क्या बीबीसी पर भी सेक्स बिकाऊ है?

Dilip Mandal : बीबीसी हिंदी का मोस्ट पॉपुलर ही क्या हिंदी वेब जगत के एक बड़े हिस्से का सच है? भास्कर, लल्लनटॉप, टाइम्स ग्रुप, आज तक वग़ैरह के कुल ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा सेक्स खोजता हुआ वहाँ पहुँचता है। सेक्स का कंटेंट बिकाऊ है। सब जानते हैं। भारत की तमाम बड़ी साइट यह खेल खेलती हैं। ज्योतिष, अंधविश्वास, पाखंड, क्रिकेट सबका मार्केट है। वेब पर अद्भुत रस सबसे लोकप्रिय रस है। लेकिन बीबीसी में भारतीय पब्लिक यह क्या खोज रही है? जो चीज़ होम पेज पर नहीं है, वह टॉप URL कैसे है? बीबीसी हिंदी पर कई बार टॉप 10 में 5 ख़बरें सेक्स की होती हैं।

क्या बीबीसी पर भी सेक्स बिकाऊ है? क्या यह बीबीसी की ब्रैंड इमेज के विपरीत बात नहीं है? मैं वैल्यू जजमेंट नहीं कर रहा। सही और ग़लत के पचड़े में यहाँ नहीं हूँ। बात सिर्फ ब्रैंड और कंटेंट के अंतर्विरोध की है। ब्रैंड वह नहीं है जो आप क्लेम करते हैं यानी होने का दावा करते हैं। ब्रैंड वह है जो यूज़र आपको समझता है। जिसकी तलाश में वह आपके पास आता है। ज़ी या इंडिया टीवी या जागरण का निष्पक्ष होने का क्लेम उसका ब्रैंड नहीं है। उनका ब्रैंड संघी होना है। जो इस अलॉगरिदम या गणित को समझते हैं, उनसे इस बारे में जानना चाहूँगा। यह जानते हुए भी कि बीबीसी का कंटेंट कई और वेबसाइट से बेहतर है। सेक्स बेचकर अगर बीबीसी ने नंबर वन साइट का दर्जा पा भी लिया तो क्या वह उसी बीबीसी की कामयाबी है, जिसे हम एक न्यूज साइट के तौर पर जानते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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दिलीप मंडल टीआरपी खोर हैं, पहले खुद आईडी डिएक्टिवेट किया, फिर हल्ला मचाया- ”फेसबुक ने ब्लाक कर दिया!”

Ashish Maharshi : इंडिया टुडे में अपनी घटिया पत्रकारिता के जरिए बदनाम हो चुके दिलीप मंडल इनदिनों फेसबुक के निशाने पर हैं। मंडल जी जिस नेशनल दस्तक नामक एक वेबसाइट के लिए पैसे लेकर ज्ञान पेलते हैं, उसे फेसबुक ने ब्लॉक कर दिया है। नेशनल दस्तक पर लगातार ये आरोप लगता रहा है कि ये साइट दूसरे का कंटेंट चोरी करके यूज करती है। इसके अलावा समाज में नफरत फैलाने का भी दिलीप मंडल और नेशनल दस्तक पर आरोप लगता रहा है।

इतना ही नहीं, मंडल पर ये भी आरोप जगजाहिर है कि वे यूपी और बिहार के कुछ नेताओं से पैसे लेकर लगातार उनके पक्ष में लिखते रहे हैं। हालांकि, कई बार ये देखा गया है कि प्रेस क्लब और फेसबुक पर पत्रकारिता का पाठ पढ़ाने वाले पत्रकार नेताओं के हाथ की कठपुतली बनकर पैसे कमाने में यकीन रखते हैं। मंडल पर यहां तक आरोप है कि शरद यादव की सिफारिश पर उन्हें इंडिया टुडे में नौकरी मिली थी।

Mohammad Anas : दिलीप मंडल टीआरपी खोर हैं। यदि किसी को मुझ पर यक़ीन नहीं हो रहा तो दिलीप मंडल अपने फेसबुक अकाउंट का यूज़र नेम/पॉसवर्ड दे दें। अगले ही सेकंड चालू करके दिखा दूंगा। यह इमोशनल ड्रॉमा है। चर्चा में बने रहने के लिए। लोग बेवजह एक अराजक और धूर्त आदमी को लेकर लोकतंत्र और संविधान की दुहाई दे रहे हैं। खुद से आईडी डिएक्टिवेट करके बताइए कि फेसबुक ने ब्लॉक किया है। फेसबुक ब्लॉक करता है तो प्रोफाइल सबको दिखती है। खुद से बंद करने पर किसी को नहीं दिखती। मुझे नहीं देते यूज़रनेम/पॉसवर्ड तो किसी और को दे दें।

Rahul Sankrityaayan : नेशनल दस्तक से बेहतर और तथ्यात्मक कवरेज TheWire.in करता है. हां, ये बात अलग है कि वो जहर नहीं फैलाता. अगर अलग तरह की कवरेज/ मेन स्ट्रीम मीडिया में ना उठाए जाने वाले मुद्दों के चलते आपको आज ब्लॉक किया गया है फिर तो TheWire को फेसबुक कब का ब्लॉक कर देता. उनकी खबरें आपसे ज्यादा तथ्यात्मक, बेहतर और शानदार होती हैं. वायरल भी होती हैं.

पत्रकार त्रयी आशीष महर्षि, मोहम्मद अनस और राहुल सांकृत्यायन की एफबी वॉल से.

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जस्टिस कर्णन की जीवनी लिखने के लिए दिलीप मंडल को मिले पचास लाख रुपये!

चर्चित पत्रकार दिलीप मंडल के बारे में खबर आ रही है कि वे जस्टिस कर्णन पर किताब लिखेंगे जिसके लिए प्रकाशक ने उन्हें पचास लाख रुपये दिए हैं. दलित समुदाय से आने वाले जस्टिस कर्णन की जीवनी लिखने को लेकर प्रकाशक से डील पक्की होने के बाद दिलीप मंडल अपने मित्रों को लेकर जस्टिस कर्णन से मिलने कलकत्ता गए. आने-जाने, खिलाने-पिलाने का खर्च प्रकाशक ने उठाया. किताब हिदी, अंग्रेजी, तमिल और कन्नड़ में छपेगी. ज्ञात हो कि दिलीप मंडल ने अब अपना जीवन दलित उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है और फेसबुक पर हर वक्त वह दलित दलित लिखते रहते हैं जिसेक कारण उनके प्रशंसक और विरोधी भारी मात्रा में पैदा हो गए हैं.

पिछले दिनों जेएनयू के कन्हैया की आत्मकथा के लिए जॉगरनॉट प्रकाशन ने 30 लाख रूपए दिए थे. कन्हैया की किताब छप चुकी है, और खूब बिक रही है. एक प्रकाशन ने हार्दिक पटेल की आत्मकथा के लिए भी एक बड़ा अमांउट ऑफर किया है. वह किताब शायद अभी प्रेस में है. बताया जा रहा है कि दिलीप मंडल को 50 लाख में से 30 लाख की पेमेंट हो चुकी है. बाकी 20 लाख किताब की पांडुलिपि सौंपने पर मिलेंगे. दिलीप ने वादा किया है कि वह दो महीने में आत्मकथा लिखकर प्रकाशक को सौंप देंगे. इसके लिए उन्हें कई बार जस्टिस कर्णन से मिलना होगा. सारा टीए-डीए प्रकाशक उठाएगा और एक लिपिक (नोट्स लेने के लिए) का पारिश्रमिक भी प्रकाशक ही देगा. एक महीने के काम का लगभग 40 हजार.

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इंडिया टीवी वाले शर्मा साहेब अखिलेश जी के पक्ष में पहला शब्द कब बोलेंगे?

Dilip Mandal : सपा के दोस्तों, इंडिया टीवी वाले जिस शर्मा साहेब को अखिलेश जी ने 11 लाख रुपए और 50,000 रुपए मासिक पेंशन वाली यश भारती दी, उनसे पूछिए कि वे अखिलेश के पक्ष में पहला शब्द कब बोलेंगे। ऐसे सैकड़ों उपकृत लोग हैं, उनसे बात कीजिए। दैनिक जागरण के मालिक को राज्यसभा भेजा था, उनसे पूछिए। विनीत जैन को नोएडा में 104 एकड़ ज़मीन दी है, टाइम्स ऑफ इंडिया से पूछिए। लखनऊ में जिन पत्रकारों को ज़मीन दी है, उनसे बात कीजिए।

Zee न्यूज के मालिक पर आपके इतने उपकार हैं, मुलायम परिवार की शादी की पार्टी उनके फ़ार्म हाउस में होती है, उनको बोलिए कि आपके लिए गाएँ। उनमें लगभग सारे बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं। मैं क्यों? मैं किसी सरकार या पार्टी का उपकार नहीं लेता। अपने मन की लिखता हूँ। मुझसे मेरी मर्ज़ी के खिलाफ आप एक शब्द नहीं लिखवा सकते। वैसे भी मेरा क्या है? मैं तो आपका दैनिक इतिहास लेखक हूँ। डाटा पैक भी अपना है। रोज़नामचा लिखता हूँ। सही लगा तो कल फिर आपकी तारीफ कर दूँगा। मेरा डाटा पैक, मेरी मर्ज़ी। मैंने आपका पेंशन नहीं खाया है। आपके नमक का एक दाना नहीं खाया है। पेंशनहरामी करने वालों को पकड़िए।

हर चैनल और अखबार या तो BSP को कमज़ोर दिखा रहे हैं या नहीं दिखा रहे हैं। उनका ईश्वर न करे, अगर बीएसपी पाँचवीं बार सत्ता में आ गई तो वे बेचारे क्या करेंगे? क्या करेंगे? कटोरा लेकर सरकारी विज्ञापन के लिए सरकार के दरवाज़े पर खड़े हो जाएँगे। और क्या?

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से 

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2019 चुनाव तक ओपिनियन मेकिंग पोल की दुकानदारी पूरी तरह बंद हो जाएगी?

Dilip Mandal : बिहार चुनाव में 14 ओपिनियन मेकिंग पोल लालू और नीतीश को हरा रहे थे। यूपी को लेकर आए तीनों ओपिनियन मेकिंग पोल बीएसपी को तीसरे नंबर पर दिखा रहे हैं। तीन ही पोल हुए हैं। इस रफ्तार से 2019 के लोकसभा चुनाव तक ओपिनियन मेकिंग पोल की दुकानदारी पूरी तरह बंद हो जाएगी। लोगों को मीडिया के अंडरवर्ल्ड के बारे में जानकारी हो गई है।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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फ़ैज़ाबाद में दैनिक जागरण ने आज बीएसपी की कोई ख़बर नहीं छापी!

Dilip Mandal : एक लाख का इनाम आप भी जीत सकते हैं! अभी। अनिल कुमार पटेल बता रहे हैं कि फ़ैज़ाबाद में दैनिक जागरण ने आज बीएसपी की कोई ख़बर नहीं छापी है। बीएसपी की बुराई की ख़बर भी नहीं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संघ, बुख़ारी और पर्सनल लॉ बोर्ड के कमाल फारुखी द्वारा बीएसपी को कल समर्थन दिया गया। ये ख़बरें होनी चाहिए। नहीं है। कुछ नहीं है।

जिस पार्टी की राज्य में चार बार सरकारें बनी हों, जिसे आख़िरी चुनाव में 20% वोट मिला हो, जो वोट शेयर के हिसाब से देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी हो, उसे मीडिया मार डालना क्यों चाहता है। चर्चा से बाहर कर देना हत्या के समान है। हालाँकि सोशल मीडिया है, फिर भी गाँव तक पहुँच के मामले में अखबार आगे हैं।

यह हाल तमाम अख़बारों और चैनलों का है। कोई कम तो कोई ज़्यादा। कम पढ़े लिखे लोग तो पूरी तरह अखबार और टीवी पर निर्भर हैं। वे बेचारे क्या करें? बहरहाल अनिल पटेल की घोषणा है कि उनके शहर के आज के दैनिक जागरण में अगर बीएसपी की कोई भी ख़बर अगर आप ढूँढ देंगे, तो वे आपको एक लाख रुपए देंगे।

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अख़बारों को ऐसे पढ़ें या फिर न पढ़ें! अमर उजाला यूपी में दूसरा सबसे ज़्यादा बिकने वाला अखबार है। जागरण के मुकाबले संतुलित है। आज दिल्ली दफ्तर में उसका नोएडा संस्करण देख रहा हूँ, जहाँ कल वोट पड़ेंगे। इस अखबार में आज चुनाव से संबंधित कुल 26 तस्वीरें हैं। इनमें पार्टियों का हिसाब यह है:

बीजेपी – 15
सपा+कांग्रेस – 8
बीएसपी – 2
आरएलडी – 1

एक कॉलम से बड़ी 6 तस्वीरें हैं। सभी बीजेपी की हैं। पहले पेज पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का इंटरव्यू है कि “जाटों के लिए बीजेपी से बेहतर विकल्प नहीं”। प्रेस कौंसिल और चुनाव आयोग दोनों को जाटों वाली ख़बर का संज्ञान लेना चाहिए। मतदान से एक दिन पहले एक संतुलित अखबार का यह हाल है।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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अगर आप SC, ST, OBC हैं तो बाकियों के बराबर होने से काम नहीं चलेगा : दिलीप मंडल

Dilip Mandal : आज शायद पहली बार मेरी अपनी कहानी. जब मैं पत्रकारिता में आया तो हर दिन कम से कम दस अखबार पढ़ता था. क्योंकि मेरे नाम के पीछे जो लगा है, उसके साथ अगर मैं अपने साथ वालों से दोगुनी जानकारी न रखता, तो मुझे बराबर का भी न माना जाता. बाकी लोग न पढ़कर भी जानकार माने जाने का सुख ले सकते थे. उनका ज्ञानी होना स्वयंसिद्ध था. यह उनके टाइटिल में था. पिता के टाइटिल में था.

