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सुख-दुख

चार-साढे चार सौ रुपये की सैलरी में साढ़े तीन सौ रुपये अपने मुखबिर को दे देते थे IPS अजयराज शर्मा!

संजीव चौहान-

सन् 2017 2018 में संजीव चौहान द्वारा एक इंटरव्यू अंतिम मुलाकात के दौरान नोएडा आवास पर ली गई तस्वीर

जेय’ IPS अजय राज शर्मा जी से वो अंतिम बात-मुलाकात…

‘अलविदा’ सर….चूंकि आप भूलने वाली शख्शियत नहीं हैं. इसलिए हमेशा हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियों को आपकी याद आएगी. याद आएगी खाकी वर्दी में आपके काम करने की दबंग शैली. याद आयेगा आपका किसी भी विपरीत हालात में, किसी के सामने सिर को न झुकाने की जिद-जज्बा.

मुझे विशेषकर याद आएगी आपसे, आपके नोएडा सेक्टर 44 वाले निवास स्थान पर वो अंतिम मुलाकात, जिसमें आपने कहा था, ‘चौहान साहब अब मैं रिटायर होने के बाद ज्यादातर खाली ही रहता हूं. लोगों के फोनकॉल भी आने बेहद कम हो गए हैं. आप आए मुझे अच्छा लगा. आते रहा करो. कॉल तो कम से कम कर ही लिया करो. अब तो डिपार्टमेंट और पत्रकारों के भी बहुत कम ही फोन वगैरह आते हैं.’

याद रहेगा हमेशा इसी मुलाकात में आपका वो बेबाक किस्सा, जिसमें आपने बताया था कि कैसे, आईपीएस की नई-नई पहली पोस्टिंग (बहैसियत डिप्टी एसपी, यूपी पुलिस) में हाथ में आई पहली सेलरी (वेतन) चार-साढ़े चार सौ रुपए में से भी पचास रुपए ही आपने अपने महीने के जेब खर्च के लिए बचाए थे. बाकी 350 रुपए आपने उस मुखबिर को दे दिए थे, जिसकी मुखबरी पर आपने, अपने जीवन की पहली पुलिसिया मुठभेड़ में एक ही रात में 13 डकैत घेर कर हमेशा-हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिए थे.

बहुत याद आएगी सर आपकी वो बेबाकी जब, भारत की सांसद और पूर्व महिला दस्यु फूलन देवी की, नई दिल्ली के अशोका रोड पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. मौके पर मैंने आपसे पूछा था कि, ‘यह दिल्ली पुलिस के लिए तो शर्म की बात है.’ आपका जवाब था, ‘क्राइम होना पुलिस के लिए उतने शर्म की बात नहीं, जितना कि अपराधी को काबू न कर पाने में पुलिस को शर्म आनी चाहिए. शर्म तो उस पुलिस को आनी चाहिए जो क्रिमिनल को पकड़ न सके. शर्म उस पुलिस को आनी चाहिए तो आपराधिक घटना का खुलासा न करके, कोर्ट में मुजरिम को सजा भी न दिला सके.’

बहुत याद आयेगा जब आपने दिल्ली पुलिस आयुक्त का पदभार ग्रहण किया. चूंकि आप यूपी कैडर (दिल्ली से बाहर के आईपीएस) के आईपीएस थे. इसलिए दिल्ली कैडर (अग्मूटी) वाले कई आईपीएस, जो दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनने की सीढ़ी पर खड़े थे, उनके पेट में पानी भर गया था. इस बावत जब मैंने आपसे पूछा तो आपने कहा था, ‘चौहान साहब मैं नौकरी हिंदुस्तानी हुकूमत की करता हूं. किसी सूबे की या व्यक्ति-विशेष की नहीं. इंतजार कीजिए शोर-शराबा करने वाले थक-हार के खुद ही शांत होकर बैठ जाएंगे.’ आखिर में वही हुआ भी कि ‘बाहरी’ का ‘ठप्पा’ लगे होने के बाद भी, आपने दिल्ली पुलिस की ‘कमिश्नरी’ जिस दबंगई से की, वो भी तकरीब 3 साल. वो सबने देखा. आपके दोस्त और दुश्मन सब इसके गवाह हैं.

खूब याद है दिल्ली पुलिस आयुक्त बनने के 10-12 दिन बाद ही मुझे दिए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू के दौरान आपने कहा था, ‘अच्छे-बुरे लोग समाज में हर जगह मिलेंगे. पुलिस भी इससे नहीं बची है. जब पुलिस का सिपाही-हवलदार 50-100 रुपए के लिए ब-वर्दी ट्रक-बस, टैंपो पर लटका होता है, तो वो सबको दिखाई देता है. यह जिस दिन बंद हो जाएगा. उसी दिन से पुलिस की बदनामी रुक जाएगी.’

हिंदुस्तानी संसद और लाल किला पर आतंकवादी हमले की दोनों घटनाएं, आपके ही दिल्ली पुलिस कमिश्नर रहते हुए हुई थीं. दिल्ली पुलिस मुख्यालय में पत्रकारों ने जब, इस बारे में पूछा तो आपने बिना किसी लाग-लपेट के कहा था, ‘हां दोनों ही घटनाएं बड़ी और गंभीर प्रकृति की हैं. पुलिस का काम अपराधियों को घेरकर उन्हें सजा दिलाना और देना होता है. वो मैं कर दूंगा.’ उन दोनों ही आतंकवादी घटनाओं में किस कदर की बेहतरीन तफ्तीश दिल्ली पुलिस की तरफ से हुई. जमाने ने सबकुछ देखा.

मतलब, फिर वही कि ‘आप’ अपने आप में अद्भूत थे. आपकी निडरता, निर्भीकता, ईमानदारी, कर्तव्य-परायणता पर शायद ही कभी किसी अपने की तो बात छोड़िए, आपके पीठ पीछे के किसी ‘दुश्मन’ को भी शक नहीं हुआ होगा. क्योंकि आप और आपके पुलिस-वर्क करने-कराने की शैली ही ‘संदिग्ध’ नहीं रही.

आपको जानने समझने के लिए कम से कम मुझे तो, किसी गवाह या सबूत की कोई जरूरत नहीं है. क्योंकि आपकी ‘दिल्ली पुलिस कमिश्नरी’ में मैंने खुद तीन साल क्राइम-रिपोर्टरी की थी. आपने अहसास कराया था कि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर की ‘कुर्सी’ पर बैठकर, ‘मीडिया’ से बात करने से वही आईपीएस कतराएगा या, कन्नी काटेगा, जिसके अंदर खुद में कहीं कोई ‘गड़बड़’ होगी.

जयहिंद सर The Last Salute

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