दीपक शर्मा-
क्या IAS अफसरों में निष्ठा, गरिमा और नैतिकता की घोर कमी आई है?
निसंदेह IAS अफसर देश के सर्वोच्च प्रतिभावान वर्ग से आते हैं लेकिन धीरे-धीरे इस वर्ग ने नेता, कारपोरेट और मलाईदार पोस्टिंग के आगे सरेंडर कर दिया। इसका असर देश की नीतियों और प्रशासन पर पड़ा है।
ये लेख कुछ समय पहले पूर्व आरबीआई गवर्नर सुब्बाराव साहब ने लिखा था।
अगर आप इस मुल्क को सच में आगे ले जाना चाहते हैं तो ये लेख जरूर पढ़िये और दोस्तों को भेजिये!
आईपी सिंह-
1-क्या IAS ने राष्ट्र को विफल कर दिया है? हां, और यह पूरी तरह से राजनेताओं की गलती नहीं है। सेवा मध्यमता और जोखिम से बचने को पुरस्कृत करती है।
राष्ट्रीय IAS विफल हो गया है, इसका जवाब हां है—और यह जवाब मुझे बहुत दुख के साथ देना पड़ रहा है, हालांकि यह मेरा बहुत पुराना विचार नहीं है। आज की IAS, जो स्वतंत्रता के बाद से प्रशासनिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, वह उन लोगों से बनी है जो वास्तविकता से कटे हुए हैं, जो सामाजिक स्थिति और विशेषाधिकारों में डूबे हुए हैं और जिनके पास देश के प्रति प्रतिबद्धता की कमी है।
मेरे लिए यह हमेशा से ऐसा नहीं था। 1970 के दशक के मध्य में, जब मैं एक नया IAS अधिकारी था, तब सरकार में होना एक सम्मान की बात थी। उस समय विपक्षी दलों, खासकर CPM ने यह मांग की थी कि IAS को खत्म कर दिया जाए और उसकी जगह एक ऐसी व्यवस्था लाई जाए जो उनके विचारों के अनुरूप हो। लेकिन आज अगर CPM कहे कि IAS को खत्म कर देना चाहिए, तो शायद मैं उससे सहमत हो जाऊं।
यह तय करना मुश्किल है कि इस गिरावट की शुरुआत कब हुई। जब IAS की स्थापना स्वतंत्रता के बाद हुई थी, तब इसे देश के लिए एक महत्वपूर्ण संस्था माना गया था, जो एक अखंड और अविभाजित प्रशासनिक ढांचा प्रदान करती थी। लेकिन आज यह एक ऐसी संस्था बन गई है जो अक्षमता, भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी से जूझ रही है।
IAS अधिकारियों ने सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य और शिक्षा वितरण, बुनियादी ढांचा विकास, और कानून-व्यवस्था को लागू करने में विफलता दिखाई है। वे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, अक्षमता और नौकरशाही में उलझे हुए हैं। IAS को सुधार और नवाचार को बढ़ावा देने में असफल रहने का भी दोषी ठहराया जा सकता है।
यह दोहराना शुरूआती बात होगी कि IAS अपनी विफलताओं के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार नहीं है। राजनेताओं और उनके बुरे इरादों ने भी इसमें योगदान दिया है। लेकिन IAS को यह मानना होगा कि वे भी इस विफलता के लिए जिम्मेदार हैं।
IAS के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह प्रोत्साहन और दंड की एक गहरी त्रुटिपूर्ण प्रणाली है। कुछ लोग जो देश में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं में से हैं और युवा, तेज दिमाग वाले और उत्साह से भरे हुए हैं, वे बदलाव लाने के लिए प्रेरित होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वे सिस्टम में आगे बढ़ते हैं, वे योग्यता, कर्तव्यनिष्ठा और नैतिकता के पहियों में फंस जाते हैं, और धीरे-धीरे उनकी नैतिकता कमजोर हो जाती है।
IAS अधिकारियों को यह विश्वास करना चाहिए कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि राजनेता उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करते हैं। लेकिन आप जो भी परिणाम देते हैं, वह आपके दिल की बात नहीं है। मैंने बहुत से IAS अधिकारियों को देखा है जो छोटे-मोटे भ्रष्टाचार या अक्षमता में लिप्त थे, लेकिन 50% लोग खुशी-खुशी इसमें शामिल हो गए।
