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सियासत

एक पुलिस अफसर का संस्मरण (3) : ऐतिहासिक काम्बिंग और भाग्यशाली-दुर्भाग्यशाली अधिकारी!

बद्री प्रसाद सिंह-

सुबह ४.४५ बजे मैं चीनी मिल अतिथि गृह आकर व्यवस्था का जायज़ा लेने लगा। हमारे बल धीरे-धीरे अपना स्थान ग्रहण कर रहे थे। मैं उनके नायकों को सर्वे आफ इंडिया का संबंधित क्षेत्र का बड़ा नक्शा देकर समझा रहा था।

इसी बीच हमारे पुलिस अधीक्षक आ गए, मैंने रात की सारी बात बता कर समझाया कि डीआईजी ने मुझे डीजीपी के साथ व उन्हें आईजी जोन के साथ रहने को कहा है तो वह बोले,वे तो डीजीपी की पार्टी में उनसे दूर चलेंगे जिससे उनकी बात न हो सके॥ अगर वह आईजी जोन के साथ चले तो वह रास्ते भर कुछ न कुछ पूछते रहेंगे और गलती मिलने पर प्रत्येक गोष्ठी में दुहराएँगे, तू दुर्वासा को सँभाल, मैं डीजीपी के साथ भाग रहा हूँ । मैं हँस पड़ा,वह सही थे।मैने डीआईजी को यह बात बता दी, वह ग़ुस्से से दांत पीसते रह गये ।

Comb का अर्थ कंघा होता है , यह तो सभी जानते हैं लेकिन combing का पुलिस या फौज में एक विशेष अर्थ है।जैसे कंघा बाल में छिपे सभी अवांछनीय तत्वों को बाहर निकालने के लिये किया जाता है, वैसे ही किसी स्थान विशेष सै अवांछनीय तत्वों को निकालने के लिएं या उस क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित करने के लिये (एरिया डामिनेशन) कांबिंग की जाती है। इसमें क्षेत्र के आधार पर बल लगता है जो निर्धारित की कांम्बिंग इस बारीकी से करता है उस क्षेत्र में संदिग्ध व्यक्ति या सामान न रहे।

डीजीपी के साथ डीआईजी रेंज, पुलिस अधीक्षक व सीओ सिटी अजय रौतेला, सीओ न्यूरिया दिनकर सिन्हा, एक बटालियन सीमा सुरक्षा बल व कुछ थानाध्यक्ष गण लगे तथा आईजी, कमांडेंट टास्क फोर्स पीएसी सुभाष गुप्त, मैं, सीओ पूरनपुर राजेंद्र यादव, सीओ बीसलपुर रमेश चंद्र साहू, नागालैंड पुलिस, कुछ थानाध्यक्ष व पीएसी दूसरी पार्टी में थे।

मैं आईजी व अन्य बल के साथ गढ़ा रेंज के कार्यालय आकर सभी उप निरीक्षक एवं उसके ऊपर के अधिकारियों को आईजी के सामने एकत्र कर क्षेत्र का नक्शा बांट कर उनकी स्थिति समझा कर रेलवे लाइन तक सतर्कता पूर्वक कांबिंग करने को कहा जहां सामने से दूसरी पार्टी आएगी। सभी टीम लीडर को हैंड सेट देकर आपसी संबंध बनाए रखने तथा कुछ संदिग्ध दिखने पर सेट से सूचित करने का आदेश दिया और डीजीपी की पार्टी से बात कर दोनों पार्टी साथ जंगल के भीतर घुसीं। घुसने से पूर्व मैंने आईजी को चमड़े का आफिस शू पहने देखकर मैं चौंक गया। जंगल में हम सब जंगल शू पहनते हैं जो पैदल चलने में आरामदायक होता है। मैंने तत्काल एक उप निरीक्षक का नया जूता लेकर आईजी को पहनावा कर उसे वाहन सुरक्षा में वहीं लगा दिया।

