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सियासत

क्या भारत में फिर से किसान आंदोलन शुरू होगा जो मोदी सरकार के अंत का कारण बनेगा?

अमेरिका के सामने जिसने भी व्यापार या सामरिक समझौते करके घुटने टेके हैं, उसे अंततः बर्बादी का सामना ही करना पड़ा है!

सौमित्र रॉय-

ट्रेड डील के पहले पन्ने पर पहले ही बिंदु में लिखा है कि भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए अपने बाज़ार की तमाम रुकावटों (नॉन टैरिफ बैरियर) को दूर करेगा।

इसका मतलब हुआ कि अगले 5 साल में भारत को अपना पूरा बाज़ार अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए खोलना पड़ेगा।

मतलब पीयूष गोयल से लेकर शिवराज और मोदी तक–सब झूठ बोलकर किसानों को बरगला रहे हैं।

भारत के गरीब किसानों के पास अब सिर्फ लाठी बची है। या तो वे अपना सिर फोड़ लें या फिर बीजेपी सत्ता का सिर फोड़ दें।

वे अमेरिकी कॉरपोरेट खेती के आगे टिक नहीं सकते।

2025 में अमेरिका ने अपने किसानों को लगभग 41 बिलियन डॉलर की सब्सिडी दी।

2026 के लिए अमेरिकी सरकार अपने किसानों को 44.3 बिलियन डॉलर प्रत्यक्ष भुगतान करने वाली है।

भारत का पीएम अपने किसानों को मरता छोड़ मलेशिया घूमने चल पड़ा है।

क्योंकि, किसानों और देश की जनता के प्रति उसकी कोई जवाबदेही नहीं।

तो किसान भाइयों, घेर लो दिल्ली। जब तक डील रद्द न हो जाए।

अब काम आएगी लाठी।


अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

अमेरिका के सामने जिसने भी व्यापार या सामरिक समझौते करके घुटने टेके हैं, उसे अंततः बर्बादी का सामना ही करना पड़ा है। पाकिस्तान हमारे ठीक बगल में इसका जीवंत उदाहरण है। आज अगर पाकिस्तान भिखमंगा देश समझा जाता है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने आत्मनिर्भरता और अपने फायदे की बजाय हर सौदे में अमेरिका के ही हित साधने वाले प्रस्तावों पर साइन करने में कोई कोताही नहीं बरती।

फिलहाल भारत ने भी अमेरिकी हित के आगे अपने व्यापारिक हित को लगभग छोड़कर अथवा दरकिनार करके अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के एजेंडे में अपना योगदान दे दिया है। इसका बोझ अमेरिकी डॉलर के सामने भारतीय रुपये की हैसियत को और कमतर होने से जल्द ही दिखने लगेगा।

इसके अलावा आयात निर्यात का असंतुलन बहुत बड़े स्तर पर बढ़ने लगेगा। साथ ही, आयात निर्यात का पलड़ा भी अन्य देशों के मुकाबले अब अमेरिका की ही तरफ झुकेगा, जिसका नकारात्मक असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने से अब कोई रोक नहीं पाएगा।

अमेरिकी उत्पाद और अमेरिकी कंपनियां भारत के बाजार पर अब एकछत्र राज करने की तरफ बढ़ेंगी, जिसका खामियाजा भारतीय कंपनियों और व्यापारियों को उठाना ही पड़ेगा। नतीजा यह होगा कि भारत में टैक्स कलेक्शन, राजस्व घाटा, जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय में भी तगड़ी गिरावट लंबे समय में देखने को मिलने वाली है। जाहिर है, महंगाई और ग्रोथ रेट पर भी नकारात्मक असर होगा ही।

जातीय राजनीति पर धुरंधरों और राजनीतिक विश्लेषकों से भरे इस देश में यूजीसी पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोदी समर्थक एकजुट होकर जिस तरह उन्हें गरिया रहे थे, वैसा कोई विरोध आर्थिक मुद्दे पर देश में हो, इसकी कोई संभावना आर्थिक जागरूकता या समझ के अभाव में दिखती नहीं है।

मीडिया इस डील की जय जयकार करना शुरू कर ही चुका है। भारत दोबारा रूस से तेल न खरीद पाये और रूस से उसके रिश्ते गहरे तो छोड़िए, दोबारा सामान्य भी न हो पाएं, उसका इंतजाम भी डोनाल्ड ट्रंप ने यह कड़ी शर्त लगाकर कर ही दिया है कि दोबारा तेल खरीद होते ही टैरिफ पचास प्रतिशत कर दिया जायेगा। ऐसे में अमेरिका की सरपरस्ती और मार्गदर्शन में देश किधर जाएगा, यह पाकिस्तान मीडिया और बुद्धिजीवी बेहतर बता पाएंगे।

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