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एंटी-स्टैब्लिशमेंट अखबार इंडियन एक्सप्रेस के लिए हम लोग कांग्रेस को आंख दिखाने को तैयार रहते थे!

संजय सिन्हा

संजय सिन्हा-

खांग्रेसी, वामी, आपिया, लिब्रांडू और भक्त

मैंने वादा किया है कि परिजनों की इस वॉल पर कभी राजनीतिक कहानी नहीं सुनाऊंगा। लेकिन कुछ परिजन कुरेद-कुरेद कर उस सच को जानने को व्याकुल हैं, जिसकी शर्मिंदगी हमने खुद में दफ्न कर ली है। कुछ लोगों को शिकायत रहती है कि हम खांग्रेसी, आपिया, वामी हैं। असल में भारत में कोई पत्रकार कभी न खांग्रेसी रहा है, न आपिया, न वामी। हां एंटी-इस्टैब्लिशमेंट रहा है, जो आज गोदी हैं। हम जैसे लोग तो मूर्खता में (मिशन समझ कर) पत्रकारिता में घुसे थे।

आज ठीक से पढ़िएगा मेरी पोस्ट। साझा भी कीजिएगा, ताकि आप और आपके समझदार दोस्त ये समझ पाएं कि असल में हम सब जिन्हें खांग्रेसी, आपिया और वामी कह कर चिढ़ाते हैं, गाली देते हैं, गोदी पत्रकार थे। फर्क इतना है कि हमें विपक्ष की गोदी में बिठाया गया था। हम नासमझ थे, इसलिए सत्ता बदलने के साथ पिछड़ गए क्योंकि हमें लगता था कि हम क्रांति करने के लिए मीडिया में आए थे। आप हमें मूर्ख कह सकते हैं जो इस्तेमाल हुए।

खांग्रेस के काल में एंटी-इस्टैब्लिशमेंट पत्रकारों का सच समझिए। हमसे मत पूछिए कि हेराल्ड मामले में क्या हुआ, दामाद ने जमीन घोटाले में क्या खाया? हमने तो उनके बाप की खटिया खड़ी की थी, बोफोर्स मामले में।

सोचिए कितनी शर्मिंदगी होती होगी, जब हम याद करते हैं कि कैसे हमारे हीरो संपादक रोज जिनेवा से कुछ फैक्स मंगवा कर सनसनी मचा देते थे, सरकार की ऐसी-तैसी कर देते थे। और जब वो सरकार गिर गई तो नई सरकार में संपादक ही मंत्री बनने चले गए। मतलब हम टूल थे। किसके? खांग्रेस के? वाम के?

अधिक नहीं कहना चाहता। और ऐसा मत सोचिएगा कि डर कर नहीं कहना चाहता। बस यही लगता है कि अपने ठगे जाने की कितनी अपनी पोल कोई खोल सकता है। ध्यान रहे हम खुद शिकार हैं, जो शिकारी थे, वो मौज में हैं। आप भक्ति में सच समझ ही नहीं पाए, कैसे समझते? जब हम ही नहीं समझ पाए तो आप तो इस धंधे में थे भी नहीं।

एंटी-इस्टैब्लिशमेंट होना

रामनाथ गोयनका के मीडिया संस्थान इंडियन एक्सप्रेस ने हमें यही सिखाया था—पत्रकार को सत्ता विरोधी (Anti-Establishment) होना चाहिए। हम इसी विश्वास में पत्रकार बन गए। करियर की शुरुआत गोयनका के ही संस्थान ‘जनसत्ता’ से की। यह बोफोर्स दलाली के उजागर होने का समय था। हम एक छोटे से उप-संपादक थे, और मेरे मामा तब सीबीआई में ज्वाइंट डायरेक्टर। जब मैं मामा से मिलता, तो लगता जैसे वो सरकार के कहने पर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को बर्बाद करने में लगे हैं, और हम राजीव गांधी की सरकार को।

तब हम खुद नहीं जानते थे कि उप-संपादक क्या होता है। लगता था कि एक संपादक होता है और बाकी उसके नीचे उप-संपादक—बस! ट्रेनी रहते 1100 रुपये महीना और फिर बछावत वेतन आयोग लागू होने से पहले 1800 रुपये का उप-संपादक, राजीव गांधी (तत्कालीन प्रधानमंत्री) को आंखें दिखाने को तैयार रहता था।

हमारे पास कहानियां थीं, और हमारे हीरो थे अरुण शौरी। नेवी ब्लू पतलून और स्काई ब्लू कमीज़ में चमकते चेहरे के साथ। जब वे भूतल वाले अपने फाइव स्टार ऑफिस से नीचे, हमारे बेसमेंट वाले ऑफिस में आते थे, तो लगता था जैसे मसीहा सामने हैं। जी हां, मसीहा, जो बोफोर्स के चोरों और देशद्रोहियों को उखाड़ फेंकेंगे।

वहीं से दिल-दिमाग में बैठ गया कि पत्रकार का धर्म है सरकार से लड़ना, उसकी खामियों को उजागर करना। आंखों में आंखें डाल कर प्रश्न पूछना। मुझे लगता है मैं उस वक्त बस कानूनी तौर पर बालिग था, दिमागी तौर पर नहीं। समझ नहीं पाया कि एंटी-इस्टैब्लिशमेंट होना असल में कांग्रेस विरोधी होना था।