जनसत्ता, कोलकाता में जब मैं काम करता था, तो न्यूज डेस्क पर सबके बराबर काम करता था. यानी आठ से दस घंटे. लेकिन इसके अलावा, ऑफिस आने से पहले, मैं हर रोज तीन-चार घंटे की रिपोर्टिंग अलग से करता था. इसके अलावा ए़डिट पेज के लिए लेख भी लिखता था. डेस्क के लोग आम तौर पर यह नहीं करते थे. मैं हर रिपोर्टिंग दिन करता था. मेरा वर्किग आवर औरों से डेढ़ गुना था. इस वजह से कम सोता था. यह मेरी च्वाइस थीं. वरना, मेरा भी काम सिर्फ ऑफिस वर्क से चल जाता.

लेकिन मुझे सिर्फ काम नहीं चलाना था. सबके कम उम्र में संपादक बनना था. यह सब इसलिए बता रहा हूं कि अगर आप SC, ST, OBC हैं तो बाकियों के बराबर होने से काम नहीं चलेगा. औरों से दोगुना तक ज्यादा मेहनत करेंगे, उनसे बेहतर करेंगे, तब कहीं बराबर के माने जाएंगे.

आपका ज्ञान, आपका पांडित्य स्वयंसिद्ध नहीं है. हर दिन उसे साबित करना पड़ेगा. बराबर होने से आपका काम नहीं चलने वाला. आपको ज्यादा करना होगा. इंडिया टुडे का पहला मैनेजिंग एडिटर होने के बावजूद, या तमाम शीर्ष पदों पर होने के बावजूद मेरा टैलेंट स्वयंसिद्ध नहीं है. मीडिया की सबसे पॉपुलर किताब लिखने के बावजूद मेरी प्रतिभा स्वयंसिद्ध नहीं है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के लिए मेरा चैप्टर लिखना भी मुझे टैलेंटेड कहे जाने के लिए काफी नहीं है.

अब भी मैं नियमित लाइब्रेरी में पाया जाता हूं. मुझे आज भी साबित करना पड़ता है कि मुझे अपना काम आता है. इससे मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ है. हमेशा अपटूडेट रहना पड़ता है. यह अच्छी बात है. है कि नहीं?

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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सोशल मीडिया पर लिखने के कारण IIMC से सस्पेंड होने वाले रोहिन वर्मा देश के पहले स्टूडेंट

Dilip Mandal : सोशल मीडिया पर लिखने के कारण अपने इंस्टिट्यूट से सस्पेंड होने वाले रोहिन वर्मा देश के पहले स्टूडेंट हैं। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत काम करने वाले IIMC ने यह क़दम उठाया है। रोहिन अपने कॉलेज के श्रेष्ठ स्टूडेंट रहे हैं। रोहिन पर लिखने का आरोप है। रोहिन ने ऐसा क्या आपत्तिजनक लिख दिया है, वह IIMC को सार्वजनिक करना चाहिए।

प्रचारक ने कहा- लडका ख़तरनाक है। इसे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्यूनिकेशन यानी IIMC से हटाओ। इसे लाइब्रेरी में तो क़तई न घुसने दो। क्यों? क्यों क्या? वह लिखता है। पत्रकार है और लिखता है। The Hoot और News Laundry में छपता है। जहाँ IIMC के सबसे बड़े अफ़सर और कई प्रोफ़ेसर तक अपना लिखा नहीं छपवा सके। नाम रोहिन वर्मा है। मैंने लड़के की टाइम लाइन देखी। ऐसा क्या लिख दिया बंदे ने। ख़ास कुछ नहीं है। यही कुछ संस्थान की बातें। सब संविधान के मौलिक अधिकार के दायरे में। अपनी माँ के साथ सेल्फी। कुछ खान पान की तस्वीरें। कुछ JNU वाले नजीब की अम्मा। एक ही ख़तरनाक चीज़ नज़र आई। सावित्रीबाई फुले। वह पत्र जो सावित्रीबाई ने ज्योतिबा फुले को लिखे थे।

Abhishek Ranjan Singh : रोहिन वर्मा पर भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) प्रशासन ने जो कार्रवाई की है. वह गलत ही नहीं, बल्कि ग़ैर ज़िम्मेदाराना बर्ताव है. उन्हें चाहिए कि तत्काल रोहिन का निलंबन वापस लिया जाए. एक छात्र के लिए इससे अधिक पीड़ादायक कुछ और नहीं हो सकता. आईआईएमसी के मौजूदा एवं पूर्व छात्रों को भी इस घड़ी में रोहिन के साथ खड़ा होना चाहिए. मैं IIMCAA यानी भारतीय जनसंचार संस्थान पूर्व छात्रसंघ की गंभीरता के बारे में कुछ भी कहना व्यर्थ है, क्योंकि छात्रहित के नाम पर गठित यह पूर्व छात्रसंघ नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से एक गैर सरकारी संगठन (NGO) है जो आईआईएमसी का नाम लेकर, आईआईएमसी के भ्रष्ट अधिकारियों की सरपरस्ती में सिर्फ़ और सिर्फ़ आयोजनों के नाम पर सरकारी और निजी कंपनियों से प्रायोजन के नाम पर धन उगाही करता है.

जिस तरह किसी मंदिर और मठ में चंद महंथ होते हैं, उसी तरह यहां भी कुछ स्वयंभू मठाधीश बैठे हैं. यह संगठन सब कुछ करता है, सिवाय छात्र हित के. सवाल चाहे ढाई दशकों से बंद पड़े लड़कों के लिए छात्रावास का हो. या फिर हर साल प्रवेश परीक्षा में बढोतरी की जाने वाली राशि हो या कोर्स फीस की. इन तमाम बुनियादी सवालों से IIMCCAA के हाकिमों को सख्त परहेज़ है. उनके मुताबिक़, ये तमाम सवालात आईआईएमसी के आंतरिक मसले हैं. ज़नाब-ए-आली फिर आप हर रविवार को आईआईएमसी के वातानूकुलित मीटिंग रूम और ऑडिटोरियम किस हैसियत से प्रयोग करते हैं? नियमानुसार आपसे इसका किराया वसूला जाना चाहिए? यह संगठन आईआईएमसी के प्रतीक चिन्ह यानी लोगो का ग़लत इस्तेमाल करता है. यह भी आपत्ति का विषय है, क्योंकि यह संगठन एक तिजारती यानी कारोबारी संगठन है जिसका एक ही उद्देश्य है व्यापार करना और धन जमा करना.

रोहिन वर्मा के पक्ष में इनसे किसी प्रकार की उम्मीद न करें. मेरा एक सुझाव है अगर चाहें तो इस पर अमल कर सकते हैं. रोहिन का निलंबन वापस होना चाहिए. इस बाबत एक छात्रों का शिष्टमंडल संस्थान के महानिदेशक से मिले उनसे वार्ता करे और एक सप्ताह का समय दे निलंबन की वापसी के लिए. अगर उसके बाद भी इस दिशा में संस्थान कोई पहल नहीं करता है, तब उस परिस्थिति में मौजूदा एवं पूर्व छात्रों को विरोध-प्रदर्शन करना चाहिए. क्योंकि यह सवाल सिर्फ रोहिन का नहीं है अगर आज विरोध के स्वर नहीं निकलेंगे, तो कल कोई और छात्र इसका शिकार होगा!

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल और अभिषेक रंजन सिंह की एफबी वॉल से.

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नज़र रखिए, NDTV का ओपिनियन पोल आएगा जिसमें बीजेपी की सरकार यूपी में बनती दिखेगी!

Dilip C Mandal : एनडीटीवी बाक़ी समय सेकुलरिज्म का नाटक करता है, ताकि चुनाव के समय जब वह BJP का समर्थन करे तो लोग उस पर भरोसा करें। 2004, 2009, 2015….NDTV ने हर बार ग़लती की। हर बार BJP के पक्ष में ग़लती की। यूपी चुनाव में NDTV क्या करेगा? यह ट्विट आज भी बरखा दत्त के ट्विटर हैंडल पर मौजूद है। बिहार में BJP को दो तिहाई बहुमत दिला रही थीं मोहतरमा।

नज़र रखिए। फ़िल्म की पूरी स्क्रिप्ट कुछ इस तरह नज़र आ रही है। यूपी चुनाव तक NDTV पूरी आक्रामकता के साथ मुस्लिम पक्षधरता दिखाएगा। दूसरी तरफ़ उतनी ही आक्रामकता से ZEE न्यूज एंड कंपनी हिंदू पक्षधरता से चैनल चलाएगी। दोनों पक्ष मिलकर माहौल को हिंदू-मुसलमान बनाने की कोशिश करेंगे। दोनों ही पक्ष जाति के प्रश्न को इग्नोर करेंगे। जाति ही वो जगह है जहाँ RSS का दम फूलता है। इसलिए दोनों तरह के चैनल वहाँ नहीं जाएँगे। जाति जनगणना या आरक्षण पर कोई बातचीत चैनलों में नहीं होगी। हिंदू और मुसलमान की हर बहस RSS के पक्ष में होती है। वही कराई जाएगी। NDTV मुस्लिम उत्पीड़न के सवाल उठाएगा। जो वाजिब सवाल होंगे। इसी दौरान कभी NDTV का ओपिनियन पोल आएगा जिसमें बीजेपी की सरकार बनती दिखेगी।

एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय और किंगफिशर के मालिक विजय माल्या ने अपने जाम टकरा कर एक TV चैनल खोला था। NDTV Good Times. लगभग 200 करोड़ रुपए माल्या ने लगाए थे। चैनल के लोगों पर किंगफिशर की चिड़िया को याद कीजिए। यह 200 करोड़ उन्हीं 9,000 करोड़ रुपए में से हैं, जिसे दबाकर माल्या देश छोड़कर भाग गया। अब प्रणय रॉय को इस बात से क्यों दिक़्क़त हो कि विजय माल्या बीजेपी के समर्थन से राज्य सभा पहुँचा था? 513 करोड़ रुपए की कंपनी NDTV के लिए 200 करोड़ रुपए बड़ी रक़म है। एंकर्स और बाक़ी स्टाफ की सैलरी शायद इसी से आई होगी।

वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक दिलीप मंडल की एफबी वॉल से. 

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मुझे नहीं लगता NDTV की मोदी सरकार से भिड़ने की हैसियत है

Dilip C Mandal : NDTV आज की तारीख़ में सिर्फ 513 करोड़ रुपए की कंपनी है। उस पर फ़ेमा यानी मनी लॉन्ड्रिंग का 2031 करोड़ रुपए का और टैक्स अदायगी से संबंधित 450 करोड़ रुपए के मामले है। सरकार जिस पल चाहेगी, ऑक्सीजन रोक देगी। लेकिन जेटली जी के होते NDTV का ऑक्सीजन रुकना मुमकिन नहीं लगता। मुझे नहीं लगता NDTV की सरकार से भिड़ने की हैसियत है। NDTV के मालिक प्रणय राय एक्सप्रेस वाले रामनाथ गोयनका नहीं हैं कि घर फूँककर भिड़ जाएँ। जो दिख रहा है, हो सकता है कि हक़ीक़त वह न हो।

NDTV पर बैन दो ही तरीक़े से हट सकता है। सरकार इसे वापस ले या फिर सुप्रीम कोर्ट बैन हटाए। कोई तीसरा रास्ता नहीं है। मुझे उम्मीद है कि सोमवार की सुबह NDTV के मालिक प्रणय राय अदालत जाएँगे। जाने को तो वे रविवार को भी जा सकते हैं। लोकमहत्व के मामलों में कोर्ट छुट्टी के दिन भी सुनवाई करती है। मार्कंडेय काटजू समेत देश के कई बड़े कानूनविद कह रहे हैं कि NDTV को अदालत में जाना चाहिए। वे ठीक कह रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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भारतीय न्यूज चैनलों को बुद्धू बना लाखों कमा गया पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर!

Dilip C Mandal : पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर ने ट्विट किया कि रात 10.20 बजे इस्लामाबाद के ऊपर F16 प्लेन उड़ रहे हैं। कई भारतीय चैनलों ने उनसे फ़ोन पर बात की। हामिद मीर फ़ोन पर बात करने की जो फ़ीस लेते हैं, उसके आधार पर मेरा अंदाज़ा है कि उन्होंने दो घंटे के अंदर डेढ़ लाख रुपए से ज़्यादा कमा लिए…युद्ध हर किसी के लिए बुरी चीज़ नहीं है। वैसे किसी भारतीय एंकर ने उनसे यह नहीं पूछा कि रात में उन्हें यह कैसे पता चला कि जो प्लेन उड़ रहा है वह F16 ही है!

मीर बुद्धु बनाकर चला गया अपने डॉलर गिनने। एक ट्विट से डेढ़ लाख रुपए और यह तो शुरुआत है। वह अभी कई एक्सक्लूसिव बेचेगा। देखते रहिए…मीर पर नज़र रखिए। बंदा कमाल का है। टीवी न्यूज इंडस्ट्री में अपने आठ साल के अनुभव के आधार पर यह लिख रहा हूँ। फिर मत बोलिएगा कि बताया नहीं। हामिद मीर पर नज़र रखिए।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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सारे चैनल, बड़े अखबार और मैग्जीन ब्राह्मणवादी सवर्णों के नियंत्रण में हैं, कोई अपवाद नहीं है

Dilip C Mandal : आप लोग मेरे स्टेटस को Like करना बंद कीजिए प्लीज. अपना लिखिए. जैसा बन पड़े, वैसा लिखिए. लिखना क्राफ्ट है. करने से हाथ सध जाता है. फोटो और वीडियो लगाइए. यहां संघियों को अपना टाइम लगाने दीजिए. देश को लाखों बहुजन फुले-आंबेडकरवादी लेखक और कम्युनिकेटर चाहिए. भारत के सारे चैनल और बड़े अखबार और मैगजीन ब्राह्मणवादी सवर्णों के नियंत्रण में हैं. कोई अपवाद नहीं है. वहां कुछ लोग सहानुभूति का नाटक कर रहे हैं. पर वे दूसरों की तरफ से ही खेल रहे हैं. निर्णायक क्षणों में वे आपके साथ नहीं होंगे. भारतीय मीडिया को लोकतांत्रिक बनाने के लिए आपका लेखक बनना जरूरी है. आपके लाइक्स का मैं क्या करूंगा? लिखिए.