मेरे साथ स्थानीय थानाध्यक्ष गजरौला हरपाल सिंह व वन विभाग का एक कर्मी था जिससे हम भटक न सकें ।आईजी के साथ मैंने सुभाष गुप्त को लगाकर उनकी कंपनी का एक प्लाटून दायें ,दूसरा बाएं तथा एक प्लाटून आईजी के पीछे लगाया जिससे वह सुरक्षित रहें । मैं उनके बाएं तरफ, राजेन्द्र यादव दाहिने तरफ थे। हम फैलकर निश्चित दूरी बनाकर सावधानी से आगे बढ़ रहे थे।लगभग २.५ किलोमीटर आगे बढ़ने पर फायर लाइन पर पहुँचने पर पाया कि आईजी के साथ मात्र उनके सुरक्षाकर्मी ही थे गुप्त जी व एक कंपनी भटक चुकी थी।और मेरा भी यही हाल था।मेरे साथ थानाध्यक्ष गजरौला व वनकर्मी नहीं थे।मैं दौड़ कर आईजी के पास पहुँचा तो वह बोले,गुप्ता व उसकी पीएसी कहां गई? मैंने बताया कि घने जंगलों में यह हो जाता है।

कँटीली झाड़ियों से बचने के लिए ४-५ डिग्री भी अगर हम घूमेंगे तो कुछ दूर के बाद हम पुनः नहीं मिल पाते। जंगल में वायरलेस के हैंडसेट भी बहुत प्रभावी नहीं होते,ऊँचे वृक्ष उनकी रेडियो तरंगों को आगे नहीं बढ़ने देते। वह कुछ चिंतित दिखे तो मैंने कहा कि ५-५ जवान हम दोनों के साथ हैं जो पर्याप्त हैं ।आकस्मिकता आने पर आसपास चल रहे अन्य बल सहायता हेतु उपलब्ध हो जाएँगे।

मैं तो सप्ताह में ३-४ बार जंगल कांबिंग में जाता था और पीलीभीत का सारा वन क्षेत्र मेरा जाना हुआ था सो मैं निश्चिंत था।आईजी की पहली कांबिंग थी और व्यवहारिक ज्ञान के अभाव में वह कुछ चिंतित हुए । मैंने उन्हें आश्वस्त करने हेतु सीओ राजेंद्र को सेट से पुकार कर लोकेशन ली तो वह ५ मिनट पूर्व फायर लाइन पार की थी।बड़े व घने जंगलों में बीच बीच में चौड़ी सड़क छोड़ी जाती है व बारिश बाद उसकी घासफूस हटाई जाती है जिससे गर्मियों में जंगल में आग लगने पर दमकल इन रास्तों पर चल सकें और आग इन सड़कों को पार न कर सके। इसी रास्ते को फायर लाइन कहते हैं।

एक और अप्रत्याशित घटना रात में हुई। रात में अच्छी बारिश हो गई जिससे जंगल में कहीं कहीं जल भराव सा हो गया और वह पानी जूतों के भीतर जाकर असुविधा भी पैदा करने लगा।आईजी ने इससे दुखी होकर कहा कि मैं ऐसे रास्ते से चलूँ जहां जल भराव न हो तो मैंने बताया कि थोड़ा बहुत तो यह जल प्रत्येक रास्ते पर मिलेगा ।मैंने उनके गनर को इशारे से कहा कि वह आईजी की कार्बाइन ले ले, उसने डरते हुए मांगा तो उसे डांट पड़ गई ।मैं आईजी के लिए एक लाठी भी इसी समय के लिए रखा था, धीरे से वह उन्हें थमाया,थोड़ी ना नुकुर के बाद वह लाठी ले लिए।

अब लाठी और कारबाइन के साथ जंगल में चलना और कठिन हुआ तो मैंने कारबाइन को गनर को देने का अनुरोध डरते डरते किया, वह मुझे देख कर मुस्कुरा कर बोले कि जिस कार्य के लिए वह अधीनस्थों को सदैव डांटते रहे वही काम तुम मुझसे करा रहे हो।दुर्वासा जी जब भी किसी जनपद में जाते तो यदि किसी के हाथ में शस्त्र न हो तो उसे डाँटकर कहते थे कि कभी भी कहीं भी आतंकी आक्रमण हो सकता है, इसलिए हम सभी अपने शस्त्र सदैव साथ रखें ।वह सदैव गोष्ठियों में अपनी कारबाइन साथ रखते थे और हम भी अपनी ए के रायफल उनकी उपस्थिति में अवश्य अपने साथ रखते थे।

