
Dilip C Mandal : महाराष्ट्र के लोकतांत्रिक, न्यायप्रिय और समतावादी लोगों का अभिनंदन! शानदार, ज़बरदस्त, ज़िंदाबाद। देश को फुले, सावित्रीबाई, शाहू, बाबासाहेब जैसे महापुरुष देने वाले प्रदेश ने देश को एक बार फिर रास्ता दिखाया है और इसकी गूँज देश के अलग अलग हिस्सों में सुनाई देगी, तो इस बात को याद किया जाएगा कि नींव का पत्थर महाराष्ट्र के लोगों ने रखा था। लोकमत, महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा बिकने वाला समाचारपत्र है और ज़ाहिर है कि समाज के तमाम समूहों के लोग उसे खरीदते हैं।
इसके बावजूद अखबार के संपादक ने अपने बहुसंख्यक पाठकों के न्यायपूर्ण हित के खिलाफ जाते हुए आरक्षण के खिलाफ पहले पन्ने पर एक ज़हरीला लेख लिखा, जिससे समाज में कड़वाहट फैलने की आशंका थी। इस वजह से राज्य में, खासकर नागपुर में हजारों लोग शांतिपूर्ण तरीके से सड़कों पर निकल आए और अखबार के इस अलोकतांत्रिक व्यवहार का ज़ाहिर निषेध किया। अखबार को जलाया गया और लोगों ने ग्राहकी बंद करा दी। यह संख्या इतनी बडी थी कि अगले ही दिन अखबार घुटनों के बल आ गया और पहले पेज पर छापा कि वह आरक्षण के खिलाफ नहीं है। साथ ही यह भी कहा कि उसने आज तक कभी भी आरक्षण का विरोध नहीं किया। 🙂 झूठ कहा। लेकिन जाने दीजिए। अस्तु, बधाई।
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.
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Devendra Surjan
September 6, 2015 at 3:33 pm
लोकमत के मालिक और इस लेख के लेखक विजय दर्डा हैं जो कांग्रेस के भूतपूर्व / राज्यसभा सांसद हैं . विजय दर्डा वही हैं जिनका नाम कोयला ब्लॉक हथियाने में आया था और जो कांग्रेसी सांसद होते हुए भी नरेंद्र मोदी के साथ कुछ वर्ष पूर्व मंच साझा करते दिखे थे . कहा जाता है कि पटेल आरक्षण के बहाने सरकार जातिगत आरक्षण को खत्म करना चाहती है. इस दृष्टि से देखें तो लेख का मन्तव्य और लेखक को होने वाला फायदा साफ़ नज़र आ जाता है .
sanjeev Singh thakur
September 6, 2015 at 3:38 pm
reservation should definitely scrapped. lokmat ne sahi likha that. parantu paper ko aarthik nuksan pahunchane ki black maling k chalte usse khandan karna pada hogs.
umesh shukla
September 7, 2015 at 8:50 am
vijay darda ne sahi to likha ki ab bahut ho chuka aarakshan khatm hona chahiye. isme bura kya kah rahe hain vo, aarakshan kisi ki bapauti nahi hai. ye ek kanooni pravadahan thi. ab desh ki medhaon ke pair men aur lambe samay tak aarakshan ki pati nahi bandhi jaa sakati. darda ka itishas kuch bhi ho vo sahi kah aur likh rahe hain.
umesh shukla
September 7, 2015 at 8:53 am
sahi to likha hai dardaji ne. isme kisi ko harz ho to yeh uski pareshani hai. samapadak ko raay jahir karane ka adhikar to hai hi. aarakshan to khatm hona hi chahiye.