फेसबुक समेत सोशल मीडिया में RSS की दादागीरी टूट चली है. सोशल मीडिया के लाखों लोकतांत्रिक बहुजनों, SC, ST, OBC, माइनॉरिटी, उदार – प्रगतिशील सवर्ण लेखकों और लेखिकाओं ने संघ के इस किले को भेद दिया है. इंटरनेट पर एकचटिया संघी गुंडागर्दी का जमाना गया. संघ को अब उसी की भाषा में जवाब मिल रहा है. कोई रियायत नहीं. जैसा हमला, उसी जोड़ का जवाब. क्रिया के बराबर और कई बार ज्यादा प्रतिक्रिया. संघी गाली गलौज का भी मुकम्मल जवाब लोग दे रहे हैं. बहुजनों के पास संघ की तरह कॉल सेंटर और पेड वर्कर नहीं हैं. पर संख्या बल है, तर्क है, न्याय और इंसानियत की ताकत है.

सोशल मीडिया में पहली बाजी RSS के हाथ लगी थी. लोकसभा चुनाव में. संघ जीता, क्योंकि मुकाबला कांग्रेस से था, जिसने कॉल सेंटर का जवाब कॉल सेंटर से देने की कोशिश की. लेकिन संघ के पास कॉल सेंटर के अलावा भक्त भी थे. बीजेपी के हिंदु बनाम मुस्लिम खेल में कांग्रेस का सोशल मीडिया छटपटा कर रह गया. उस समय के खेल में बहुजन शामिल नहीं सके थे. बाजी पलटने की शुरुआत बिहार से हुई. बहुजनों ने पहली बार अपना दम दिखाया. संसाधन संघ के पास थे, पर सोशल मीडिया के मैदान में उसे पसीने छूट गए. आरजेडी के सोशल मीडिया प्रबंधक SanJay Yadav की कोई काट बीजेपी के पास नहीं थी. देश भर के बहुजन लेखकों ने मिलकर बाजी पलट दी. और अभी तो खेल शुरू हुआ है….सारे संघी सोशल मीडिया पर हैं. वहीं बहुजनों का बड़ा हिस्सा तो अभी स्मार्ट फोन खरीदने की तैयारी कर रहा है. देखते जाओ.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

दिलीप मंडल के लिखे कुछ हालिया पोस्ट्स पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें>

प्रधान संपादक शशिशेखर चतुर्वेदी जी, आपका रिपोर्टर दरअसल निकम्मा और मुफ्तखोर है

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मोदीजी, नागपुर में बैठे पेशवा लोग बहुत डेंजरस हैं, उन्होंने चुनाव न जिता पाने पर आडवाणी जी को नहीं छोड़ा

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मोदीजी, नागपुर में बैठे पेशवा लोग बहुत डेंजरस हैं, उन्होंने चुनाव न जिता पाने पर आडवाणी जी को नहीं छोड़ा

Dilip C Mandal :  नरेंद्र मोदी साहेब, ये यूपी है यूपी. उत्तर के पेरियार ललई सिंह यादव की मिट्टी है. मान्यवर कांशीराम की प्रमुख कर्मभूमि. महामना रामस्वरूप वर्मा और चौधरी चरण सिंह का सूबा. वैसे तो यह कबीर और रैदास की भी जन्मभूमि है. इधर 2017 में भी आपके लिए ठीक नहीं है. यहां का मूड आज आप देख ही चुके हैं. वैसे, मुझे नहीं मालूम कि यूपी से पहले के जब आप सारे विधानसभा चुनाव हार चुके होंगे, तो RSS केंद्र में नेतृत्व परिवर्तन कर चुका होगा या नहीं. नागपुर में बैठे पेशवा लोग बहुत डेंजरस हैं. उन्होंने चुनाव न जिता पाने पर आडवाणी जी को नहीं छोड़ा, तो आप क्या चीज हैं.

मनुस्मृति ईरानी ने मूर्खतापूर्ण तरीके से जब देश भर के हजारों छात्रों की फेलोशिप रोकी थी, तभी नरेंद्र मोदी को उनसे छुटकारा पा लेना था. इसकी वजह से देश भर के हर जाति, धर्म, बिरादरी के छात्र मनुस्मृति ईरानी से खफा बैठे थे. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या ने एक चिंगारी लगा दी. वैसे भी यह इंसानियत का मामला था. एक चिंगारी पूरे जंगल में आग लगा सकती है. इससे पहले ईरानी अंबेडकर – पेरियार स्टडी सर्किल पर रोक लगाकर बदनाम हो चुकी थीं. छात्र तमाम तरह से नाराज थे. IIT रुड़की में बहुजन छात्रों को निकाले जाने का कांड हो चुका था. रोहित की हत्या के बाद देश भर के कैंपस उबल पड़े. आज यह नौबत आ गई कि मोदी सड़कों पर काला झंडा देख रहे हैं. मुर्दाबाद के नारे सुन रहे हैं…. महंगा पड़ेगा.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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प्रधान संपादक शशिशेखर चतुर्वेदी जी, आपका रिपोर्टर दरअसल निकम्मा और मुफ्तखोर है

Dilip C Mandal : शशिशेखर चतुर्वेदी जी, आप दैनिक हिंदुस्तान अखबार के प्रधान संपादक हैं. आपके अखबार में यह खबर छपी है कि रोहित वेमुला से जुड़े दस्तावेज आंदोलनकारी बेच रहे हैं. एजेंसी की इस खबर को आपके संपादकों ने छापा है. BHU के प्रोफेसर Chauthi Ram Yadav ने इस ओर ध्यान दिलाया.

आप खबर देखिए. एक रिपोर्टर हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी जाता है. उसे रोहित से संबंधित दस्तावेज चाहिए. उससे 70 पेज की फोटोकॉपी के 70 रुपये लिए जाते हैं. रिपोर्टर की आदत दक्षिणा लेने की रही होगी. मुफ्तखोरी संस्कार में रही होगी. फोटोकॉपी के पैसे लेने पर नाराज होकर खबर लिख दी और आपने मजे लेकर छाप दी. मुफ्त में क्यों चाहिए दस्तावेज?

रोहित से जुड़ा हर डॉक्यूमेंट सोशल मीडिया पर है. ऐसा कौन सा खुफिया दस्तावेज है जो रिपोर्टर खरीद रहा है? और फिर उस कीमती दस्तावेज के आधार पर उसने खबर क्यों नहीं लिखी? रिपोर्टर दरअसल निकम्मा और मुफ्तखोर है. उसे इकट्ठा 70 पेज मुफ्त में चाहिए. रिपोर्टर 70 पेज लेकर गया, और पांच लाइन की खबर लिखी कि 70 रुपये खर्च हो गए. आपको क्या लगता है कि सोशल मीडिया के जागरूक जमाने में यह खेल चल जायेगा? Kuffir Nalgundwar ने सही किताब निकाली है. मीडिया की अंतड़ियों तक में जातिवाद समाया हुआ है. Hatred in the belly. तस्वीर में उसी किताब को पढ़ता रोहित.

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डॉ. बी. आर. आंबेडकर पर चार लाख पुस्तिकाएं छाप कर फंस गई गुजरात की भाजपा सरकार

Dilip C Mandal : गुजरात सरकार के सामने एक अजीब मुसीबत आ गई है. चार लाख की मुसीबत. वजन के हिसाब से, कई क्विंटल मुसीबत. गुजरात सरकार के शिक्षा विभाग ने आंबेडकर सालगिरह समारोह पर एक Quiz कराने का फैसला किया. पांचवीं से आठवीं क्लास के बच्चों के लिए. इसके सवाल एक बुकलेट से आने थे. बुकलेट छपी गई. चार लाख कॉपी. इन्हें स्कूलों में बांटा जाना तय हुआ.

बुकलेट का नाम है- राष्ट्रीय महापुरुष भारत रत्न डॉ. बी. आर. आंबेडकर. लेखक हैं पी. ए. परमार. किताब सूर्या प्रकाशन ने छापी. यहां तक दलित हितैषी बनने का एजेंडा सब ठीक चल रहा था. संघी तो पढ़ते नहीं हैं. छपते समय तक किसी ने देखा नहीं, या कुछ समझ नहीं आया. छपने के बाद, किसी की नजर पुस्तिका पर पड़ी. देखते ही तन – बदन में आग लग गई. किताब के आखिर में बाबा साहेब की 22 प्रतिज्ञाएं छपी थीं. ये वे प्रतिज्ञाएं हैं, जो बाबा साहेब ने 1956 में हिंदू धर्म त्याग कर, बौद्ध धम्म ग्रहण करते समय लाखों लोगों के साथ ली थीं.

पहली प्रतिज्ञा – मैं ब्रह्मा, विष्ण विष्णु और महेश में आस्था नहीं रखूंगा और न ही इनकी पूजा करूंगा…. (सभी 22 प्रतिज्ञा आप लोग गूगल में सर्च करके पढ़ लें.)

सरकार ने आनन फानन में सारी पुस्तिकाओं को समेट लिया…. और इस तरह बीजेपी का दलित हितैषी बनने का एक और प्रोजेक्ट फेल हो गया…. यहां तक की खबर तो आप कुछ अखबारों में पढ़ चुके हैं. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. अब दिक्कत यह है कि उन चार लाख पुस्तिकाओं का क्या किया जाए? फेंकना सही नहीं है. जलाने से भी हल्ला मचेगा. पानी में बहाने में भी वही दिक्कत है. रद्दी में बेचने से लोगों तक पहुंच जाएंगी…. आप समझ सकते हैं कि यह कितनी बड़ी समस्या है! बड़ी ही नहीं, भारी भरकम समस्या है. कई क्विंटल की समस्या. आप लोग प्लीज हंसिए मत, और बीजेपी सरकार को इस मुसीबत से निकलने का कोई रास्ता बताइए. बेचारे!

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दैनिक भास्कर ने आग लगाने का पूरा इंतज़ाम किया, लेकिन दादरी इस देश का अपवाद है, दौसा मुख्यधारा है

Dilip C Mandal : भारत में पत्रकारिता, किसी अबोध बच्चे के, हाथों की, जूजी है। (कवि धूमिल से प्रेरित, संग्रह- संसद से सड़क तक) । दैनिक भास्कर ने 17 दिसंबर की डेटलाइन से एक फड़कती हुई, सनसनीख़ेज़ खबर छापी। राजस्थान के दौसा शहर में एक घर की छत पर पाकिस्तानी झंडा। पत्रकार ने इस बारे में पुलिस कप्तान को बताया तो उन्होंने कह दिया गंभीर मामला है। बस बन गई खबर। अब आप तस्वीर देखिए। इस इस्लामी धार्मिक झंडे को देश में कौन नहीं जानता? हर धार्मिक मौक़े पर दुनिया भर के मुसलमान इसे घरों और धार्मिक स्थलों पर लगाते हैं। किसी को कभी दिक़्क़त नहीं हुई।

लेकिन पत्रकार नाम का अबोध बच्चा उत्तेजित हो गया। पत्रकार अगर अबोध बच्चा है, तो घर के मालिक से पूछ सकता था। चाहता तो मोबाइल से फोटो खींचकर पुलिस को दिखा सकता था। Google पर पाकिस्तानी झंडे की तस्वीर से मिला कर देख सकता था। लेकिन इतनी मशक़्क़त कौन करे? अपनी अक़्ल के हिसाब से पत्रकार तो सर्वज्ञानी होता है। यही उसकी ट्रेनिंग है। रिपोर्टर ने खबर दी, डेस्क ने ले ली और संपादक ने छाप दी। किसी को कुछ भी नहीं खटका।

भोलापन कहिए या शरारत कि खबर के साथ मोहल्ले का नाम और घर के मालिक का नाम भी छाप दिया। यानी अपनी तरफ़ से आग लगाने का पूरा इंतज़ाम। लेकिन ख़ैरियत है कि दादरी इस देश का अपवाद है और दौसा मुख्यधारा है। इस खबर के बावजूद शहर में अमन चैन है और यह खबर स्टेटस लिखे जाते समय भी भास्कर की वेब साइट पर मौजूद है। 1990 के दौर में ऐसी आग लगाऊ खबरों की वजह से दंगे हो जाते थे और लोग मारे जाते थे। संपादकों ने उस दौर में खूब ख़ून बहाया।

Facebook समेत सोशल मीडिया ने इस मामले में पत्रकारों की दंगाई ताक़त को अब कम कर दिया है। दौसा को लेकर भी सोशल मीडिया ने शानदार भूमिका निभाई। बधाई। अबोध पत्रकारों और बाल संपादकों के लिए मैं नई दिल्ली के पाकिस्तानी हाई कमीशन में लगा पाकिस्तान का झंडा लगा रहा हूँ। देख लो, ऐसा होता है। पेशे की संवेदनशीलता को देखते हुए आवश्यक हो गया है कि हर संपादक और पत्रकार अपने जीवन में कम से कम एक बार ही सही, लेकिन प्रेस कौंसिल की उस गाइडलाइन को पढ़े, जो सांप्रदायिकता से जुड़ी खबरों के बारे में जारी की गई है और प्रेस कौंसिल की वेब साइट पर मौजूद है।

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भास्कर की झूठी खबर से दंगा होते-होते बचा, सोशल मीडिया पर कल्पेश याज्ञनिक की थू-थू

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सोशल मीडिया पर साइबर गुंडागर्दी से बचने का एक ही तरीका है…

Dilip C Mandal : सोशल मीडिया पर साइबर गुंडागर्दी से बचने का एक ही तरीका है कि आप बचने की कोशिश न करें। आप बच जाएँगे।

1. दी जा रही गालियों से न डरें। दी जा रही गालियाँ आपका नहीं, गाली लिखने वालों का परिचय है। मैं तो अक्सर गालियों को डिलीट भी नहीं करता।

2. अगर गालियाँ न दी जा रही हों, तो आपके लिए यह चिंतित होने का समय है। क्या आप ऐसा कुछ भी नहीं कर रहे हैं कि न्याय और लोकतंत्र के विरोधी आपको गालियां दें? यह तो बुरी बात है। कुछ तो ऐसा कीजिए कि बुरे लोग आपसे नाराज हों।