आईजी ने विवशता में अपनी कारबाइन अपने गनर को दे दिया।हम आगे बढ़ते रहे।वह बार-बार पूछते कि हम सही चल रहे हैं न , मैं उन्हें आश्वस्त करता रहा यद्यपि मैं स्वयं आश्वस्त नहीं था लेकिन जानता था कि आगे रेलवे लाइन तो मिलेगी ही।मैं थर्मस में पानी लेकर चल रहा था। मुझे प्यास लगी,मैंने पहले आईजी सर से पानी पूछा तो वह बोले कि मंजिल पर पहुँच कर ही पानी लेंगे।मैं पानी पीकर आगे बढ़ा । थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा कि उन्हें प्यास ज़ोर की लगी है, पानी दो। मैं उन्हें दुखी देखा वह अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ने से दुखी थे।मैंने उन्हें थोड़ा रुकने को कहकर तेज़ी से ५०० मीटर आगे जाकर देखा तो मुझे रेलवे लाइन के किनारे के तार दिखे।

मैं प्रसन्न होकर लौटा और बताया कि वह पानी पीकर अपना प्रण न तोड़े, थोड़ी दूर पर ही रेलवे लाइन है। हम शीघ्रता से रेलवे लाइन पहुँचे और वहाँ पहुँचने वाले हम प्रथम थे। मैं संतुष्ट था कि दुर्वासा जी ने डाँट नहीं पिलाई । मैं उन्हें रेल हाल्ट पर ले जाकर रेलवे कर्मचारी के घर से चारपाई निकलवाकर उन्हें उस पर बैठाकर पास की एक छोटी दुकान से चाय व चने की दाल की साधारण सी नमकीन देकर हम सब ने भी ली।चाय पीकर बोले कि चाय अच्छी थी। मैं हँस कर बोला चाय नहीं आपकी थकान अच्छी थी।

रेलवे हाल्ट के पास बड़े व छोटे वाहन आने थे लेकिन वहाँ थे नहीं । सेट से पूछने पर उत्तर मिला कि बारिश के कारण सड़क ख़राब होने से सभी वाहन ३ किलोमीटर पहले ही रुके हैं। हमारी जिप्सियों भी वहीं हैं जिनमें से एक में चाय नाश्ता भी है।कांबिंग की सफलता का भूत उतर गया । वरिष्ठ अधिकारियों को ३ किलोमीटर और पैदल ले जाएँ ,मन उद्वेलित हो गया।उसी समय रेल की पटरी पर एक रेलवे का ठेला आ गया ,मैंने उसे रोक कर बताया थोड़ी देर वह रुके हमारे वरिष्ठ अधिकारी को आगे शाहगढ स्टेशन तक लेता जाय।उन्होंने शीघ्रता से अधिकारियों को लाने को कहा अन्यथा वे चले जाएँगे ।मैंने क्रोध में अपनी ए के ४७ रायफल उस पर तान कर कहा कि वे प्रतीक्षा करें नहीं तो परिणाम भुगते।वे डर कर रुक गए ।

मैं आईजी की सुरक्षा में उनकी सुरक्षा गार्ड छोड़कर डीजीपी को देखने बढ़ा तो सर्वप्रथम मुझे डीआईजी पांडेय जी थके हारे, भूखेप्यासे मिले। मुझे देखते ही भद्दी गालियाँ देते हुए तत्काल पानी मांगा। मैंने कहा कि १०० मीटर आगे आईजी बैठे हैं वहीं पानी चाय है। वह इतने थके थे कि पास में बह रही नहर की गीली पटरी पर बैठ गये और पानी पानी करने लगे। इतने में हमारी जिप्सी चालक ने सेट से बताया कि छोटे वाहन धीरे-धीरे नहर की पटरी से आगे बढ़ रहे हैं और १० मिनट में पहुँच जाएँगे। मैं आश्वस्त हुआ और डीआईजी को भी आश्वस्त किया।

तभी रेलवे लाइन के किनारे से डीजीपी, कमांडेंट पी एस चहल व बीएसएफ की टुकड़ी के साथ आते दिखे।वह जैसे जंगल में घुसे थे उसी भाव भंगिमा के साथ बाहर निकले थे। न कोई हर्ष न विषाद ,चेहरा भाव शून्य था।तब तक जिप्सियों भी आ गई । मैंने पानी की बोतल देकर चाय बिस्किट बढ़ाया, उन्होंने एक बिस्किट लेकर शेष चहल की टुकड़ी को दे दिया, तब तक सभी वरिष्ठ अधिकारी वहीं आकर चाय पान करने लगे।

