखकर कहा कि यह मिलकर काम करना है। आप समझ सकते हैं, सरकार न्यायपालिका के साथ मिलकर कैसा काम करना चाहती है। संजय राउत ने इसपर सवाल उठाये हैं और अमर उजाला ने इसे मूल खबर के साथ प्रमुखता से छापा है। राउत ने कहा है कि पूरी न्यायपालिका ऊपर से नीचे तक आरएसएस से प्रभावित है। … मेरे जैसे लोगों को न्याय कैसे मिलेगा जब सीजेआई के घर पीएम मोदक खाने जाते हैं। मैं सत्र न्यायालय में अपील कर बताउंगा कि मेरे साथ कैसे अन्याय हुआ है।
ऐसी हालत में सरकार ने न्यूनतम मजदूरी में इजाफा किया है तो अमर उजाला ने इसे कामगारों को तोहफा कहा है। कल नवोदय टाइम्स में दो कॉलम की खबर थी, दिल्ली सरकार ने श्रमिकों का न्यूनतम वेतन बढ़ाया। यह खबर कल अमर उजाला में नहीं थी। आज अमर उजाला की खबर नवोदय टाइम्स में नहीं है और यह ठीक भी है कि एक सी कबर को क्या दोहराना। लेकिन मुद्दा यह है कि दिल्ली सरकार ने किया तो खबर नहीं या अंदर के पन्ने पर लेकिन केंद्र सरकार ने किया (जो उसका काम है और करना ही होता है) तो वह चार कॉलम में टॉप पर। आज के अखबारों में अरविन्द केजरीवाल का कहा भी छपा है, दिल्ली को तय करना है काम करने वाला चाहिये या रोकने वाला। आप जानते हैं कि अरविन्द केजरीवाल ने इसी को मुद्दा बनाने के लिए इस्तीफा दिया है और यह जरूरी नहीं था। पदपर रहकर वे भाजपा को चिढ़ा सकते थे कि उसकी पूरी कोशिश के बावजूद वे जमानत पर हैं केजरीवाल ने इसके मुकाबले यह कहना पसंद किया है तो यह उनकी राजनीति है और भाजपा के लिए परेशानी। इसलिये यह खबर आज वैसे नहीं छपी है जैसे छपनी चाहिये।
यह बड़ी बात है कि कोई नेता ऐसा कहते हुए अपने विरोधी सरकार पर काम रोकने वाला होने का आरोप लगा रहा है। यह खबर आज हिन्दुस्तान टाइम्स में भी है, यहां शीर्षक है – केजरीवाल ने कहा, जब नेताओं को जेल भेज दिया गया तो राजधानी में काम प्रभावित हुए। नवोदय टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, दिल्ली को तय करना है काम करने वाला चाहिये या रोकने वाला। आप जानते हैं कि अरविन्द केजरीवाल ने इसी को मुद्दा बनाने के लिए इस्तीफा दिया है और यह जरूरी नहीं था। पदपर रहकर वे भाजपा को चिढ़ा सकते थे कि उसकी पूरी कोशिश के बावजूद वे जमानत पर हैं केजरीवाल ने इसके मुकाबले यह कहना पसंद किया है तो यह उनकी राजनीति है और भाजपा के लिए परेशानी। इसलिये यह खबर आज वैसे नहीं छपी है जैसे छपनी चाहिये। यह बड़ी बात है कि कोई नेता ऐसा कहते हुए अपने विरोधी सरकार पर काम रोकने वाला होने का आरोप लगा रहा है। यह खबर आज हिन्दुस्तान टाइम्स में भी है, यहां शीर्षक है – केजरीवाल ने सहा, जब नेताओं को जेल भेज दिया गया तो राजधानी में काम प्रभावित हुए।
राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार में कल जो कहा और आज नवोदय टाइम्स में है वह तो आज अमर उजाला में नहीं ही है कल प्रधानमंत्री का कहा, कांग्रेस का शाही परिवार सबसे भ्रष्ट, दलालों और दामादों के हवाले किया जायेगा हरियाणा – दो कॉलम में था। इसका उल्लेख जरूरी है क्योंकि 56 ईंची प्रधानमंत्री ने दामाद यानी रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ कार्रवाई नहीं की (या पूरी कोशिश कर ली, कर नहीं पाये) फिर भी जो कहा वह खबर है जबकि कहने का मतलब नहीं है कि सरकार बनी तो ऐसा होगा। बेशक खबरों की प्राथमिकता तय करने का अधिकार संपादक का है और वह अपने विवेक से तय कर सकता है और यही अलग अखबारों की भिन्नता है वरना सब एक से हो जायेंगे और अलग अखबारों का कोई मतलब नहीं रहेगा। नैतिकता का तकाजा था कि ऐसे हवा-हवाई आरोप को जब राबर्ट वाड्रा ने चुनौती दी (अव्वल तो उनका पक्ष लेकर साथ छापना चाहिये था) तो उसे आज उसी प्रमुखता से छापते। राहुल गांधी का चुनाव प्रचार नहीं छाप रहे हैं तो वह संपादक की आजादी है। पाठकों की जानकारी के लिए राबर्ट वाड्रा ने कहा है, “मैं हैरान हूं कि प्रधानमंत्री ने एक बार फिर मेरे नाम का इस्तेमाल किया है। हरियाणा और केंद्र में उनकी अपनी सरकार है। वे जांच करा लें।” मीडिया से बातचीत में आगे कहा, “मैं जानता हूं कि पिछले दशक में उन्होंने आयोग बनाए हैं, ढींगरा आयोग ने मुझ पर और मेरी कंपनियों पर जांच की थी। हरियाणा में मेरी कितनी जमीन है, इसकी जांच के लिए आरटीआई आए थे। हमें हर तरह के नोटिस मिले हैं। हरियाणा में हम जो भी काम कर रहे थे, उसे रोक दिया गया। मैंने जिन कंपनियों से डील की, उन्हें नोटिस भेजे गए। इस तरह उन्होंने पिछले दशक में हर तरह के काम को बाधित करने की कोशिश की।” ज़ीन्यूज डॉट इंडिया डॉट कॉम से)। वाड्रा ने यह भी कहा, प्रधानमंत्री ने जिस तरह से ‘दलालों को’ और ‘दामादों को’ कहा है, वह अनुचित है।”