3. अगर आपके जीवन में ऐसा बहुत कुछ है, जिसे आप छिपाना चाहते हैं और जिनके खुल जाने से आपको दिक्कत हो सकती है, तो सोशल मीडिया आपके लिए नहीं है। आप लिमिटेड फ़्रेंड लिस्ट से काम चलाएँ और कमेंट ऑप्शन सिर्फ फ़्रेंड के लिए रखें। या फिर आप अखबार में लेख लिखें या टीवी पर विश्लेषक गेस्ट बनकर पेश हों।

4. इसमें किसी की तो जीत होनी है। आपका पीछे हटना उनकी जीत है।

5. गालियों से डरकर पीछे हटने का मतलब है कि आप जो लिख रहे थे वह आपके लिए फ़ैशन था। आपको खुद से पूछना चाहिए कि आपकी इज़्ज़त बडी है या आपके विचार।

आप बताएँ कि आपकी क्या राय है।

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‘लोकमत’ अखबार के मालिक विजय दर्डा ने आरक्षण के खिलाफ पहले पन्ने पर जहरीला लेख लिखा

Dilip C Mandal :  महाराष्ट्र के लोकतांत्रिक, न्यायप्रिय और समतावादी लोगों का अभिनंदन! शानदार, ज़बरदस्त, ज़िंदाबाद। देश को फुले, सावित्रीबाई, शाहू, बाबासाहेब जैसे महापुरुष देने वाले प्रदेश ने देश को एक बार फिर रास्ता दिखाया है और इसकी गूँज देश के अलग अलग हिस्सों में सुनाई देगी, तो इस बात को याद किया जाएगा कि नींव का पत्थर महाराष्ट्र के लोगों ने रखा था। लोकमत, महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा बिकने वाला समाचारपत्र है और ज़ाहिर है कि समाज के तमाम समूहों के लोग उसे खरीदते हैं।

इसके बावजूद अखबार के संपादक ने अपने बहुसंख्यक पाठकों के न्यायपूर्ण हित के खिलाफ जाते हुए आरक्षण के खिलाफ पहले पन्ने पर एक ज़हरीला लेख लिखा, जिससे समाज में कड़वाहट फैलने की आशंका थी। इस वजह से राज्य में, खासकर नागपुर में हजारों लोग शांतिपूर्ण तरीके से सड़कों पर निकल आए और अखबार के इस अलोकतांत्रिक व्यवहार का ज़ाहिर निषेध किया। अखबार को जलाया गया और लोगों ने ग्राहकी बंद करा दी। यह संख्या इतनी बडी थी कि अगले ही दिन अखबार घुटनों के बल आ गया और पहले पेज पर छापा कि वह आरक्षण के खिलाफ नहीं है। साथ ही यह भी कहा कि उसने आज तक कभी भी आरक्षण का विरोध नहीं किया। 🙂 झूठ कहा। लेकिन जाने दीजिए। अस्तु, बधाई।

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एक पूर्व संपादक ने फैलाया झूठ!

आपके पीसी का विंडो करप्ट हो जाए तो अब आप कह सकते हैं कि यह आपके उस रिसर्च की वजह से हुआ जो आप ब्राम्हणवाद और केन्द्र सरकार के विरोध में कर रहे थे। आपके विंडो के करप्ट होने में सवर्णवादी साजिश है। दिलीप सी मंडल फेसबुक प्रकरण के बाद मुझे संदेह है कि इस तरह की बात कोई करे तो उसकी बात को सिरे से नकार दिया जाएगा। इस तरह के बिना सिर पैर की बात पर भी सहमति में सिर डुलाने वाले भक्तों की बड़ी संख्या है फेसबुक पर। मेरी आपत्ति इस तरह का झूठ फैलाने वालों से कम है क्योंकि उनके पास कथित तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी है, आप जो चाहें लिखें लेकिन तमाम कथित समाजवादी से लेकर कथित सवर्ण-विरोधी मानसिकता रखने वाले लोग बिना तथ्यों की जांच पड़ताल किए जब इस झूठ को प्रचारित करने के औजार बनते हैं तो दुख होता है।  दिलीप सी मंडल के फेसबुक प्रोफाइल को लेकर जो भ्रामक प्रचार पिछले कुछ समय से लगातार किया जा रहा था, उसे लेकर यह पोस्ट सिर्फ इसलिए लिख रहा हूं ताकि सनद रहे।

विनीता गौतम नाम की महिला की फेसबुक आईडी उसी दौरान ब्लॉक हुई थी, जब दिलीप के फेसबुक आई डी की खबर आई थी।  विनीता ने लिखा – ‘कोई बात नहीं आईडी प्रूव सबमिट कर दिया है। अब रिपोर्ट से काम नहीं चलेगा। मैं ना पहले फेक थी ना बन पाऊंगी।’

वैसे दिलीप चन्द्र मंडल जिस समाज के कथित वकील बनकर लिखते पढ़ते हैं, उनके मदद का वक्त आता है तो अपना फेसबुक प्रोफाईल हाइड करके दिलीप मंडल की जगह दिलीप चन्द्र मंडल के नए अवतार में आ जाते हैं। समाज को नौकरी और आन्दोलन का फर्क भी गाहे बगाहे समझाते हैं। यह भी समझाते हैं कि इंडिया टूडे अलग माध्यम है और फेसबुक अलग माध्यम है। यही वजह रही होगी कि ‘आउट लुक’ बिना किसी दिलीप सी मंडल के भी बाबा साहब को कवर पर छाप देता है और दिलीप सी मंडल, ‘दिलीप सी मंडल’ होकर भी ‘पांडेयजी’ और ‘मिश्राजी’ के साथ इंडिया टूडे में अपने संपादक की नौकरी बजाने में व्यस्त रहते हैं। वे भूल जाते हैं, वंचितों को अवसर देने की बात।

यह बताना जरूरी है कि दिलीप सी मंडल, दिलीप मंडल वाली आईडी का विसर्जन अपने पुराने फेसबुक प्रोफाइल के साथ कर आए थे। नया ई मेल जिससे उन्होंने फेसबुक के कम्युनिकेशन के चीफ कारसन डाल्टन से कम्युनिकेशन किया, उसमें उनका नाम ‘मंडल’ नहीं बल्कि ‘मॉन्डल’ है। हाल में ही दिलीप के एक फर्जी प्रोफाइल की भी चर्चा हुई। जिसकी जानकारी दिलीप के ही एक फेसबुक स्टेटस से मिलती है। जिसमें वे इस तरह का फर्जी प्रोफाइल बनाने वालों को धमकाते हुए कहते हैं कि उनके पास साइबर एक्सपर्ट की टीम है और वे फर्जीवाड़ा करने वालों को देख लेंगे। दुख की बात यह है कि दिलीप ने अपने फेसबुक प्रोफाइल बंद होने के मामले में उस एक्सपर्ट टीम से ना जाने क्यों बात नहीं की और समाज में मिथ्या आरोपों को हवा लगने दी और एक झूठ फैलने दिया कि सरकार के इशारे पर उनके प्रोफाइल को बंद किया गया है।

मिस्टर कारसन का एक मेल दिलीप सी मंडल ने अपने फेसबुक वॉल पर शेयर किया है। जिसमें एक शब्द लिखा गया है और जवाब में दिलीप का लम्बा जवाब है। जिसका जवाब दूसरी तरफ से देना उचित नहीं समझा गया है। यहां कारसन से एक मित्र की बातचीत को शेयर कर रहा हूं। पढ़िए ध्यान से। इतना ही नहीं फोन पर फेसबुक की तरफ से एक प्रतिनिधि वर्निका गुप्ता ने मित्र से बातचीत की। बातचीत की रिकॉर्डिंग भी इन पंक्तियों के लेखक के पास है। जिसमें गुप्ता ने स्पष्ट किया है कि जो भी हुआ वह तकनीकी एरर की वजह से हुआ। अब दिलीप कारसन के मेल में लिखे एक शब्द ‘वेरिफायड’ की जैसी चाहें व्याख्या करें। लेकिन यह फेसबुक है, यहां कोई झूठ लम्बे समय तक नहीं टिक सकता।

आशीष कुमार ‘अंशु’
Ungal Baz
Contact: +919868419453

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प्रेम से बोलिए, एंटी करप्शन मूवमेंट स्वाहा….

Dilip C Mandal : प्रेम से बोलिए, एंटी करप्शन मूवमेंट स्वाहा ….  अब ऊपर मोदी और नीचे केजरीवाल हैं और इस समय भारतीय जेलों में कौन कौन से भ्रष्टाचारी बंद हैं, आप बताएं. रॉबर्ट वाड्रा या शीला दीक्षित या कोई उद्योगपति या कोई बड़ा अफसर? कौन है जेल में? वहीं, मनमोहन ने राज चाहे जैसा चलाया, लेकिन उनके समय में जो करप्शन में जेल गए, उनमें कुछ नाम ये हैं:

सुरेश कलमाडी
ए राजा
कनिमोई
ललित भनोट
ए. के. मट्टू
सार्थक बेहूरिया
आर के चंडोलिया
संजय चंद्रा
गौतम दोशी
हरि नायर
विनोद गोयनका
शाहिद बलवा
करीम मोरानी
रशीद मसूद….

और राज्यों के मामलों में जेल जाने वालों का हिसाब इसमें नहीं है. म तलब कि केंद्र में कैंबिनेट मंत्री से लेकर सेक्रेटरी लेबल के अफसर और सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी की नेता से लेकर यूनिटेक जैसी उस समय की भारी कंपनी के मालिक तक जेल गए. बिना लोकपाल के प्रपंच के ही जेल गए. कानून ने जेल भेजा. इन दोनों के नकारेपन में, मनमोहन जैसा करप्शन का सरताज भी संत दिखने लगा है. मनमोहन के समय जेल जाने का डर तो होता था. आज है क्या?

– केंद्रीय मंत्री तिहाड़ में
– देश के सबसे बड़े खेल प्रशासक और सत्ताधारी पार्टी के सांसद जेल गए
– देश की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनी में से एक के मालिक तिहाड़ में
– शीर्ष नौकरशाह जेल में.
– सत्ता पक्ष की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी की नेता जेल में
– देश की सबसे बड़ी फाइनैंस कंपनी में से एक के मुखिया तिहाड़ में

तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सफलता के बाद और ऊपर मोदी और नीचे केजरीवाल के आने के बाद अब तो ऐसी कोई हेडलाइंस यानी शीर्षक नहीं सुनते आप? इसका दो ही मतलब है:

1. या तो देश से भ्रष्टाचार खत्म हो चुका है और पिछली सरकार का भी कोई भ्रष्टाचार पेंडिंग नहीं है.
2. नई सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने में पिछली सरकार से भी ज्यादा निकम्मी और निठल्ली है या फिर करप्शन में उसके हाथ भी सने हुए हैं.

ऊपर मोदी है,
नीचे केजरीवाल है.
कोई भ्रष्ट अब जेल नहीं जा रहा है.
भ्रष्टाचार मुक्त जंबूद्वीप में जनता प्रसन्न है.
भ्रष्ट नेता-अफसर-उद्योगपति बोरिया विस्तर बांधकर देश से प्रस्थान कर चुके हैं.
जिन्होंने कांग्रेस राज में करप्शन किया था, वे सारा भ्रष्ट धन रिजर्व बैंक में जमा कर चुके हैं.

यह सुनकर देवताओं ने आसमान से पुष्प वर्षा की.
और इस तरह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कथा सपन्न होती है. जनता को प्रसाद नहीं मिलेगा.

आनंदमठ का अंत और एंटी करप्शन मूवमेंट का स्वाहा होना

ऐसा तो शायद ही कोई होगा, जिसने बंकिमचंद्र की “आनंदमठ” न पढ़ी हो. वही किताब, जहां से वंदे मातरम गीत लिया गया है. जिन्होंने यह किताब नहीं पढ़ी है, उनकी देशभक्ति यूं भी “संदिग्ध” है.

मोदी और केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में विश्वास करने वालों की दशा इस समय वही हो गई है, जो आनंदमठ के आखिरी पन्नों मे स्वामी सत्यानंद की हो जाती है. बहुत रोते हैं स्वामी सत्यानंद.

सत्यानंद ने संतान दल ज्वाइन किया था भारत को आजाद करने के लिए. और उसके गुरु ऩे आंदोलन यह कहकर बंद कर दिया कि मुसलमान शासकों के हटने और अंगरेजों के आने के साथ ही उनका काम खत्म हो गया है. “तुम्हारा कार्य सिद्ध हो चुका. मुस्लिम राज का ध्वंस हो चुका”….. “अंगरेजों का राज तुम्ही लोग द्वारा स्थापित समझो”…”शत्रु अब कोई नहीं. अंगरेज हमारे मित्र हैं.” फिर वे समझाते हैं कि “अंगरेजों के राजा हुए बिना सनातम धर्म का उद्धार न हो सकेगा.”

इसके बाद सत्यानंद खूब रोए.

छोड़िए भी.
मैं क्यों यह सब बता रहा हूं. आपमें से कौन होगा जिसने यह महान राष्ट्रवादी रचना नहीं पढ़ी होगी. आप में से ज्यादातर लोगों के घर में भी होगी. और आप लोगों ने डाउनलोड करके भी पढ़ी होगी. आखिर के दो-तीन पन्ने तो आपको याद होंगे.

आएंगे यूपी-बिहार लूटने.
क्योंकि केंद्र और दिल्ली का काम हो चुका है.

योगेंद्र और आनंद कुमार से सहानुभूति रखिए. लेकिन इन पर भरोसा मत कीजिए. ये टोली अभी आपको और बेचने वाली है.

आखिरी बार बोल रहा हूं. मेरी बात को कहीं पर्ची बनाकर रख लीजिए और एक बार फिर ठगे जाने के बाद जब रोने का मन करे, तो उसे बार-बार पढ़िएगा.

लोकपाल आंदोलन स्वाहा

एडमिरल रामदास को देश के सबसे ईमानदार लोगों ने अपना लोकपाल चुना था. हटाना पड़ा.

