गुणानंद जखमोला-
एक पत्रकार ऐसा भी जिसे आखिर में क्या मिला, ईमानदारी का सिला?
- ढेर सारी बीमारियां, बेबसी और नाकामियां
- बच गये तो किस्मत, नहीं बचे तो RIP और बस, इतिश्री
देहरादून की सबसे पुरानी बस्तियों में एक बस्ती है करनपुर। डीएवी कालेज और डीएल चौक के निकट है करनपुर। यहां नालापानी पुलिस चौकी के ठीक सामने एक पुरानी हवेली है। हवेली की पहली मंजिल पर स्थित एक कमरे में घुसता हूं, घुसते ही लगा, कमरा खत्म हो गया। कमरे में एक छह बाई तीन का तख्त लगा है और एक सेट्ठी। यानी दो लोगों के बैठने और उसके अंदर कुछ सामान रखने की जगह। बस, कमरा खत्म। एक पुराना सा परदा टंगा है और उस ओर एक छोटा सा किचन बंद सलाखों सा झांकता नजर आता है। शायद एक कमरा और होगा। किराया है आठ हजार रुपये महीना।
बस, यही है 20 साल की ईमानदारी से की गयी पत्रकारिता से कमाया धन। इसी 6 गुणा 3 के तख्त पर कमर में जोर से एक पट्टी लगाए बैठे खुशहाल को गौर से देखता हूं, शरीर पहले से ही पतला हो गया लेकिन हड्डियों के कैंसर ने इसे और पतला कर दिया। पेट पीठ पर जा चिपका सा लगा। वह मुझसे तीन-चार साल छोटा होगा, लेकिन कैंसर जैसे रोग, और उससे भी बड़ी बात घर के हालात, दो पढ़ने वाले बच्चे और ब्रेस्ट कैंसर की शिकार पत्नी। ऐसे में क्या हाल हो गये उसके। उफ! मैं सिहर उठा।
मूल रूप से बागेश्वर निवासी खुशहाल गोस्वामी से मैं फरीदाबाद में मिला था। तब मैं नवभारत टाइम्स गुड़गांव-फरीदाबाद का ब्यूरो चीफ था। बाद में हम दोनों ही देहरादून आ गये। वो मुझसे पहले देहरादून आ गया था। आज भी एक प्रमुख हिन्दी दैनिक में सब एडिटर ही है। 20 साल बाद भी, जहां का तहां। यहां आने के बाद उससे बहुत कम मिलना हुआ। कल मिला तो इस हाल में।
पता चला कि खुशहाल को कैंसर हो गया है तो घर पहुंच गया। घर के हालात देख सन्न रह गया। खुशहाल का जौलीग्रांट अस्पताल से इलाज चल रहा है। एक आपरेशन हो चुका है और अब महंगे इंजेक्शन लग रहे हैं। खुशहाल बताता है कि एक इंजेक्शन लगभग ढाई लाख का है। डाक्टर ने छह इंजेक्शन लगाने के लिए कहा है। दूसरा इंजेक्शन 9 नवम्बर को लगेगा। आयुष्मान, अखबार के इंश्योरेंस और रिश्तेदारों की दी गयी मदद सब खत्म हो गयी है। खुशहाल जिस अखबार में काम करता है, गनीमत है कि उसका संपादक और अन्य स्टाफ उसे आर्थिक सहयोग कर रहे हैं। पर कितना? और कब तक?
अब खुशहाल के सामने यक्ष प्रश्न यह है कि 5 इंजेक्शन के लिए 12.50 लाख और अन्य दवाओं का खर्च कहां से आएगा? एक ईमानदार पत्रकार के पास खुद्दारी सबसे बड़ा हथियार होता है। वही उसकी पूंजी होती है। यह बात मैं समझ सकता हूं, लेकिन आम जनमानस नहीं। खुशहाल न तो संस्थान का नाम उजागर करना चाहता है और न ही अपनी फोटो देकर सहानुभूति बटोरना चाहता है। जबकि सच यही है कि उसे मदद की भारी दरकार है। इंजेक्शन नहीं लगे तो उसका जीवन खतरे में पड़ जाएगा।
आज के दौर में जब मीडिया को लोग बिका हुआ और पत्रकार को दलाल की संज्ञा देते हैं तो कैसे यकीं दिलाएं कि खुशहाल तुम कैंसरग्रस्त हो और मदद चाहिए, वह भी तुम्हारी शर्तों पर। बिना आइडेंटिटी डिस्क्लोज्ड किये। हद है। मुझे उस पर गुस्सा तो बहुत आया, पर समझ सकता हूं कि एक स्वाभिमानी व्यक्ति कैसे दूसरों के आगे अपने हाथ पसारे। जो खुशहाल की व्यथा समझ रहे हैं तो प्लीज बिना गुणगान की चाहत के उसकी मदद करें। यही गुजारिश कर सकता हूं। यदि इंजेक्शन का जुगाड़ नहीं हुआ तो फिर सबकी उंगलियां तो चलेंगी ही, तीन अक्षर लिखने के लिए। RIP, आज के दौर में ईमानदारी का यही सिला है।
यदि कोई साथी खुशहाल की मदद करना चाहता है तो उसके बेटे का एकाउंट नंबर और गूगल पे नंबर नीचे दिया है।
- Name- Saurabh Giri
- Account no- 5178402757
- IFSC no.- CBIN0283170
- Google pay-8006992067 (Saurav Giri)


