अजीत अंजुम-
जगदीश उपासने नाम का ये आदमी इंडिया टुडे जैसी मैगजीन का संपादक रहा है और बीजेपी राज में संघ का ये कृपापात्र माखनलाल पत्रकारिता यूनिवर्सिटी का कुलपति भी बना . घोर संघी और परम दर्ज का नफ़रती है .
बेटी की उम्र की लड़की के लिए कितना घटिया ट्वीट कर रहा है . मोदी की चाटुकारिता में इतना तो मत गिरा उपासने जी . आपने अपनी उपासना के दम पर बहुत कुछ पा लिया है अब तो शर्म करो .
नॉर्वे की उस लड़की रिपोर्टर के पीछे इस हद तक पड़े हो क्योंकि उसने मोदी जी से एक सवाल पूछ लिया ? बुढ़ापे में इतनी नीचता है तो पहले कितने रहे होगे ?
राकेश पाठक-
पूर्व कुलपति जी के नाम खुला पत्र
मान्यवर श्री जगदीश उपासने जी
सादर वंदे, अत्र कुशलम तत्रास्तु,
आगे समाचार यह है कि आज अनायास आपका फेसबुक प्रोफाइल दृष्टिगोचर हुआ।
आप माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल (MCU) के कुलपति और इंडिया टुडे जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के कार्यकारी संपादक रहे हैं।
आप प्रसार भारती के भर्ती बोर्ड के अध्यक्ष भी रहे हैं। इसलिए आपकी वॉल पर जो कुछ दिखा उसे देख कर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ फिर स्मरण हुआ कि आप ‘संघ दक्ष’ हैं, पाञ्चजन्य और ऑर्गनाइजर से भी संबद्ध रहे हैं तो विश्वास हुआ कि आप ऐसी सामग्री प्रस्तुत कर सकते हैं। किम आश्चर्यम..!
मान्यवर,
आपने प्रधानमंत्री के नॉर्वे प्रवास पर प्रश्न पूछने वाली महिला पत्रकार Helle Lyng के दो छायाचित्र प्रस्तुत करते हुए अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।
दोनों पोस्ट में महिला पत्रकार अधोवस्त्रों (बिकिनी) में दिख रही है।
आपकी दोनों पोस्ट के स्क्रीन शॉट संलग्न हैं!

मान्यवर,
आपने उसके प्रधानमंत्री से प्रश्न पूछने के ‘अपराध’ में उसके ऐसे छायाचित्र प्रदर्शित किए हैं जिनका उसके कामकाज से कोई संबंध नहीं है।
आपने एक पोस्ट में Let’s Expose के नाम पर उस महिला के बारे में जो कुछ लिखा है वो आईटी सेल की ऐसी जानकारियों से परिपूर्ण है जिससे कुछ भी अन्यथा साबित नहीं होता।
आप तो पत्रकार रहे हैं, संपादक रहे हैं क्या आप बता सकते हैं कि एक पत्रकार का प्रश्न पूछना क्या ऐसा अपराध है कि आप उसके निजी जीवन पर आक्षेप कर रहे हैं?
महोदय,
क्या आप नहीं जानते कि पश्चिमी समाज में और अब तो भारतीय समाज में भी निजी अवसर पर ऐसे वस्त्र धारण करना सहज और सामान्य है? इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है।
वैसे भी वस्त्राभूषण, खानपान आदि निजता के अधिकार में आते हैं। क्या आप एक स्त्री को अपनी इच्छा के पहनावे का अधिकार न देंगे?
क्या आपको विनम्रता से स्मरण करवाया जाए कि हमारी संसद में ऐसी माननीय सदस्य हैं जो पूर्व में फिल्म और टेलीविजन में काम करती थीं।
उनके व्यावसायिक काम के समय के ऐसे अनेक छायाचित्र आज भी उपलब्ध हैं जिनमें वे ऐसे ही अधोवस्त्रों (बिकनी) में हैं।
हम नाम नहीं लिख रहे आप उनसे परिचित ही हैं, वे आपकी ही पार्टी की सम्मानित सदस्य हैं।
तो क्या आप उनके विषय में भी ऐसे ही विचार रखते हैं?
आप तो एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे हैं, क्या आपने विचार किया कि आपके कार्यकाल में जो विद्यार्थी अध्ययनरत रहे हैं उन्हें आपकी ऐसी पोस्ट से कैसी अनुभूति हुई होगी.?
विशेषकर वे छात्राएं जिन्होंने कुलपति के रूप में आपके व्याख्यान सुने होंगे, उन्हें कैसा प्रतीत हो रहा होगा? कितना श्रेयस्कर होता कि आप पत्रकारीय दृष्टिकोण से उस महिला पत्रकार के प्रश्न पूछने पर कोई तार्किक, तथ्यात्मक हस्तक्षेप करते। उससे और उसके कार्य से असहमत होने का आपको संपूर्ण अधिकार है..
उसने आपकी पार्टी के नेता से प्रश्न किया इससे आपका आहत, व्यथित होना भी स्वाभाविक और स्वीकार्य है लेकिन इसके लिए उसका चरित्र हनन करना सर्वथा अनुचित ही माना जाएगा।
वैसे भी आप जैसे भद्र, सुशिक्षित, प्रकांड विद्वान और धीर गंभीर संपादक से किसी ‘दो कौड़ी के ट्रोल’ जैसी भाषा और पोस्ट की अपेक्षा ट्रोल आर्मी को हो तो हो शेष शायद ही कोई आपसे ऐसी आशा रखता होगा।
आपने देख लिया होगा कि आपकी दोनों पोस्ट पर 99 प्रतिशत कमेंट आपसे असहमति वाले ही हैं। सबने आपकी पोस्ट पर आपत्ति ही की है।
हां अब तक आपकी पोस्ट पर कोई एक महानुभाव हैं जिन्होंने इतनी घृणित टिप्पणी (‘घिनौनी’ पढ़ें) की है कि किसी भी सभ्य मनुष्य को उबकाई आ जाएगी।
हो सकता है आपकी दृष्टि में वही सर्वश्रेष्ठ कमेंट हो।
वैसे सत्य तो यह है कि मुझ अकिंचन को आपके इस कृत्य पर आश्चर्य या क्षोभ होना ही नहीं चाहिए क्योंकि आप जिस ‘विचार परिवार’ से संबद्ध हैं उसके मूल में ही स्त्रीद्वेष अंतर्निहित है।
आपके विचार परिवार के ‘शीर्ष पुरुष’ अपने श्रीमुख से पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड, जर्सी गाय आदि जैसे सुभाषित उच्चारते रहे हैं तो आप भी….!
और हां आपकी पार्टी के शीर्ष पुरुष जिन्हें माय डियर फ्रेंड कहते हैं, जिसकी जीत के लिए आप सबने हवन,यज्ञ किए थे उसके एप्स्टीन फाइल्स वाले चित्र भी आपने देखे ही होंगे।
अस्तु
स्वयं पत्रकारिता का अति सामान्य विद्यार्थी होने के कारण आप जैसे श्रेष्ठ पत्रकार, संपादक की ऐसी दशा देख कर सचमुच खेद हुआ।
चूंकि आपकी प्रस्तुति सार्वजनिक पटल पर थी, उस पर सार्वजनिक विमर्श ही उचित प्रतीत हुआ इस आशय से यह खुला पत्र लिखा है।
आशा है हमारे हस्तक्षेप को स्वस्थ विमर्श के रूप में ही लेंगे।
आप दीर्घायु हों, शतायु हों।
शुभकामनाएं।
सादर
स्नेहाधीन
डॉ राकेश पाठक