इस तरह सिद्ध हुआ कि देश के सबसे ईमानदार और 24 कैरेट के खांटी लोग मिलकर अपने लिए भी एक सही लोकपाल नहीं चुन सकते.

कोई शक?

जब करोड़ों लोग टीवी पर अऩ्ना आंदोलन को देख रहे थे तब कवि कुमार विश्वास ने रामलीला ग्राउंड के मंच से हुंकार भरी थी- “जिन्हें भैंस चरानी थी, वे राज चलाते हैं.”

अब इतनी पुरानी बात भी नहीं है कि आपको याद न हो. LIVE टेलीकॉस्ट हुआ था. और इस पर काफी विवाद भी.

अन्ना और केजरीवाल की तो छोड़िए, योगेंद्र की भी इस पर कोई राय नहीं थी. निंदा करने की बात तो रहने ही दीजिए. कवि कुमार विश्वास ने मंच से जातिवाद कर दिया और योगेंद्र जातिवाद का विरोध नहीं कर पाए.

जन्म का संयोग ही सब कुछ नहीं होता. कर्म भी देख लेना चाहिए.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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हिंदी टीवी न्यूज के मसखरेपन के लिए क्या वाकई उदय शंकर, रजत शर्मा और कमर वहीद नकवी जिम्मेदार हैं?

Nadim S. Akhter : दो बातें कहनी हैं. एक तो दिलीप मंडल जी ने हिंदी टीवी न्यूज के -मसखरेपन- के लिए उदयशंकरजी, रजत शर्मा जी और कमर वहीद नकवी जी को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार ठहराया है. उनके मन की बात पढ़कर उसका लम्बा-चौड़ा जवाब लिख मारा, लेकिन फिर पुरानी गलती दोहरा गया. सब कुछ ऑनलाइन फेसबुक वॉल पे ही लिख रहा था. अचानक से मेरा कम्प्यूटर बंद हुआ और सब गायब. फिर दुबारा लिखने का मूड सुबह से अब तक नहीं बना. सो हिंदी टीवी न्यूज की गंभीरता को खत्म करने वाली दिलीप जी की बात पर मेरा जवाब फिर कभी.

 

दूसरी बात. टाइम्स नाऊ के न्यूज आवर डिबेट में अर्नब गोस्वामी ने बहस के लिए जिस विषय को चुना, उस पर कुछ बोलना चाहता था, सुबह-सुबह. काम में उलझ गया और फिर लिख नहीं पाया. अभी देखता हूं कि कुछ वेबसाइट्स पर इससे सम्बंधी टिप्पणी प्रकाशित हुई है. मेरे एक मित्र ने तो ये तक कहा है (जाहिर है नीचे मेरी वॉल पे) कि मैं अर्नब का फैन हूं. तो मित्रों ! बात यहां अर्नब के फैन या एसी होने का नहीं है. अगर वे गलत करेंगे (मेरी-आपकी समझ के अनुसार) तो निंदा के भी पात्र होंगे. जैसे कल अर्नब ने अपने डिबेट में भारत की हार का जो विषय चुना, वह पूरी तरह हास्यास्पद था. पहली बार मैंने देखा कि अर्नब के पास बोलने के लिए कुछ नहीं था. वो गालथेथरी कर रहे थे और स्टूडियो में बैठे पैनालिस्ट, अरबाज खान व अतुल वासन, जमकर अर्नब का विरोध कर रहे थे. अर्नब कह रहे थे कि फलां बॉलर को पहले क्यों नहीं लाया, टीम के पास कोई स्ट्रैटेजी नहीं थी, यह शर्मनाक हार थी,..वगैरह-वगैरह.

लेकिन अर्नब क्या बताएंगे कि धोनी के पास कोई स्ट्रैटेजी थी या नहीं थी, ये उन्हें मुंबई के स्टूडियो मैं बैठकर कैसे पता?? और फील्ड में जब कप्तान कोई डिसीजन लेता है, किसी बैॉलर-फील्डर को लगाता है तो उस वक्त उसके दिमाग में एक स्ट्रैटेजी चल रही होती है, उसी के तहत ये सब होता है ना. तो अगर इसी स्ट्रैटेजी के तहत अगर कल टीम इंडिया जीत जाती तब तो अर्नब गोस्वामी और पूरा मीडिया धोनी की तारीफों के पुल बांध देते. और जब हार गए तो पचास इल्जाम. कुल मिलाकर कहूं तो टाइम्स नाऊ के इतिहास में कल पहली बार मुझे अर्नब गोस्वामी और बहस के लिए उनके चुने गए विषय पर तरस आया. कई बार तो अर्नब बगलें झांकते भी नजर आए और एक बार तो वो अपनी बगल में बैठे बहस करते अरबाज खान का हाथ तक पकड़ने लगे. कल तो अर्नब ने हद ही कर दी. ज्यादातर मौकों पर गंभीर विषय चुनने वाले अर्नब गोस्वामी को ये सब करते देख कल अच्छा नहीं लगा.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर ने उपरोक्त पोस्ट दिलीप मंडल के इस स्टेटस के जवाब में लिखा है….

Dilip C Mandal : अरनब गोस्वामी ने अगर इंग्लिश TV न्यूज की हत्या की, जैसा कि Outlook वाले कहते हैं, तो हिंदी TV न्यूज चैनलों की उससे भी बुरी मौत के लिए कौन जिम्मेदार है? या फिर यह आत्महत्या का मामला है, जिसके लिए कोई दोषी नहीं है. आखिर किन की लीडरशिप में हिंदी TV न्यूज चैनलों ने मसखरा-युग में प्रवेश किया? जोकर क्यों बन गए पत्रकार… नागिन ने नाग की हत्या का बदला क्यों लिया… TV न्यूज को पीपली लाइव किसने बनाया? हिंदी NEWS चैनलों का डायन-तांत्रिक-मसखरा युग और उसके नायक या खलनायक…  न्यूज का एंटरटेनमेंट हो जाना ग्लोबल मामला है, लेकिन हिंदी न्यूज चैनलों में यह कुछ ज्यादा ही भोंडे तरीके से हुआ. न्यूज बुलेटिन में नागिन ने नाग की हत्या का बदला लिया, स्वर्ग को सीढ़ी तन गई, सबसे महंगी वैश्या की ऑन स्क्रीन खोज हुआ, बिना ड्राइवर के कार चली. मत पूछिए कि क्या क्या न हुआ. और जब ढलान पर चल ही पड़े तो फिर कितना गिरे और किस गटर में गिरे, इसकी किसे परवाह रही.

हिंदी न्यूज चैनलों को पीपली लाइव और हिदी के टीवी पत्रकारों को जोकर बनाने वाले दौर के तीन लीडर हैं. ये तीन नाम हैं – उदय शंकर, क़मर वहीद नकवी और रजत शर्मा. इस दौर पर मैं कभी डिटेल पेपर लिखूंगा. बाकी लोगों को भी लिखना चाहिए क्योंकि बात बिगड़ गई और बिगाड़ने वाला कोई नहीं हो, ऐसा कैसे हो सकता है. इनसे मेरा कोई निजी पंगा नहीं है. इनमें से दो लोग तो किसी दौर में मेरे बॉस रहे हैं. मुझे नौकरी दी है. उनके क्राफ्ट और कौशल पर भी किसी को शक नहीं होना चाहिए. मामला नीयत का भी नहीं है.

और जो एंकर-रिपोर्टर टाइप लोग स्क्रीन पर तमाशा करते नजर आते हैं, और इस वजह से अक्सर आलोचना के निशाने पर होते हैं, उनकी इतनी हैसियत नहीं थी कि मैं उन्हें दोषी ठहराऊं. लेकिन इसमें क्या शक है कि इनके समय से चैनल जिस तरह से चलने लगे, उसकी वजह से आज की तारीख में हिंदी के टीवी पत्रकारों और चैनलों के नाम पर पान दुकानों और हेयर कटिंग सलून में चुटकुले चलते हैं. पत्रकारों का नाम आते ही बच्चे हंसने लगते हैं. इन चैनलों ने मसखरेपन की दर्शकों को ऐसी लत लगा दी कि आखिर में न्यूज चैनलों पर आधे-आधे घंटे के लाफ्टर चैलेंज शो चलने लगे.

होने को तो ये न भी होते और कोई और होता, तो भी शायद यही हो रहा होता, लेकिन जिस कालखंड में हिंदी टीवी चैनलों का “मसखरा युग” शुरू हुआ तब 3 सबसे महत्वपूर्ण प्लेफॉर्म की लीडरशिप इनके ही हाथ में थी. कहना मुश्किल है कि इसमें इनका निजी दोष कितना है, लेकिन अच्छा होता है तो नेता श्रेय ले जाता है, तो बुरा होने का ठीकरा किसके सिर फूटे? इन्होंने अगर नहीं भी किया, तो अपने नेतृत्व में होने जरूर दिया.

एस पी सिंह ने गणेश को दूध पिलाने की खबर का मजाक उड़ाकर और जूता रिपेयर करने वाले तिपाए को दूध पिलाकर भारतीय टीवी न्यूज इतिहास के सबसे यादगार क्षण को जीने का जज्बा दिखाया था. सिखाया कि अंधविश्वास के खंडन की भी TRP हो सकती है. लेकिन मसखरा युग में अंधविश्वास फैलाकर TRP लेने की कोई भी कोशिश छोड़ी नहीं गई. टीवी पर इंग्लिश न्यूज में भी तमाशा कम नहीं है. लेकिन वह तमाशा आम तौर पर समाचारों के इर्द गिर्द है. हिंदी न्यूज में तमाशा महत्वपूर्ण है. खबर की जरूरत नहीं है. न्यूज चैनल कई बार लंबे समय न्यूज के बगैर चले और चलाए गए. किसी ने तो यह सब किया है.

उदय शंकर, क़मर वहीद नकवी और रजत शर्मा ही क्यों? हिंदी न्यूज चैनलों के मसखरा युग में प्रवेश के तीन नायकों की मेरी इस शिनाख्त से कुछ लोग खफा है, तो कुछ पूछ रहे हैं कि यही तीन क्यों? दीपक चौरसिया, आशुतोष, विनोद कापड़ी जैसे लोग भी क्यों नहीं. जिनकी भावनाएं आहत हुई हैं मेरा स्टेटस पढ़कर, उनके लिए मुझे कुछ नहीं कहना. उनसे निवेदन है कि कमेंट बॉक्स में जाकर मेरा स्टेटस फिर से पढ़ लें. और जो जानना चाहते हैं कि “उदय शंकर, कमर वहीद नकवी और रजत शर्मा ही क्यों” उन्हें शायद मालूम नहीं कि हिंदी के न्यूज चेनलों ने जब “नागिन का बदला युग” या “महंगी वेश्या की खोज युग” में प्रवेश किया तो ये तीन लोग देश के सबसे लोकप्रिय तीन चैनलों के लीडर थे. TRP लाने की मजबूरी थी. सही बात है. लोग न देखें, तो चैनल क्यों चलाना.

लेकिन TRP लाने के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना, उसकी वजह से आज एक बच्चा भी टीवी पत्रकारों को जोकर और मदारी के रूप में देख कर हंसता है. दीपक चौरसिया, आशुतोष, विनोद कापड़ी जैसे लोग इसलिए नहीं क्योंकि वे स्क्रीन पर जरूर रहे लेकिन उस दौर में इनकी इतनी हैसियत नहीं थी कि कटेंट को निर्णायक रूप से प्रभावित करें.

वे खुद अंधविश्वासी नहीं हैं, लेकिन आपको या आपमें से ज्यादातर को अंधविश्वासी मानते हैं!! उदय शंकर, क़मर वहीद नकवी और रजत शर्मा ने एक खास कालखंड में हिंदी टेलीविजन समाचार उद्योग को अंधविश्वास और मसखरा युग में पहुंचा दिया, लेकिन ये तीनों खुद आधुनिक विचारों के मॉडर्न लोग हैं. इसलिए समस्या इनकी निजी विचारधारा को लेकर नहीं है. बल्कि TRP पाने के लिए बनी उनकी इस सोच को लेकर है कि हिंदी चैनलों का दर्शक मूर्ख और अंधविश्वासी होता है.

इसे मनोरंजन उद्योग की भाषा में “Lowest common denominator” कहते हैं. इसकी परिभाषा यह है- the large number of people in society who will accept low-quality products and entertainment या appealing to as many people at once as possible. लेकिन इसका नतीजा यह भी हुआ कि आज एक बच्चा भी टीवी पत्रकारों को जोकर और मदारी के रूप में देख कर हंसता है.

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दिलीप मंडल ने लंबे समय तक ज्योतिष यानी भविष्यफल का कॉलम लिखा है!