मैं डीजीपी की प्रतिक्रिया के लिए बेचैन था। आकुलतावश मैंने डीजीपी से पूछ ही लिया कि How was combing, Sir? “Excellent, I enjoyed it. मुझे विश्वास नहीं था कि कि उत्तर प्रदेश पुलिस इतने क्रमबद्ध तरीक़े से कांबिंग योजना बना कर उसका इतने सुंदर ढंग से क्रियान्वयन कर सकती है।”

अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के समक्ष प्रशंसा के ये दो वाक्य सुन कर हृदय में जो भाव आया, वर्णनातीत था। २९ निर्दोष व्यक्तियों की हत्या से उपजा विषाद, अधिकारियों की डांट फटकार, राजनेताओं के कटु वचन, प्रेस की आलोचना, बीते दो दिनों की भागदौड़ का श्रम आदि सभी इस दो वाक्यों में धुल गये ।

जंगल से सभी अधिकारी प्रस्थान किए । सदा की भांति डीजीपी मेरी जिप्सी में बैठे। पीलीभीत जंगल में जब भी प्रकाश सिंह जी भ्रमण किए,सदैव मेरी जिप्सी में ही बैठते थे और मैं स्वयं वाहन चलाता था। रास्ते में बहुत कम बात करते और बातें भी जवानों के मनोबल की होती थी।आज भी वही स्थिति थी। मैं चालक था , सीओ सिटी अजय रौतेला,ड्राइवर व गनर पीछे बैठे थे।पतली नहर की पटरियाँ पतली व फिसलन भरी थी। कुछ दूर चलने पर जिप्सी नहर की तरफ झुकी मैंने तुरंत गाड़ी सँभाल ली।गाड़ी का वायरलेस खुला था,थोड़ी देर बाद वायरलेस पर जवानों के मूर्खतापूर्ण संदेश सुनाई देने लगे।

मैं हतप्रभ हो गया। डीजीपी ने कहा कि ए बेहूदे संदेश क्यों? मैंने क्षमा माँगते हुए बताया कि जवानों की ट्रकों को भी यहीं आना था, रात बारिश होने से वे यहां नहीं पहुँच पा रही हैं और जवानों को ३ किलोमीटर और पैदल जाना है, वे थके और भूखे हैं, वहीं खीझ मिटा रहे हैं ।वह संतुष्ट दिखे।

मैंने उनसे अनुमति लेकर वायरलेस सेट बंद करना चाहा तो गाड़ी दूसरी तरफ भागी। मैंने ब्रेक मार कर रोका और उतर कर कहा कि अनुमति हो तो अब ड्राइवर चला ले। “भगवान दो बार तो बचा लिया, कितनी बार बचाएगा।”मैं पीछे जाकर बैठ गया और ड्राइवर ने गाड़ी चलाई।आगे पक्की सड़क पर सभी वरिष्ठ अधिकारियों के वाहन खड़े थे और सभी वहाँ जिप्सियों से उतर गए ।

मैंने डीजीपी सर से कहा कि आज मैं उत्तर प्रदेश का सबसे भाग्यशाली पुलिस अधिकारी हूँ, आज प्रदेश के डीजीपी ने मेरी योजना से जंगल कांबिंग की और इसे पूर्ण सफल भी बताया। “हमारे लिए भी प्रसन्नता की बात है” वह बोले। मैंने फिर कहा कि आज मैं अपने को सबसे बड़ा दुर्भाग्यशाली भी मान रहा हूँ ।

“क्यों? उन्होंने टोका। मेरी नालायकी और असफलता के कारण २९ निर्दोष नागरिकों की जान गई और डीजीपी को पैदल जंगल में कांबिंग करना पड़ा, मैंने उत्तर दिया ।

