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आज के अखबार : इंडिगो मामले में सरकारी कार्रवाई का प्रचार, गोवा के नाइट क्लब में 25 मौतें दूसरी खबर!

संजय कुमार सिंह

आज दि एशियन एज, नवोदय टाइम्स और अमर उजाला ने डबल इंजन वाले गोवा के नाइट क्लब में आग लगने से 25 लोगों की मौत की खबर को सेकेंड लीड बनाया है। वह भी तब जब मरने वालों में चार दिल्ली के एक ही परिवार के हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस अग्निकांड की खबर को लीड तो बनाया ही है इसके साथ तीन कॉलम की खबर में बताया है कि इस हादसे में दिल्ली के एक परिवार के चार सदस्यों की मौत हो गई। इंडिगो की ज्यादातर खबरें सरकारी कार्रवाई का प्रचार करने वाली है। दि एशियन एज का शीर्षक है, इंडिगो के परिचालन 10 दिसंबर तक स्थिर हो जाएंगे। इससे पहले खबर थी कि इंडिगो ने 10 से 15 दिसंबर तक परिचालन सामान्य होने की बात कही थी। उसी दिन सरकार की ओर से कहा गया था कि इंडिगो की सेवाएं “अगले तीन दिन में” सामान्य हो सकती हैं। अमर उजाला डॉट कॉम की 5 दिसंबर की एक खबर के अनुसार, उड्डयन मंत्री राममोहन नायडू ने कहा था कि इंडिगो का परिचालन तीन दिन में सामान्य हो जाएगा। आज दि एशियन एज ने लिखा है – इंडिगो ने कहा उसे उम्मीद है कि 10 दिसंबर तक नेटवर्क स्थिर हो जाएगाा। यही खबर द हिन्दू में भी है। दि एशियन एज की खबर में यह भी कहा गया है कि सरकार गंभीर कार्रवाई की तैयारी कर रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि जो स्थिति है उसमें यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सरकार के सहयोग से ही इंडिगो इस हैसियत में पहुंची है कि 60 प्रतिशत से ज्यादा बाजार पर उसका कब्जा है, उसने पहले से मालूम होने पर भी नए नियम लागू नहीं किए। अब सरकार ने सुरक्षा के लिए जरूरी समझे और कहे गए नियमों को लागू करने के लिए 10 फरवरी तक का समय दे दिया है। अभी तक किसी जुर्माने या कार्रवाई की खबर नहीं है तो अखबार प्रचार कर रहे हैं कि सरकार कार्रवाई की तैयारी कर रही है। इस प्रचार के लिए डबल इंजन वाले गोवा के नाइट क्लब में 25 लोगों की मौत की खबर को कम महत्व दिया गया है।