Dilip Mandal : सॉरी…. क्या यह जानकर आपके दिल को चोट पहुँचेगी कि मैंने लंबे समय तक ज्योतिष यानी भविष्यफल का कॉलम लिखा है। दुनिया में चूंकि 12 राशियाँ, यानी 12 तरह के ही लोग होते हैं, इसलिए, भविष्यवाणी करना मुश्किल नहीं है। 12 तरह के लोगों के लिए 12×3 यानी 36 अच्छे बुरे वाक्य बना लीजिए। इसके लगभग असंख्य कॉम्बिनेशन बनते हैं। इन्हें 12 राशियों पर फेंटते रहिए। आप ज़िंदगी भर इन 36 सेंटेंस से ज्योतिष का धंधा कर सकते हैं। आज ही करके देखिए।

ज्योतिष में कोई बुराई नहीं है। देखना सिर्फ़ यह है कि इस कारोबार में पैसा जाता किसकी जेब से है और पैसा पाता कौन है। जो पैसे पाता है, उसकी समझदारी असंदिग्ध है। जो पैसा गँवाता है, उसकी मूर्खता के बारे में मैं कुछ कहना नहीं चाहता। लोगों के दिलों को ठेस लग जाएगी। और ठेस पहुँचाना कोई अच्छी बात नहीं है। चाहे सामने वाला निपट मूर्ख ही क्यों न हो। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (a) (h) के मुताबिक़ हर नागरिक का कर्तव्य है कि अपने अंदर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करे। बाक़ी आपकी मर्ज़ी। ज़बर्दस्ती नहीं है। संविधान और क़ानून की दृष्टि में अंधविश्वास या ज्योतिष पर भरोसा करना कोई अपराध नहीं है। बस रिक्वेस्ट है संविधान की तरफ़ से कि साइंटिफिक टेंपरामेंट विकसित कीजिए। अच्छा होता है।

पश्यन्ती शुक्ला ‘ऋता’ : 2009 की बात है. हमारे न्यूज़ चैनल में मेरी दोस्त ‘राशिफल’ नाम का प्रोग्राम बनाती थी. एक दिन मैने देखा कि पिछले 3 दिनों के राशिफल को एडिट करके उसने आज का राशिफल बना दिया, सभी 12 राशियों का. इतना ही नहीं, मेरे दूसरे चैनल में मैने देखा कि जब किसी caller का सवाल खुद के मुताबिक नही होता या फिर caller ही नहीं मिलता तो ऑफिस वाले लोग खुद ही Intercom से फोन लगाकर फलानी जगह के फलाने caller बन जाते थे. और इस तरह ज्योतिष जैसे विज्ञान का बाज़ारीकरण कर अपने धंधे को चलाने वाले ये मीडिया वाले हमें बता रहे हैं कि ज्योतिष एक अंधविश्वास है. मेरी दोस्त यहां फेसबुक पर हैं. उनकी अनुमति के बाद उनका नाम लिख रही हूं- Smita M Singh. मेरे लिखे दोनों वाकिये.. P7 & Zee से रिलेटेड हैं… हालांकि इसके अलावा मैं ये भी जानती हूँ कि बाकी के भी चैनलों में ऐसा ही होता है क्योंकि काम करने वाले वही हैं.

दिलीप मंडल और पश्यंती शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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Secular राजदीप सरदेसाई को Communal मनोहर पर्रिकर पर प्यार आ गया!

Dilip C Mandal : सेकुलर और कम्युनल में क्या रखा है? राजदीप सरदेसाई कट्टर Secular गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB) हैं और मनोहर पर्रिकर कट्टर Communal गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB). और फिर प्राइड यानी गर्व का क्या है? हो जाता है. राजदीप को पर्रिकर और प्रभु पर गर्व हो जाता है. सारस्वत को सारस्वत पर गर्व हो जाता है. सेकुलर को कम्युनल पर दुलार आ जाता है. वैसे, अलग से लिखने की क्या जरूरत है कि दोनों टैलेंटेड हैं. वह तो स्वयंसिद्ध है. राजदीप भी कोई कम टैलेंटेड नहीं हैं.

सेकुलर को
कम्युनल पर
प्यार आ गया
प्राइड आ गया.

प्यार शाश्वत है,
प्यार सारस्वत है.

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दो चीज़ों का डर नहीं होना चाहिए। एक तो कि कोई हैक कर लेगा। तो क्या? फिर से बना लेंगे और 10 दिन में पढ़ने वाले भी आ जाएँगे। दूसरा डर कि धार्मिक आस्था को चोट वाला कोई मुक़दमा हो गया तो? एक तो होगा नहीं। कौन अपने धार्मिक ग्रंथों की क़ानूनी पड़ताल कराके उनकी फ़ज़ीहत करना चाहेगा? मुक़दमा हुआ तो हम इस बारे में पढ़ेंगे बहुत और बताएँगे भी बहुत। दूसरे, इस धारा में सज़ा होती नहीं। मैंने कभी सुना नहीं। मुझे करेक्ट कीजिए। तो मस्त रहिए। टेक्नोलॉजी और लोकतंत्र को थैंक यू कहिए। इतने साल में न मेरा हैक हुआ न किसी ने मुक़दमा किया।

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मनुस्मृति और तमाम स्मृतियों के हिसाब से गोडसे जी को तो क्या, उनकी बिरादरी में किसी को भी बड़े से बड़े अपराध के लिए फाँसी नहीं हो सकती थी। मैकॉले जी ने भारत में पहली बार IPC यानी इंडियन पीनल कोड बना दिया। क़ानून की नज़र में सब बराबर हो गए। समान अपराध के लिए समान दंड लागू हो गया। तो गोडसे जी को फाँसी हो गई मैकॉले जी के विधान से। इसलिए भी मैकॉले जी भारत में विलेन माने जाते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

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‘बाल रामकथा’ के लेखक हैं मधुकर उपाध्याय… पूरी लिस्ट देखिए प्रगतिशीलों-सेकुलरों की…

Dilip C Mandal : हे ठाकुर नामवर सिंहों-प्रगतिशीलों-सेकुलरों, आपने कांग्रेस के SECULAR शासन में उंचे पदों पर रहते हुए बच्चों के पढ़ने का यही बंदोबस्त किया क्या? पढ़िए मित्र Jitendra Mahala का स्टेटस.

राजस्थान में कक्षा छ में बाल रामकथा नाम से रामायण और कक्षा सात में बाल महाभारत नाम से महाभारत बच्चों को पढ़ाई जाती हैं. दोनों किताबों को बनाने वाली समिति के नामों पर गौर करें.

1. प्रो. नामवर सिंह ( एनसीईआरटी के भाषा सलाहकार समिति के अध्यक्ष)
2. प्रो. पुरुषोतम अग्रवाल ( मुख्य सलाहकार)
3. रामजन्म शर्मा ( मुख्य समन्वयक)
4. प्रो. मृणाल मिरी ( निगरानी कमेटी के सदस्य)
5. जी. पी. देशपांडे ( निगरानी कमेटी के सदस्य)
6. अशोक वाजपेयी और प्रो. सत्यप्रकाश मिश्र (जिन्हें निगरानी कमेटी के सदस्यों ने निगरानी के लिए नामित किया)
7. मधुकर उपाध्याय ( बाल रामकथा के लेखक)

नाम के साथ-साथ इनका धर्म और जाति भी गौर करें. बेहतर समझ बनेगी. इस देश में रहने और जीने के लिए यह समझ बनाना कंपल्सरी है.

और यह लिस्ट देश के सबसे बड़े सेकुलरों की है. हे राम!! शर्मनाक है कि नामवर सिंह ने अपनी निगरानी में छठी और सातवीं के बच्चों के लिए ये धार्मिक किताबें तैयार करवाईं. इससे तो बत्रा ही ठीक हैं. जो बोलते हैं, वही करते हैं और वैसा ही दिखते हैं. उनसे लड़ना आसान है. ये खतरनाक लोग हैं. कर्म या कुकर्म के आधार पर विश्लेषण करें कि ये संघियों से ये अलग कैसे हैं. क्लास सिक्स में ही दिमाग में रामायण और सातवीं में महाभारत घुसा देंगे?  ऐतराज इस बात पर है कि इतनी कम उम्र के बच्चों को रिलीजियस टेक्स्ट नहीं पढ़ाना चाहिए. खासकर एक ही धर्म के टेक्स्ट तो कतई नहीं. अपनी समझ विकसित हो जाए, तो बच्चा चुन लेगा.

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डरिए मत! खुद को सेकुलर कहने वाली सरकारों ने अब तक राम, कृष्ण आदि को हिंदी साहित्य में पढ़ाया है. UPSC (सिविल सर्विस) के लिए हिंदी के एक्जाम में भी यह सब पूछा जाता हैं. अब BJP सरकार यही सब इतिहास की किताबों में भी पढ़ा देगी. हद से हद यही न? इससे ज्यादा क्या होने वाला है? आसमान सिर पर मत उठाइए. इतने साल से हिंदी साहित्य में धर्मशास्त्र पढ़ते रहे हैं, अब इतिहास में भी पढ़ लीजिएगा. यहां का पढ़ा हुआ, वहां भी काम आ जाएगा. डबल धमाका ऑफर होगा. पहले हिंदी के नाम पर राम-कृष्ण पढ़ाते थे, अब ज्यादा से ज्यादा क्या होगा. इतिहास के नाम पर उसका रिविजन करा देंगे. इतिहास में भी राम-कृष्ण पढ़ा देंगे तो पाठ अच्छी तरह याद हो जाएगा. इसमें दिक्कत क्या है? किसकी सेना में कितने सिपाही थे और एक सिपाही अगर दूसरी टीम के चार सिपाही के बराबर है…जैसा कुछ करके मैथ्स में भी डाल दें.

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अंत में नहीं, शुरुआत करें प्रार्थना से. भारत में अगर साइंटिफिक टेंपरामेंट विकसित करना है, तो सबसे पहले स्कूलों में हो रही प्रार्थनाओं पर एक अध्ययन कराया जाए और

“हम कितने खल-कामी-अशक्त-बेकार-लाचार-घटिया हैं”
“हे प्रभु-हे देवी, तुम हमें तार तो, पार उतार दो”
“हम तो कुछ नहीं-जो हो तुम ही हो”
और
“हमको अपनी शरण में ले लीजिए प्लीज”….जैसे भाव की सारी प्रार्थनाओं पर पाबंदी लगाई जाए.

स्कूल में पहले ही दिन बच्चे-बच्चियों का कॉनफिडेंस हिल जाता होगा, ऐसी प्रार्थना करके.

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हिंदी भाषा साहित्य की किताबों और सिलेबस से अगर ब्राह्मण धर्म के रिलीजियस टेक्स्ट निकाल दें तो उसमें क्या बचेगा? सूर, तुलसी, मीरा, निराला आदि के धार्मिक टेक्स्ट को निकाल दें, तो बचेगा क्या? किसी भी और भाषा के साहित्य में अगर ऐसा गंभीर संकट हो तो बताएं. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हिंदी साहित्य को और उसके सिलेबस को कौन कंट्रोल करता है. हिंदी की इतनी दुर्दशा यूं ही नहीं हुई है. धार्मिक टेक्स्स पढ़ना है तो धर्मशास्त्र में पढ़ाइए. हिंदी साहित्य ने किसी का क्या बिगाड़ा है? बच्चा साहित्य पढ़ने आया है और कहते हैं पढ़ सरस्वती वंदना- वर दे, वीणावादिनि वर दे. अगर अलग से धर्म शास्त्र पढ़ने के लिए बच्चे नहीं मिल रहे हैं तो क्या साहित्य पढ़ने वाले बच्चों को धर्म पढ़ा देंगे? यह कोई इंसानियत की बात है?  बतरा बनाम परगतिशील पतरा? सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने सरस्वती वंदना और राम की शक्ति पूजा करा दी और उनके फैन नामवर सिंह ने अपनी निगरानी में क्लास 6 के लिए रामकथा और क्लास 7 के लिए महाभारत की किताब तैयार करवा दी, वहीं मैनेजर पांडे सूरदास में रम गए ….ये लोग बतरा (बत्रा) से बेहतर क्या इसलिए हैं कि इन पर प्रगतिशील होने का लेबल है जबकि बत्रा बेचारे जो बोलते हैं, वही करते हैं और वैसा ही विदूषक दिखते हैं. आप लोग अलग अलग कैसे हो प्रभु? कुछ लोग तुलसीदास में प्रगतिशीलता के सूत्र तलाश रहे हैं तो कुछ लोग मीरा में नारी मुक्ति के सूत्र. आप लोग सचमुच महान हैं महाराज. प्रणाम.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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अनुराधा देसाई की कंपनी वेंकटेश्वरा हैचरीज देश में सबसे ज्यादा मुर्गा, अंडा और मांस खिलाती है

Dilip C Mandal : कौन खिला रहा है Non Veg? कुरैशी हलाल चिकेन & मटन शॉप के आगे जहां और भी है. तो आपको लगता है कि ये नॉन-वेज वाला मलेच्छ, अधार्मिक कारोबार तथाकथित ‘मलेच्छ’ लोग ज्यादा करते होंगे. लगता है न? मोहल्ले में लुंगी वाले कुरैशी मियां का छोटा-सा ठिया देख कर आपको ऐसा लग ही सकता है. लेकिन आपको मालूम है भारत के लोगों को सबसे ज्यादा नॉन-वेज कौन खिला रहा है? एशिया की सबसे बड़ी पोल्ट्री कंपनी भारत की है और क्या है उसका नाम?

जी, अनुराधा देसाई जी के सफल नेतृत्व में चलने वाली कंपनी वेंकटेश्वरा हैचरीज देश में ज्यादा मुर्गा, अंडा और मांस खिला रही हैं लोगों को. कंपनी के नाम पर विशेष तौर पर ध्यान दिया जाए. बहुत धार्मिक नाम है. यह कंपनी 2014 के पहले तीन महीने में 448 करोड़ का कारोबार कर चुकी है. यानी मोटे तौर पर इतनी रकम का नॉन वेज लोगों को खिला चुकी है. पहले बी.वी. राव साहब यह कंपनी चलाया करते थे. उन्होंने यह कंपनी अपनी धर्मपत्नी उत्तरादेवी राव की प्रेरणा से शुरू की. यह बात कंपनी खुद बोल रही है. (बाद में संपादित) इसके अलावा दुनिया को तमाम तरह का मीट खिलाने वाले सभरवाल साहब तो हैं हैं. उनकी अल कबीर कंपनी का नाम तो आपने सुना ही होगा. इसमें सभरवाल साहब की 50% हिस्सेदारी है. तो कुरैशी साहब की छोटी सी मीट की दुकान दुनिया का अंतिम सत्य नहीं है.

http://www.venkys.com/about-us

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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जी न्यूज के एंकर ने बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के साथ बदतमीजी की

Dilip C Mandal : बात-बात पर जाति का रोना लेकर मत बैठिए. यह सही है कि न्यूज एंकर ने बिहार के माननीय मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के साथ जो बदतमीजी की, और उनके बारे में जिस अंदाज और भाषा में बाकी जगह भी बात की जा रही है, उसके पीछे जाति है, लेकिन आपको मान्यवर कांशीराम बनने से किसने रोका है. कांशीराम साहेब के साथ कोई ऐसा करने की सोच सकता था क्या?