वह बोले कि “यह तुम्हारा या अन्य किसी का दुर्भाग्य नहीं है, आतंकवाद में ऐसे हादसे होते रहेंगे। पंजाब में तराई की अपेक्षा अत्यधिक बल लगा है लेकिन हिंसा रुक नहीं रही है। अल्प साधनों के बावजूद हमारा बल ड्यूटी पर बना है और मुक़ाबला कर रहा है, यह उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए गर्व की बात है।” उन्होंने उपस्थित अधिकारियों से कहा कि कांबिंग एक थकाऊ प्रक्रिया है। सप्ताह में २-३ बार से अधिक न कराई जाय। वह पूरनपुर चीनी मिल में लंच लेकर कार से लखनऊ लौट गये और मैं कयी दिन बाद पूरनपुर बीएसएफ कैंप से पीलीभीत घर आया।

तीन दिन बाद मुझे आईजी बरेली के पास जाना हुआ। वहाँ से डीआईजी कार्यालय आया तो पता चला कि वह अस्वस्थ हैं, मैं बंगले जाकर सूचना दी तो अपने कमरे में ही बुला लिया और बोले कि कांबिंग की थकान के बाद से ही वह अस्वस्थ हैं, ठीक होने में २-३ दिन और लगेंगे ।

मैंने हँस कर कहा कि रोज़ रोज़ जो मुझसे कांबिंग कराते थे, मेरी भी कभी-कभी ऐसी ही हालत होती थी। वह हँस दिए और वहीं उनके साथ चाय पीकर पीलीभीत लौट आया।होता यह था कि विभिन्न स्रोतों से आतंकियों की उपस्थिति की सूचना उन्हें मिलती थी और डीआईजी साहब रिपीटर चैनल पर मुझसे बात कर मेरे पुलिस अधीक्षक को निकम्मा बता कर मुझे दौड़ाते थे और रिपीटर चैनल का यह वार्तालाप पूरा तराई सुनता था, कभी-कभी हमारे कप्तान भी सुनकर मुझसे ही इसकी शिकायत करते थे। मैंने कुछेक बार डीआईजी को समझाना भी चाहा कि जो आदेश देना हो मुझे दे दें, कप्तान को बीच में न घसीटें,इससे हमारे संबंध ख़राब होते हैं। लेकिन डीआईजी तो डीआईजी , वह नहीं माने।



पुलिस में पहले क्रासबेल्ट की परंपरा थी यानि जब पुलिस अधीक्षक कार्यक्रम देकर थानों का निरीक्षण करते थे तो थाना स्टाफ़ क्रासबेल्ट बांध कर रैतिक ड्रेस (सेरेमोनियल ड्रेस )में स्वागत तथा विदाई करते थे।यही हाल जनपदों पुलिस अधिकारियों का तब होता था जब वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का जनपद में शासकीय कार्य हेतु आगमन होता था ।इससे अधीनस्थ लोग जीन बँधे घोड़े की तरह कसे रहकर कष्ट सहते थे। प्रकाश सिंह जी ने डीजीपी बनते ही आदेश पारित किया कि क्रासबेल्ट अब हर अवसर पर न धारण केवल रैतिक अवसरों पर ही धारण करेंगे। इससे ब्रिटिश काल की लंबी परंपरा का सुखद अंत हुआ ।

पीलीभीत के कार्यकाल में बार- बार लखनऊ जाना होता था और प्रयास रहता था कि प्रकाश सिंह सर से मुलाक़ात भी हो जाय। ऐसे ही एक मुलाक़ात में उन्होंने प्यार से समझाया कि मैं अपनी जिप्सी में टेप रेकार्डर लगवा लूँ और बाहर जाते समय भजन सुना करूँ, इससे एक तो मन में शांति रहेगी और ईश्वर न करे कभी बमब्लास्ट में या ऐम्बुश में शहीद हुए तो अंतिम समय में कान में ईश्वर का नाम ही रहेगा।इस सुझाव का पुलिस कार्यप्रणाली से कुछ लेना देना नहीं है लेकिन धर्मभीरु मन को शांति अवश्य मिलेगी।“हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ॥”
३० नवंबर १९९२को समाचार मिला कि प्रकाश सिंह जी डीजीपी पद से हटाकर डीजी होमगार्ड बनाए गए ।