अमर उजाला का शीर्षक है, दुश्वारियां बरकरार, इंडिगो की 650 उड़ानें निरस्त रहीं, यात्रियों को लौटाए 610 करोड़। कहने की जरूरत नहीं है कि यह राशि यात्रियों को एक ऐसी सेवा देने के लिए से ली गई थी जिसके लिए कंपनी का लगभग एकाधिकार है, सरकारी अनुमति तो है ही। अगर सेवा नहीं दी गई तो पैसे वापस किया जाना न्यूनतम जरूरत है। इसमें कोई मुआवजा है कि नहीं, जीएसटी कटा या नहीं और नहीं कटा तो सरकार को इस संकट से जीएसटी मद में कितने का नुकसान हुआ – भी अलग खबर हो सकती थी। पर जो खबरें हैं उनका शीर्षक है, 1) दिल्ली में 109 उड़ानें रद्द हुईं 2) इंडिगो ने कहा कर रहे सुधार 3) राजनीति का मुद्दा नहीं बनाएं – नायडू (क्यों नहीं बनाएं या राजनीति क्यों नहीं करें या सरकार को नाकाम क्यों नहीं कहें इसपर कुछ नहीं है, राहुल का बयान या उन्होंने क्या कहा वह सब तो नहीं ही है) 4) नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री ने कहा है जवाबदेही तय करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि इस खबर का शीर्षक है, यात्रियों का मानसिक उत्पीड़न : मोहोल। मुझे समझ ही नहीं आया कि मोहोल क्या है। खबर से पता चला कि आप नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री हैं और पूरा नाम है, मुरलीधर मोहोल। मंत्री महोदय का यह नाम तो मैंने पहली बार सुना ही है, उपनाम भी कभी नहीं सुना था। ऐसे में मुरलीधर लिखा होता तो बात समझ में आ जाती हालांकि उन्होंने जो कहा है और पहले पन्ने पर छपा है उसमें कुछ नया नहीं है और खबर है तो यही कि इस मामले में सरकार अपनी जिम्मेदारी नहीं मानती है, चाहती है कि इस मुद्दे पर राजनीति न हो पर इस पूरी स्थिति के लिए सरकार या अफसरों में अभी तक कोई जिम्मेदार नहीं मिला है। सरकार ‘काम’ कर रही है सरकारी पार्टी की राजनीति जारी है। इसमें वंदे मातरम पर चर्चा और उसकी खबर पहले पन्ने पर होना शामिल है। बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने की राजनीति भी सोशल मीडिया पर चर्चा में है लेकिन अभी अखबारों के पहले पन्ने पर नहीं पहुंची है। हालांकि, नवोदय टाइम्स में एक खबर है, बंगाल में सबसे बड़ा सामूहिक गीता पाठ, लाखों हिन्दू जुटे। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव से पहले मस्जिद बनाने और गीता पाठ जैसे इन कार्यक्रमों का मकसद धार्मिक ध्रुवीकरण है। अगर सरकार ऐसा कुछ करे तो विपक्ष का काम नहीं है कि वह भी ऐसी ही राजनीति करे। देशबन्धु में मस्जिद बनाने की योजना से संबंधित यह खबर है।

खबर है कि हुमायूं कबीर तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हैं। पहले वे कांग्रेस और भाजपा से भी जुड़े रहे हैं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में बाबरी मस्जिद जैसा परिसर बनाने की घोषणा उनकी अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक चाल है। इस निर्माण में 300 करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान है। कबीर का कहना है कि वह “ग़ैरकानूनी कुछ नहीं कर रहे” पर जो कर रहे हैं वह चुनावी जरूर है। उनके अनुसार बंगाल में मुसलमानों की आबादी लगभग 37% है। इस आधार पर उन्होंने मस्जिद निर्माण को अपना “हक” बताया है। लेकिन उनकी पार्टी, टीएमसी ने उन्हें “साम्प्रदायिक राजनीति” के आरोप में पार्टी से निलंबित कर दिया। कबीर के समर्थक बताते हैं कि उनका इरादा मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करना और उनकी धार्मिक/सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करना है। कबीर के आलोचक कहते हैं कि यह एक व्यवस्थित साम्प्रदायिक राजनीति है जो बंगाल में चुनावों से पहले सांप्रदायिक विभाजन को भड़का सकती है। हुमायूं कबीर की मस्जिद बनाने की राजनीति ने उन्हें तृणमूल से निलंबित करा दिया है और भाजपा व कांग्रेस से उनके संबंध चर्चा में हैं। वास्तव में मस्जिद निर्माण करना हो या 2026 के विधानसभा चुनावों में अपनी नई पार्टी व संभावित गठबंधन बंगाल की राजनीतिक दिशा और सामाजिक-सांप्रदायिक धारा को प्रभावित कर सकते हैं। खासकर तब जब वोट कटवा उम्मीदवार खड़े करने का रिवाज है।