बाकी छोड़िए, मायावती आज मुख्यमंत्री नहीं हैं, लेकिन उनके साथ कोई बदतमीजी करने की हिम्मत क्यों नहीं करता? नामदेव ढसाल के बारे में सोचिए. किसी की हिम्मत पड़ती क्या? दम की बात है बॉस. रोने से खाक नहीं मिलेगा. दम पैदा कीजिए. दुनिया झुककर सलाम करने के लिए तैयार बैठी है.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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हिंदी का संपादक एक रोता हुआ जीव है, जिसके जीवन का लक्ष्य अपनी नौकरी बचाना है

भारत यूरोप नहीं है, अमेरिका भी नहीं है. यहां अखबार अभी भी बढ़ रहे हैं, और यह सिलसिला रुक जाए, इसका फिलहाल कोई कारण नहीं है. इंटरनेट पर हिंदी आई ही है और अगर सब कुछ ठीक रहा तो भारत में इंटरनेट हर मुट्ठी तक नहीं भी तो ज्यादातर मुट्ठियों तक पहुंच ही जाएगा और साथ में हिंदी भी इसकी सवारी करेगी. टीवी भी भारत में बढ़ता मीडियम है. और फिर यह टेक्नोलॉजी का बाजार है. यहां कारज धीरे होत है टाइप कुछ नहीं होता. अगर सारे कोऑर्डिनेट्स सही हैं, तो एक का सौ और सौ का लाख होने में समय नहीं लगता. कुल मिलाकर प्रिंट, टीवी और वेब पर न्यूज मीडियम की हालत ठीक है. बढ़ता बाजार है. मांग बनी हुई है. समस्या बाजार में नहीं है. 

तो फिर हिंदी का संपादक आज ढंग का प्रोडक्ट क्यों नहीं दे पा रहा है? इंग्लिश के मीडिया प्रोडक्ट के सामने उसका प्रोडक्ट निस्तेज क्यों है? रेवेन्यू मॉडल कमजोर क्यों है? संपादक मीडिया मालिकों से यह क्यों नहीं कह पा रहा है कि मैं जागरण या भास्कर या अमर उजाला या हिंदुस्तान को देश का सबसे असरदार अखबार बना दूंगा. हिंदी का कोई संपादक यह क्लेम क्यों नहीं करता कि हमारे पास सबसे ज्यादा खबरें और सबसे ज्यादा तस्वीरें हैं और सबसे सघन स्ट्रिंगर नेटवर्क है, इसलिए मैं इंटरनेट पर अपने ब्रांड को टाइम्स ऑफ इंडिया से बड़ा और पॉपुलर न्यूज ब्रांड बना दूंगा? कॉमस्कोर पर टाइम्स ऑफ इंडिया से आगे जाने का सपना देखने में वह डरता क्यों है? हिंदी के टीवी चैनल देखकर ऐसा क्यों लगता है कि उन्हें संपादक और पत्रकार नहीं, जोकरों और विदूषकों की टोली चला रही है. इनमें से किसी को भी हिंदी के पाठक की समझदारी का भरोसा क्यों नहीं है? खबरों के नाम पर भंड़ैती और तमाशा हावी क्यों है?  कोई संपादक मालिक को यह क्यों नहीं कह रहा है कि मैं ‘समाचार’ दिखाकर आपको नंबर दूंगा.

हाल की हिंदी फिल्मों में पत्रकार को अगर लगातार जोकर और मूर्ख की तरह दर्शाया जा रहा है, तो यह किसके प्रताप से हुआ है? पत्रकार समाज में अगर अब प्रतिष्ठित आदमी नहीं रहा, और पत्रकारिता अगर प्रतिष्ठित पेशा नहीं है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या कोई सब-एडिटर या रिपोर्टर या ट्रेनी?

वैसे क्या है हिंदी का संपादक? वह करता क्या है और क्यों करता है? दरअसल, वह एक रोता हुआ भयभीत प्राणी है, जिसे अपने काम और अपनी क्षमता और हुनर के अलावा, हर चीज से शिकायत है. वह बस किसी तरह अखबार या चैनल या साइट चलाता रहेगा. कभी कभार मैनेजमेंट के कहने पर कुछ लॉन्च कर देगा. हमेशा कम लोगों के होने और टैलेंटेड मैनपावर की कमी का रोना रोएगा. कभी कहेगा कि मालिक करने नहीं देता. जबकि मालिक बेचारा इंतजार कर रहा है कि संपादक कोई अच्छा आइडिया लेकर तो आए.

हिंदी का संपादक कभी भी नए प्रयोग नहीं करेगा. नए रेवेन्यू स्ट्रीम खोलने की बात भी नहीं करेगा. कहेगा कि यह तो मैनेजरों का काम है. जबकि उसके दब्बूपने की असली वजह यह है कि वह डरता है. कुछ गलत हो गया तो? नौकरी चली गई तो? वह हमेशा अपनी और प्रोडक्ट की कमियों के लिए नीचे के किसी को या कई लोगों को दोषी ठहराकर अपनी पोजिशन बचाने के लिए तत्पर नजर आएगा. वह गैर-पत्रकारीय तरीके से मालिकों के लिए उपयोगी बनकर या चापलूसी करके नौकरी बचाने की कोशिश करेगा. 

वह हमेशा अपना गिरोह बनाने की कोशिश करेगा. संपादकी के पहले छह महीने मालिक को यह कहेगा कि पुराने लोगों से काम ले कर देखते हैं. फिर कहेगा, इनसे काम नहीं बनेगा. छह महीने-एक साल में पुराने के बदले नए लोग लाएगा. अपनी जाति, रिश्तेदारी, इलाके से लोग लाएगा. फिर उन्हें काम करने का मौका देने के नाम पर साल दो साल निकालेगा और फिर भी बात नहीं बनी तो और प्रपंच करके टिकने की कोशिश करेगा या निकाला जाएगा. वह बी है इसलिए सी कटेगरी के लोगों को लाएगा. क्योंकि वह खुद ए नहीं है, इसलिए ए प्लस को कभी नहीं लाएगा. एवरेज टैलेंट वालों के बीच वह खुद को आश्वस्त महसूस करेगा. उसके रोजमर्रा के जीवन में मिलने वाले 90 फीसदी से ज्यादा लोग पत्रकार ही होंगे, जिनके बीच वह खुद को अच्छा फील करेगा. वह रेवेन्यू बढ़ाने की नहीं, खर्चा घटाने की सोचेगा. टॉप लाइन ठीक किए बगैर, बॉटम लाइन सुधारने के लिए कभी रिपोर्टिंग का खर्चा घटाएगा, तो कभी मैनपावर कट करेगा, तो कभी सुविधाओं में कटोती करेगा, तो कभी लोगों की सैलरी घटाएगा.

जब मालिक व्यूअरशिप और रीडरशिप के लिए दबाव बढ़ाएगा, तो प्रोडक्ट में गंदगी फैला देगा. वेबसाइट है तो पोर्न और सेमीपोर्न परोस देगा. चटपटे के नाम पर कूड़ा बिखेर देगा. टीवी पर है तो नागिन का बदला और कातिल हसीना टाइप कुछ कर लेगा या स्वर्ग के लिए सीढी लगा देगा. लाफ्टर चैलेंज के शॉर्ट कट में घुस जाएगा. न्यूज के नाम पर तमाशा करने लगेगा. जब इस वजह से प्रोडक्ट की ब्रांडिंग खराब होगी और विज्ञापन का रेवेन्यू प्रभावित होगा, तो अपना हाथ झाड़कर खड़ा हो जाएगा.

हिंदी का संपादक बौद्धिक आलस्य करेगा, अच्छा केंटेंट नहीं जुटाएगा और कहेगा कि हिंदी का रीडर और व्यूअर तो कोई अच्छी चीज पसंद ही नहीं करता. अपने बौद्धिक आलस्य का ठीकरा वह अंग्रेजी वर्चस्व के सिर पर फोड़ देगा. कहेगा कि सारी गड़बड़ी इसलिए है क्योंकि अंग्रेजी हावी है.

हिंदी का संपादक अपना स्किल सेट बेहतर करने की कोशिश नहीं करेगा. वह अपनी क्षमताओं को ब्रांच आउट नहीं करेगा. अगर वह नौकरी पर नहीं होगा, तो फिर कुछ भी नहीं रह जाएगा और मर जाएगा. वह पढ़ाई नहीं करेगा. रिसर्च नहीं करेगा. विज्ञापन की कॉपी लिखने की तमीज नहीं सिखेगा. वह पढ़ाने का हुनर नहीं सिखेगा. वह यूजीसी-नेट और पीएचडी के बारे में सोचेगा तक नहीं. वह सीरियल की स्क्रिप्ट या किताब लिखने को कोशिश नहीं करेगा. अनुवाद करना उसके वश में नहीं है, और इसे सीखने की कोशिश भी नहीं करेगा. डॉक्यूमेंट्री बनाना भी ऐसा ही मामला है, जिससे जाहिर है उसका कोई वास्ता नहीं होगा. इंग्लिश के कई संपादकों की तरह कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन में जाने का हुनर भी हासिल नहीं करेगा. प्रिंट में है तो प्रिंट में और टीवी पर है तो टीवी में ही उलझा रहेगा. दूसरे मीडियम में हाथ आजमाने का जोखिम नहीं लेगा. भाषा के मामले में भी हिंदी से शुरू और हिंदी में खत्म की स्थिति में रहेगा. वह टीम को ट्रेनिंग दिए जाने और खुद ट्रेनिंग लेने, दोनों का विरोध करेगा. पान-दुकानदार की तरह हर चीज पर उसकी एक राय जरूर होगी लेकिन वह देश-दुनिया के किसी भी विषय का एक्सपर्ट नहीं होगा.

दूसरे विषय का एक्सपर्ट होना तो छोड़िए, हिंदी का संपादक अक्सर अपने प्रोफेशन की बुनियादी बातों से भी अनजान होगा. मिसाल के तौर पर, उसे नहीं मालूम होगा कि उसके काम की संवैधानिक, कानूनी और नियम संबंधी मर्यादाएं क्या हैं. वह कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ, आईपीसी, लॉ ऑफ डिफेमेशन, रूल्स ऑफ पार्लियामेंट्री प्रिविलेज, आईटी एक्ट, केबल एक्ट, प्रेस कौंसिल के मीडिया नॉर्म इनमें से किसी भी बात का जानकार नहीं होगा और न ही अपनी टीम को इनकी ट्रेनिंग दिए जाने की व्यवस्था करेगा. इसके लिए कोई वर्कशॉप आयोजित करना उसकी कल्पना से बाहर की चीज होगी. संपादन संबंधी गलतियों को वह आसानी से विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता करार दे सकता है. कानूनी झमेले में कभी मामला फंसा, तो किसी रिपोर्टर या डेस्क के किसी कर्मचारी के नाम उसका दोष मढ़कर वह खुद को बचा लेने की कोशिश करेगा. या फिर मामले को मैनेज करने में जुट जाएगा. रिपोर्टर या डेस्क जो कुछ अच्छा करेगा, उसका श्रेय संपादक ले लेगा, लेकिन गलती उसकी कभी नहीं होगी. उसने न कभी कोई गलती की है, न कोई गलती करेगा.  

वह जब तक संपादक है, तब तक है, और जब वह नौकरी में नहीं है, तो कुछ नहीं है. वह संपादक के अलावा कुछ नहीं है क्योंकि उसने कुछ और सीखने की कभी कोई कोशिश की ही नहीं है.  

तो क्या हमेशा ऐसा ही रहेगा? इस स्थिति को बदलने के दो उपाय हैं, जिसके बारे में मीडिया मालिकों को सोचना चाहिए. अगर वे चाहते हैं कि संपादक प्रयोग करें, नया सोचें, प्रोडक्ट के लिए वैल्यू क्रिएट करें, नए रेवेन्यू मॉडल बनाएं, तो पहले तो उन लोगों से बचें, जिनके लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ आलेख लिखना, मंत्री के साथ दौरे करना और गिरोहबाजी-गोष्ठीबाजी करना है. संपादकों का कंपनी के राजस्व से, रेवेन्यू मॉडल से, सर्कूलेशन और व्यूअरशिप से तथा प्रोडक्ट के प्रभाव से…इन सबसे वास्ता है. एवरेज और मंदबुद्धि संपादकों को रास्ता दिखाना जरूरी है. मैनेजमेंट को संपादकों के टार्गेट फिक्स करने चाहिए और ये टार्गेट आलेख-विश्लेषण लिखने या चेहरा पोतकर एंकरिंग करने से आगे और चीजों के बारे में भी होने चाहिए. 

दूसरा उपाय, संपादकों की सैलरी इतनी बढ़ाई जाए कि अगर वह दो साल नौकरी कर ले, तो उसमें दो साल नौकरी न करके जीने का साहस और सुविधा हो. नौकरी बचाने के लिए डरा हुआ संपादक न तो पत्रकारिता के लिए अच्छा है और न ही मीडिया इंडस्ट्री के लिए. ऐसा डरा हुआ संपादक मालिकों के लिए किसी काम का नहीं है. अपने नीचे काम करने वालों के लिए तो ऐसे संपादकों से बुरा और कुछ नहीं हो सकता, जो अपनी नौकरी बचाने के लिए दूसरों की जान लेने को हमेशा तैयार बैठा है. ऐसा संपादक पाठकों और दर्शकों के लिए भी बेकार है.

