ऊर्जा संकट और युद्धजनित अनिश्चितता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था पर विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगाता दिख रहा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, रुपये की गिरावट और चालू खाते के बढ़ते घाटे ने भारत को फिलहाल निवेशकों के लिए कम आकर्षक बाजार बना दिया है। इसी दबाव के कारण विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से बड़ी निकासी शुरू कर दी है।
रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी निवेशकों ने मार्च के बाद से भारतीय बाजारों से अरबों डॉलर निकाल लिए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ा युद्ध तनाव और उससे पैदा हुआ ऊर्जा संकट बताया जा रहा है। भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ता है, डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
इसी दबाव के चलते रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि रुपया 95 प्रति डॉलर के करीब फिसल गया, जिससे विदेशी निवेशकों की चिंता और बढ़ गई। निवेशकों को आशंका है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो भारत का चालू खाता घाटा तेजी से बढ़ सकता है और महंगाई भी नियंत्रण से बाहर जा सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत की स्थिति “डबल व्हैमी” जैसी हो गई है। यानी एक तरफ पूंजी का बाहर जाना और दूसरी तरफ चालू खाते का दबाव। पहले विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में तेजी के कारण बने हुए थे, लेकिन अब वे जोखिम कम करने के लिए पैसा निकाल रहे हैं। इससे शेयर बाजार पर भी दबाव बढ़ा है और बॉन्ड यील्ड में उछाल देखा गया है।
रिपोर्ट में भारतीय बाजार की तुलना एशिया के अन्य बाजारों से भी की गई है। कहा गया है कि जहां कई एशियाई बाजारों में विदेशी निवेशक वापसी कर रहे हैं, वहीं भारत में निवेशकों की धारणा कमजोर हुई है। इसकी वजह यह भी है कि भारत का आर्थिक मॉडल बड़े पैमाने पर आयातित ऊर्जा पर निर्भर है। अगर वैश्विक तेल कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो इसका असर विकास दर पर भी पड़ सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने स्थिति को संभालने के लिए डॉलर बेचकर रुपये को सहारा देने की कोशिश की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आरबीआई के विदेशी मुद्रा भंडार में भी इस हस्तक्षेप के कारण गिरावट आई है। हालांकि केंद्रीय बैंक और सरकार दोनों यह संकेत दे रहे हैं कि वे स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और जरूरत पड़ने पर आगे भी हस्तक्षेप किया जाएगा।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा निर्भरता है। यदि तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं तो सरकार पर सब्सिडी और महंगाई नियंत्रण का दबाव बढ़ सकता है। इससे वित्तीय घाटा और चालू खाता घाटा दोनों प्रभावित होंगे। विदेशी निवेशकों के लिए यह संकेत नकारात्मक माना जाता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हाल के वर्षों में भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में पेश किया गया था, लेकिन युद्ध और ऊर्जा संकट ने इस छवि को झटका दिया है। निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि भारत ऊर्जा आयात के दबाव को किस तरह संभालता है और रुपया कितनी स्थिरता बनाए रख पाता है।
हालांकि कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत की घरेलू मांग मजबूत है और दीर्घकाल में भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति अभी भी मजबूत मानी जा सकती है। लेकिन अल्पकाल में विदेशी पूंजी निकासी, महंगा तेल और कमजोर रुपया भारतीय बाजारों के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।
युद्ध के कारण संकट बढ़ा है मगर संकट केवल युद्ध के कारण नहीं है। और पश्चिम के अख़बार में यह जो आइटम छपा है वो भारत के मीडिया में भी छप रहा है। विदेशी निवेशकों का पलायन युद्ध के कारण नहीं कुछ और बड़े कारणों से हो रहा है। इस सच्चाई से आप अनजान नहीं रह सकते। -रवीश कुमार

फ़ाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, भारतीय बाज़ार से विदेशी निवेशक रिकॉर्ड मात्रा में निकल रहे हैं.