हम चाहते थे कि राजीव गांधी की सरकार गिरे। तब हम मानते थे कि कांग्रेस अंग्रेज़ों की पार्टी है, और हम स्वराज प्रेमी। हमारा अखबार गांधी का अख़बार है। सच क्या था? हमारे हीरो संपादक और अखबार समूह के मालिक सत्ता विरोधी थे, जो असल में कांग्रेस विरोधी थे। हमारे हीरो और उनके कुछ चेले, एक खास विचार के पोषक थे, उसका प्रमाण यही है कि जैसे उनका टाइम आया, हीरो मंत्री और उनके चेले राज्यसभा सांसद बन गए। वो लोग, जो कभी हमारे बीच बैठकर सरकार को कोसते थे। ध्यान रहे, सरकार मतलब राजीव सरकार। हम उस राजीव हटाओ आंदोलन के एक अदना हिस्सा थे। तब हमें गोयनका के शिष्य क्रांतिकारी लगते थे, और हम खुद उस क्रांति में ट्रेनी।

असल में, हम सत्ता के नहीं, कांग्रेस के विरोधी थे। मीडिया तलवार थी। खूनी हम थे, खून किसी और को पीना था। ‘एक्सप्रेस’ में हमने 11 साल तक सरकार को आंख दिखाने की पत्रकारिता की। फिर ज़ी न्यूज़ गया। वो अलग कहानी है। उन 11 वर्षों में हम मन से सच्चे ‘एंटी-स्टैब्लिशमेंट’ पत्रकार थे।

आपको एक बात बताता हूं। मैं जनसत्ता में रहते हुए राजीव गांधी से दो बार मिला। उन्हें पता था मैं उनके विरोधी संस्थान से हूं, फिर भी उन्होंने एक बार नहीं कहा कि संजय सिन्हा, तुम दलाल हो। मैं था भी नहीं, लेकिन अनजाने में था ही। तब मेरे मन में घर कर गया था कि राजीव गांधी बोफोर्स चोर हैं। मैं 11 साल तक उस संस्थान में रहा। राजीव गांधी, वीपी सिंह से लेकर बाकी तमाम प्रधानमंत्रियों के उगने और उखड़ने का गवाह रहा। अभी उनका नाम लेना ज़रूरी नहीं।

अब जब कुछ लिखता हूं, आप में कुछ लोग गालियां देते हैं – वामी है, खांग्रेसी है, आपिया। आपका मुंह है, आप कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन मुझे पीड़ा इस बात की है कि मैंने तो पूरा जीवन कांग्रेस (सत्ता) के विरोध में गुज़ारा। अगर पैट्रियाट अखबार में होता, तो मान लेता कि मैं ‘वामी’ था। ‘पांचजन्य’ में होता तो संघी मान लेता। लेकिन मैं तो इंडियन एक्सप्रेस में था, जो असल एंटी-स्टैब्लिशमेंट के नाम पर कांग्रेस विरोधी था।

अब सोचता हूं, क्या वो विरोध सचमुच सत्ता का था? या बस अपनी पसंद की सत्ता लाने का ज़रिया? मुझे दुख नहीं कि मैं पत्रकारिता से बाहर हुआ। अफसोस इस बात का है कि आप में से कुछ लोग मुझे गालियां देते हैं। वैसे गालियों ने मेरी आंखें खोल दी हैं। आज जो मीडिया से बाहर हैं वो न वामी हैं, न खांग्रेसी, न आपिया। वो सिर्फ वो हैं, जिनमें सत्ता से सवाल करने की जिद थी। मनमाफिक सरकार आ गई, एजेंडा बदल गया। अब वही पत्रकार चल रहे हैं जो सत्ता के साथ हैं। बाकी ठगे से। आपने हमारी वाहवाही की, जब हम उनसे सवाल पूछते थे। जैसे ही इनसे सवाल किए, आपने गालियां निकालनी शुरू कर दीं। खांग्रेसी, वामी, आपिया। देर से समझ में आया। हम मोहरे थे।

पत्रकार का काम जनता की आवाज़ बनना होता है। मैं मानता था, मानता हूं। पहले आपको ये बातें पसंद थीं। अब नहीं। संभालिए खुद को झेलिए भी आप ही। हमारी तो जैसे-तैसे गुजर गई। बस याद रखिएगा सत्ता का खून ही ऐसा होता है, जो ताजमहल बनाते हैं, पहले उनके हाथ काटे जाते हैं।

कोई मलाल नहीं कि मैं (मेरे जैसे बहुत से लोग) पत्रकारिता से बाहर क्यों हुआ। शायद भगवान ने मेरे हिस्से के कुछ पाप कम ही लिखे थे।

नोट 1. प्लीज मुझे न उकसाया करें। अगर आप में से किसी को राजनीतिक कहानी ही पढ़नी हो, सुननी हो तो आपके पास टीवी चैनल पर चलने वाली रोज की बहस है। आप वहां रोज खांग्रेस को, आपियों को, वामियों को पिटते देखिए, ताली बजाइए।

ये वॉल हमारे परिजनों का घर है। मैं यहां सिर्फ रिश्तों की कहानियां ही सुनाना चाहता हूं। वैसे आपके उकसाने से कभी-कभी मैं उकस भी जाता हूं। आज इतना ही कहना है कि जिन्हें मुझसे जरा भी उम्मीद है कि संजय सिन्हा कुछ ऐसा कहें, जिससे उन्हें राजनीतक रूप में मजा आ जाए, तो वो प्लीज़ आप इस वॉल को छोड़ कर किसी और वॉल पर चले जाएं।

प्लीज़, प्लीज़ आज के बाद मुझे मत उकसाइएगा। मैंने पहले जो पाप किए हैं, अकेला बैठ कर उसका प्रायश्चित कर रहा हूं। करने दीजिए, प्लीज।

नोट 2. आप ऐसा मत समझिएगा कि जब आप वामी, आपिया, खांग्रेसी या लिब्रांडू कहते हैं तो असल में आपके मन और जुबान पर क्या है, हम नहीं समझते।

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