ख़बर अप्रत्याशित थी।सुनने में आया कि अयोध्या में आगामी कारसेवा में कुछ होने वाला है और प्रकाश सिंह जी उस कार्य हेतु अनुपयुक्त हैं ।मैं उनका हृदय से प्रशंसक था और वहअच्छी तरह से आतंकवाद की लड़ाई का नेतृत्व भी कर रहे थे, ऐसे समय उनका जाना पीड़ादायक लगा, यह पुलिसविभाग के लिए ही नहीं मेरे लिये व्यक्तिगत क्षति थी। मैं एक सप्ताह बाद लखनऊ जाकर महानगर स्थित उनके आवास पर उनसे मिला । सौभाग्य से वह अकेले थे।वार्ता के क्रम में उन्होंने बताया कि वह मेरा स्थानांतरण करने की सोच रहे थे और इससे पूर्व उनका ही स्थानांतरण हो गया।उन्होंने मुझे राय दी कि मैं अपना स्थानांतरण अन्यत्र करा लूं और तब तक सँभल कर फील्ड में जाऊँ क्योंकि आईबी व अन्य स्रोतों से पता चला है कि तराई में आतंकियों का सबसे बड़ा टार्गेट मैं बन चुका हूँ, यदि मुझे कुछ हो जाएगा तो वह स्वयं को दोषी मानेंगे ।

मैंने कहा कि वह मुझे सदैव बहादुर योद्धा की तरह आगे रह कर आतंकियों से लड़ने की प्रेरणा देते रहे हैं, अब पीछे हटने की बात न करें । भाग्य में जो भी होगा देखा जाएगा परंतु मैं भगोड़ा सैनिक के स्थान पर आतंकियों हाथों मारा जाना अधिक पसंद करूँगा। उनके आशीर्वाद से आतंकी मेरा कुछ नहीं कर पाएंगे ।वह बहुत भावुक हो गये थे। आज मुझे प्रकाश सिंह जी एक कड़क जनरल की जगह एक ममतामयी अभिभावक अधिक लगे।बहुत दिनों बाद आज स्वर्गीय पिताजी बहुत याद आए । मैं भी भावुक हो गया था और उनके सामने अब बैठना संभव नहीं रह गया था। मैं पलकें पोंछ कर उनका चरण स्पर्श कर तेज़ी से घर के बाहर निकल गया ।

बता दें कि पीलीभीत में १० आतंकियों के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद पीलीभीत के कप्तान व अन्य स्थानांतरित हो गये थे, मैं ही बचा था। मृतक आतंकी बलजीत सिंह पप्पू की हत्या का बदला लेने उसका भाई निशान सिंह साथियों के साथ पीलीभीत आया था लेकिन पता लगने पर वह अमरिया थाना क्षेत्र में मारा गया और एक साथी बंडा थाना क्षेत्र में मारा गया एक शस्त्रों के साथ गिरफ्तार हुआ था। एक दिन प्रातः ९ बजे एक जिप्सी में एक गार्ड मेरे बंगले पर आकर मुझे रिपोर्ट किया। मैंने कारण पूछा तो बताया कि वे मेरी सुरक्षा के लिए लगाए गये हैं।

मुझे आश्चर्य हुआ कि एक गार्ड मेरे बंगले पर स्थाई रूप से लगी है एक साथ चलती है, फिर तीसरी क्यों? मैंने आर आई प्रेम सिंह सांगा से पूछा तो वे बोले कि कप्तान सुलखान सिंह जी के लिखित आदेश से गार्द भेजी गई है जो आपके साथ सुरक्षा ड्यूटी में चलेगी। मैं सीधे सुलखान सर के पास जाकर कारण पूछा तो बोले कि आई.बी. की संस्तुति पर शासन ने मुझे Z श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की है, उसी आदेश से गार्ड लगी है।

मैंने निवेदन किया कि हमारे सीओ एक जिप्सी में एक गार्ड के साथ क्षेत्र में निर्भीक भ्रमणशील हैं, मैं दूसरी गार्ड लेकर उनका नैतिक नेतृत्व कैसे करूँगा? सुलखान सर के समझाने के बाद भी मैंने अपनी सुरक्षा गार्ड लेने से लिखित रूप से मना कर दिया। संभवतः प्रकाश सिंह सर के मस्तिष्क में यह बात कहीं रही होगी।

लेखक बद्री प्रसाद सिंह रिटायर आईपीएस अफ़सर हैं.


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