IAS के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह प्रोत्साहन और दंड की एक गहरी त्रुटिपूर्ण प्रणाली है। कुछ लोग जो देश में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं में से हैं और युवा, तेज दिमाग वाले और उत्साह से भरे हुए हैं, वे बदलाव लाने के लिए प्रेरित होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वे सिस्टम में आगे बढ़ते हैं, वे योग्यता, कर्तव्यनिष्ठा और नैतिकता के पहियों में फंस जाते हैं, और धीरे-धीरे उनकी नैतिकता कमजोर हो जाती है।
IAS अधिकारियों को यह विश्वास करना चाहिए कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि राजनेता उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करते हैं। लेकिन आप जो भी परिणाम देते हैं, वह आपके दिल की बात नहीं है। मैंने बहुत से IAS अधिकारियों को देखा है जो छोटे-मोटे भ्रष्टाचार या अक्षमता में लिप्त थे, लेकिन 50% लोग खुशी-खुशी इसमें शामिल हो गए।
IAS की बौद्धिक और नैतिक पतन: IAS में बौद्धिक और नैतिक पतन स्वतंत्रता के बाद से ही शुरू हो गया था। राजनेताओं की गलत नीतियों ने इसमें योगदान दिया, लेकिन यह कहना गलत होगा कि यह पूरी तरह से उनकी गलती है। कुछ IAS अधिकारी जो व्यक्तिगत रूप से भ्रष्ट नहीं होते, वे भी सिस्टम के दबाव में झुक जाते हैं।
सुधार की कमी: यह कोई रहस्य नहीं है कि IAS में सुधार की सख्त जरूरत है। सिस्टम पुराना हो चुका है और यह न तो नवाचार को बढ़ावा देता है और न ही जोखिम लेने की क्षमता को।
IAS की विफलता का प्रभाव: IAS की विफलता का प्रभाव देश के हर कोने में देखा जा सकता है। सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में असफलता ने देश को पीछे धकेल दिया है।
सुधार की जरूरत: IAS को एक ऐसी प्रणाली की जरूरत है जो योग्यता, कर्तव्यनिष्ठा और नैतिकता को बढ़ावा दे। इसके लिए बड़े पैमाने पर सुधार की जरूरत है, जिसमें नौकरशाही को कम करना और जवाबदेही को बढ़ाना शामिल है।
डॉ अनुज कुमार-
UPSC इस देश का सबसे बड़ा अभिशाप है। एक ऐसा भ्रष्ट सिस्टम जिसकी नींव सामंतवादी सोच पर आधारित है। एक ऐसा भ्रष्ट सिस्टम जिसकी न कोई जवाबदेही है और न ज़िम्मेदारी।
एक ऐसा सिस्टम जिसकी उपयोगिता और उपलब्धिता दोनों नगण्य हैं।
A system with Complete Authority and Zero Accountability.
एक लोकतांत्रिक देश में, जो जनता के दिए टैक्स पर चलता है, वहाँ ऐसी राजशाही व्यवस्था का न कोई स्थान होना चाहिए था और न कोई औचित्य।
आप खोज लीजिए कि इस तंत्र ने इस देश को क्या दिया है।
10 ढंग की उपलब्धियाँ नहीं गिना पाएंगे। वही मनरेगा और आधार गिनाएँगे ये।
अरे उपलब्धि छोड़िए, आप कुछ देर के लिए सोचें और एक चीज़ बताएँ इस देश में जो बिल्कुल सुव्यवस्थित है। सिर्फ़ एक चीज़। जन्म प्रमाण पत्र से लेकर मृत्यु प्रमाण पत्र तक। आपको एक ऐसी चीज़ नहीं मिलेगी जो आप कह सकें कि सिस्टम एकदम दुरुस्त है, एकदम streamlined है।
कहते हैं कि चारित्रिक निर्माण की सही उम्र 18-21 वर्ष है। और UPSC के चयन की न्यूनतम आयु ही 21 वर्ष है क्योंकि चारित्रिक निर्माण कभी इस तंत्र का ध्येय था ही नहीं। इसका ध्येय ही था राजशाही व्यवस्था को बनाए रखना, लोकतंत्र के नाम पर।
एक अधिकारी सोलर प्लांट लगाने के लिए 5% कमीशन माँग रहा है तो लोग हाय तौबा मचा रहे हैं। आप बताइए कि सोलर प्लांट 1 साल में लगे, 5 साल में लगे, 50 साल में लगे या न लगे, क्या कोई ज़िम्मेदारी है इन अधिकारियों की? नहीं है। प्लांट लगे या न लगे, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। कमीशन दीजिएगा तो लगाने की परमिशन मिलेगी, नहीं दीजिएगा तो नहीं मिलेगी। बात बस इतनी ही है। फिर क्यों न माँगे वो कमीशन?
वो तो अपनी किस्मत मानिए कि कुछ ऐसे मुट्ठी भर लोग हैं जो ऐसे corrupt सिस्टम में रहकर भी ईमानदार हैं और एक हद तक न्यायपालिका का शिकंजा है, जिसकी वजह से ये देश चल रहा है, वरना कब का बिक चुका होता देश।
आप ऐसी व्यवस्था को बनाए रखने का जो भी तर्क ढूँढे, सवाल यही रहेगा की
तू इधर उधर की न बात कर,
ये बता कि क़ाफ़िले क्यूँ लुटे!