मीडिया का काम है कि गलत, अनैतिक और नुकसानदेह खुलासों का पर्दाफाश करे, लोगों को जागरूक बनाए और और धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिशों पर हल्ला बोले, रोकने के उपाय करे। इस मामले में जिसे कार्रवाई करनी है उससे पूछे या बताये कि देश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि सत्तारूढ़ या विपक्षी दल सांप्रदायिक भावनाएं भड़का क चुनाव जीतने या दूसरों को हराने की कोशिश करे तो उसे रोका जा सके। अब यह सब नहीं होता है। देश की राजनीति जब ऐसी हो गई है तो अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि एसआईआर के तहत दो से तीन करोड़ वोट काटे जाने की साजिश है। यह कोई नया आरोप नहीं है और ना पूरी तरह निराधार है। इसलिए सिर्फ देशबन्धु में प्रमुखता से छपा है। खबरों की बात करें तो देशबन्धु में एक और खबर है जो बताती है कि 26 सितंबर को गिरफ्तार सोनम वांगचुक को अभी तक जमानत नहीं मिली है और उनके मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। खबरों के मामले में मीडिया में जब ऐसी राजनीति चल रही है तब विपक्ष के नेता के बयानों या आरोपों को बमुश्किल पहले पन्ने पर जगह मिलती है। अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ में आज गोवा की खबर को सात कॉलम में लीड बनाया है जबकि इंडिगो की खबर दो कॉलम में है। इसका शीर्षक है, उड़ान कम रद्द हुई, रिफंड और लगेज (सामान) पर नजर। इंडियन एक्सप्रेस ने इंडिगो मामले में आज एक ऐसी खबर छापी है जो वाकई खबर जैसी है। इसके अनुसार, मौजूदा संकट के मद्देनजर इंडिगो के हाई प्रोफाइल बोर्ड और संकट से पहले इसकी रिस्क कमेटी की भूमिका पर सवालिया निशान है। खबर के अनुसार बोर्ड में सेबी, भारतीय वायु सेना, नीति आयोग और अमेरिकी उड्डयन प्रशासन के पूर्व प्रमुख हैं। इसमें यह खुलासा भी किया गया है कि गुजरे दो साल की वार्षिक रिपोर्ट में नए पायलट नियमों का कोई उल्लेख नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि इंडिगो के कारण देश भर के विमान यात्रियों पर आए संकट की सूचना ही खबर नहीं है। उसके कारणों, अनुमानों के साथ कंपनी का पक्ष भी खबर है लेकिन अब ज्यादातर खबरें सरकार का प्रचार और बचाव करने वाली होती हैं। रही सही कसर सरकार के विरोधी की उपेक्षा या उसे बदनाम करने वाली खबरों से पूरी हो जाती है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड गोवा की खबर है और इंडिगो की खबर उसके बराबर में है। इसमें बताया गया है कि सरकारी जांच में यह भी देखा जाएगा कि इंडिगो ने नए नियमों को लागू करने की तैयारियों में क्यों देरी की। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका कारण यह आश्वासन या उम्मीद हो सकती है कि उसे इन नियमों को लागू करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। उसकी अपनी (कंपनी या बोर्ड) इच्छा अथवा जरूरत भी हो सकती है लेकिन कोई भी कंपनी अपने भविष्य को किसी भरोसे के बिना दांव पर नहीं लगा सकती है और यह मजबूरी भी हो सकती है। इसका अंदाजा सरकारी कार्रवाई से हो सकता है लेकिन एकाधिकार की मजबूरी अपनी जगह है। यात्रियों की परेशानी के इस विषय में विपक्ष से राजनीति नहीं करने की अपेक्षा भी एक कारण हो सकता है। यही सब खबर है लेकिन कई दिनों बाद आज भी ज्यादातर अखबारों में रूटीन खबर ही है। द हिन्दू में चार कॉलम की खबर का शीर्षक है, इंडिगो की बाधा कम हो रही है, सरकार ने सख्ती की तो 610 करोड़ रुपए लौटाए गए। हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, अराजकता जारी, परिचालन बहाल करने में इंडिगो नाकाम। 

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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