दिलीप मंडल, इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर, इकोनॉमिक टाइम्स हिंदी ऑनलाइन के संपादक तथा सीएनबीसी आवाज चैनल के एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूशर रहे. लगभग एक दर्जन मीडिया संस्थानों में काम का अनुभव. मीडिया शिक्षण, रिसर्च और पुस्तक लेखन में सक्रिय. सूचना और प्रसारण मंत्रालय और प्रेस कौंसिल द्वारा सम्मानित. संपर्क: dilipcmandal@gmail.com

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दिलीप जी का प्रेम ही अनुराधा दीदी की जीवनी शक्ति थी : मनीषा पांडेय

(मनीषा पांडेय)


Manisha Pandey : ये अनुराधा दीदी के बारे में नहीं है। दिलीप सर के बारे में है।  आज वो मेरे बॉस नहीं हैं। निजी लेन-देन और ताकत का कोई रिश्‍ता हमारे बीच नहीं। इसलिए अब ये लिख सकती हूं। ये बातें पहले कभी कही नहीं। कभी लिखी नहीं। इसलिए नहीं कि इन बातों पर पहले मुझे विश्‍वास नहीं था, इसलिए क्‍योंकि जिस दुनिया में और जिन लोगों के बीच ये लिखा और पढ़ा जा रहा है, उस दुनिया पर, उन लोगों पर विश्‍वास नहीं था। आज भी नहीं है। मुझे बिलकुल यकीन नहीं कि ये दुनिया प्‍यार समझती है। मन समझती है। दुख समझती है। मुझे सचमुच यकीन नहीं कि बिना किसी निजी मतलब कि किसी के आगे आदर से नतमस्‍तक हो जाने का अर्थ ये दुनिया समझती है, कि लोगों का हृदय सबके लिए करुणा से भरा हुआ है। नहीं। ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं था, इसलिए ये कभी कहा भी नहीं मैंने कि दिलीप सर मेरे जीवन के उन अपवाद लोगों में से हैं, जिन्‍हें देखकर, अनुराधा दीदी के साथ उनके रिश्‍ते को देखकर प्‍यार और रिश्‍तों पर यकीन करने को दिल चाहता है।

अनुराधा दीदी 17 सालों तक दवाइयों की खुराक पर नहीं, इसी प्‍यार की खुराक पर जिंदा रहीं। उनके होने की वजह सिर्फ और सिर्फ प्रेम ही थी। मुझे यकीन है कि जिस दुनिया में मैं रहती हूं, वहां लोग प्रेम करना नहीं जानते। इसलिए वो प्रेम को समझ भी नहीं पाते। समझ नहीं पाते क्‍योंकि प्रेम कोई कहने की बात नहीं। ये आपके अस्तित्‍व में घुली होती है। आपके होने में निहित। दिलीप सर जैसे रिजर्व और खुद को कभी भी एक्‍सप्रेस न करने वाले इंसान के भीतर की करुणा, हर बात को शब्‍दों में समझने वाले संसार को कभी समझ में नहीं आ सकती। दो साल उनके साथ काम करते हुए हमेशा ये महसूस हुाअ कि उनकी सारी ऊपरी कठोरता और आलोचना के भीतर कितनी करुणा छिपी है। ऑफिस में कोर्इ उनसे ज्‍यादा बात नहीं करता, वो भी नहीं करते। लेकिन उनकी मौजूदगी में ही प्‍यार था। बहुत सारा। सबके लिए।

जब उन्‍होंने इंडिया टुडे की नौकरी छोड़ी तो लोगों ने तरह-तरह की बातें कीं। कुछ मेरे कानों तक भी पहुंची। गलती उनकी भी नहीं है। वो समझ ही नहीं सकते कि कोई पुरुष एक स्‍त्री को इतना प्रेम कैसे कर सकता है कि आखिरी वक्‍त एक-एक पल उसके साथ बिताने के लिए सबकुछ छोड़ दे। दिल, दिमाग, देह से सिर्फ उसके साथ होना चाहे। कुछ और न सही तो बस उसका हाथ ही थामे बैठा रहे। मैं जिस दुनिया में रहती हूं, वहां लोग शादी करते हैं, सेक्‍स करते हैं, बच्‍चे पैदा करते हैं, पैसे कमाते हैं, साथ पहाड़ घूमने जाते हैं, लेकिन कभी हाथ नहीं थामते। किसी के दिल को सहेजकर नहीं रखते। मुझे यकीन है कि हर दुनियावी काम करने वाला इंसान भी हाथ थामना, दिल को सहेजकर रखना नहीं जानता। दिलीप सर जानते थे, जानते हैं।

संसार की क्रूरताओं का तो ये आलम है कि बाद में लोग कहने लगे कि दिलीप ने बड़ा त्‍याग किया। सचमुच? क्‍या ये त्‍याग है? इतनी निष्‍ठुरता के साथ कैसे जी लेते हो तुम सब? क्‍योंकि मेरा दिल कहता है कि ये त्‍याग नहीं है। त्‍याग कहकर उसकी गरिमा को धो डाला तुमने। त्‍याग होगा तुम्‍हारे लिए, क्‍योंकि तुम क्रूर हो। उनके लिए तो जीने का यही तरीका था। उन्‍होंने ये सोचकर नहीं किया कि कुछ बहुत बड़ा त्‍याग कर रहे हैं। उनके लिए ये फैसला वैसे ही था, जैसे पानी का बहना, जैसे हवा का चलना। बिलकुल सहज। जीने का सहज तरीका। बहुत साधारण, लेकिन उतना ही असाधारण। असाधारण लगता है, क्‍योंकि दुनिया साधारण सी भी नहीं है।  किसी को सचमुच प्रेम कर सकने की अपनी सारी ताकत के साथ दिलीप सर असाधारण लगते हैं, लेकिन सच तो ये है कि वो सबसे साधारण इंसान हैं। बिलकुल वैसे, जैसा इंसान को होना चाहिए था। जैसा संसार को होना चाहिए था।  लेकिन हुआ नहीं। अनुराधा दीदी की जिंदगी जितनी भी रही, हम सब स्त्रियों से बेहतर रही क्‍योंकि उनकी जिंदगी में प्रेम था। हम जिंदगी के 70-80 बरस भी, अगर जिए तो प्रेमविहीन संसार की प्रेमविहीन गलियों में बिता देंगे। प्रेम करने वाले बिरले ही होते हैं।


Manisha Pandey : खुद अनुराधा दीदी की तबीयत ठीक नहीं थी और वो मेरे मामूली सी अस्‍वस्‍थ हो जाने पर परेशान मेरा हाल पूछतीं। आखिरी बार उन्‍होंने मुझे ये मैसेज भेजा था और कहा था, तीन महीने ये करके देखो। स्‍वस्‍थ रहोगी।

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“यह तीन महीने के लिए योजना है। कुछ भी नया नहीं, पर करके देखो। अगर कोई फरक नहीं पड़े तो किसी बड़े अस्पताल में विशेषज्ञ को दिखाओ। मेफटॉल की जगह पैरासिटामोल से काम चले तो अच्छा, क्योंकि मेफटॉल के साइड-इफेक्ट में हाजमा गड़बड़ा जाता है।
1. सुबह-सुबह 3 गिलास पानी पियो
2. दो किलोमीटर दौड़ लगाओ
3. 15 मिनट शरीर के सब जोड़ खोलने के लिए हिलो-डुलो
4. रोज 15 मिनट धूप में रहो
5. रोज़ तीन तरह के फल, तीन तरह की सब्जियां खाओ
6. आलू का भुर्ता, आलू का झोल और आलू की भुजिया- ये एक ही सब्जी है। पालक, पत्ता गोभी टमामटर की मिली-जुली सब्जी का बड़ा कटोरा= तीन सब्जियां
7. रोज कम से कम 3 लीटर पानी
8. समोसा, ब्रेड पकोड़ा, बर्गर, चाऊमीन, दोसा, चाय कॉफी, हुक्का दारू से बिल्कुल दूर।
9. तकियों और मच्छरों से दूर।
10. रोज़ कम से कम 6 घंटे की नींद”

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मैंने हंसकर पूछा, अनु दी बाकी सब तो ठीक है, लेकिन तकिए से दूरी क्‍यों। मैं तो 3-4 तकिया लेकर सोती हूं। तो हंसकर बोलीं, “तकिए की जगह ब्‍वॉयफ्रेंड से काम चलाना पड़े तो अच्‍छा नहीं है क्‍या।”

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ये 17 सितंबर की बातचीत है। वक्‍त तेजी से नजदीक आ रहा था, लेकिन क्‍या मजाल कि उनकी हिम्‍मत को, उनकी हंसी को डिगा दे।  इनबॉक्‍स में उनका आखिरी मैसेज है – Bye Bye. वो चली गईं और मेरे बिस्‍तर पर चारों तकिए वैसे ही उदास पड़े हुए हैं।


Manisha Pandey : अनुराधा दीदी ने 17 साल तक कैंसर के साथ सर्वाइव किया।  आपको क्‍या लगता है, दवाइयों के कारण। नहीं। प्रेम के कारण।  दिलीप जी का प्रेम ही उनकी जीवनी शक्ति थी।


Manisha Pandey : मैं जब अपने दुखों से हारने लगती तो अनुराधा दीदी के बारे में सोचती थी। उनकी किताब पढ़ती- एक कैंसर विजेता की डायरी। और सोचती, अगर कभी ऐसा हुआ कि उनकी जगह मैं हुई तो ऐसे ही लड़ पाऊंगी क्‍या। शायद नहीं। वो अनोखी ही थीं। जिंदगी से हर दिन लड़ती हुई और हर दिन जीतती हुई। कभी कहा नहीं उनसे कि दिल के किसी निजी कोने में कितना प्‍यार है उनके लिए। मन कैसे आदर से भर-भर आता है। कितनी अच्‍छी हैं आप, कितनी बहादुर, कितनी जीवट। कभी नहीं बताया और वो चली भी गईं।  ऐसा अकसर नहीं होता कि कुछ कहने के लिए दुनिया का हर शब्‍द नाकाफी लगने लगे। क्‍यों आज कुछ वैसा ही लग रहा है।

इंडिया टुडे से जुड़ी चर्चित पत्रकार, ब्लागर और फेमनिस्ट मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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तुम्हारी मौत पहाड़ से भारी है : दिलीप मंडल

Dilip C Mandal : मैं अब खाली हो गया हूं, बिल्कुल खाली.  मैं अपनी सबसे प्रिय दोस्त के लिए अब पानी नहीं उबालता. उसके साथ में बिथोवन की सिंफनी नहीं सुनता. मोजार्ट को भी नहीं सुनाता. उसे ऑक्सीजन मास्क नहीं लगाता. उसे नेबुलाइज नहीं करता. उसे नहलाता नहीं. उसके बालों में कंघी नहीं करता. उसे पॉल रॉबसन के ओल्ड मैन रिवर और कर्ली हेडेड बेबी जैसे गाने नहीं सुनाता. गीता दत्त के गाने भी नहीं सुनाता. उसे नित्य कर्म नहीं कराता. उसे कपड़े नहीं पहनाता. उसे ह्वील चेयर पर नहीं घुमाता. उसे अपनी गोद में नहीं सुलाता. उसे हॉस्पीटल नहीं ले जाता.

उसे हर घंटे कुछ खिलाने या पिलाने की अक्सर असफल और कभी-कभी सफल होने वाली कोशिशें भी अब मैं नहीं करता. उसकी खांसने की हर आवाज पर उठ बैठने की जरूरत अब नहीं रही. मैं अब उसका बल्ड प्रेशर चेक नहीं करता. उसे पल्स ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर लगाने की भी जरूरत नहीं रही. मेरे पास अब कोई काम नहीं है. हर दिन नारियल पानी लाना नहीं है. फ्रेश जूस बनाना नहीं है. उसके लिए हर दिन लिम्फाप्रेस मशीन लगाने की जरूरत भी खत्म हुई.

यह सब करने में और उसके के साथ खड़े होने के लिए हमेशा जितने लोगों की जरूरत थी, उससे ज्यादा लोग मौजूद रहे. उसकी बहन गीता राव, मेरी बहन कल्याणी माझी और उसकी भाभी पद्मा राव से सीखना चाहिए कि ऐसे समय में अपने जीवन को कैसे किसी की जरूरत के मुताबिक ढाल लेना चाहिए. इस लिस्ट में मेरे बेट अरिंदम को छोड़कर आम तौर पर सिर्फ औरतें क्यों हैं? देश भर में फैली उसकी दोस्त मंडली ने इस मौके पर निजी प्राथमिकताओं को कई बार पीछे रख दिया.

यह अनुराधा के बारे में है, जो हमेशा और हर जगह, हर हाल में सिर्फ आर. अनुराधा थी. अनुराधा मंडल वह कभी नहीं थी. ठीक उसी तरह जैसे मैं कभी आर. दिलीप नहीं था. फेसबुक पर पता नहीं किस गलती या बेख्याली से यह अनुराधा मंडल नाम आ गया. अपनी स्वतंत्र सत्ता के लिए बला की हद तक जिद्दी आर. अनुराधा को अनुराधा मंडल कहना अन्याय है. ऐसा मत कीजिए.

कहीं पढ़ा था कि कुछ मौत चिड़िया के पंख की तरह हल्की होती है और कुछ मौत पहाड़ से भारी. अनुराधा की मृत्य पर सामूहिक शोक का जो दृश्य लोदी रोड शवदाह गृह और अन्यत्र दिखा, उससे यह तो स्पष्ट है कि अनुराधा ने हजारों लोगों के जीवन को सकारात्मक तरीके से छुआ था. वे कई तरह के लोग थे. वे कैंसर के मरीज थे जिनकी काउंसलिंग अनुराधा ने की थी, कैंसर मरीजों के रिश्तेदार थे, अनुराधा के सहकर्मी थे, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे, प्रोफेसर थे, पत्रकार, डॉक्टर, नाटककार, संस्कृतिकर्मी, अन्य प्रोफेशनल, पड़ोसी और रिश्तेदार थे. कुछ तो वहां ऐसे भी थे, जो क्यों थे, इसकी जानकारी मुझे नहीं है. लेकिन वे अनुराधा के लिए दुखी थे. किसी महानगर में किसी की मौत को आप इस बात से भी आंक सकते हैं कि उससे कितने लोग दुखी हुए. यहां किसी के पास दुखी होने के लिए फालतू का समय नहीं है.

अनुराधा बनना कोई बड़ी बात नहीं है.

आप भी आर. अनुराधा हैं अगर आप अपनी जानलेवा बीमारी को अपनी ताकत बना लें और अपने जीवन से लोगों को जीने का सलीका बताएं. आप आर. अनुराधा हैं अगर आपको पता हो कि आपकी मौत के अब कुछ ही हफ्ते या महीने बचे हैं और ऐसे समय में आप पीएचडी के लिए प्रपोजल लिखें और उसके रेफरेंस जुटाने के लिए किताबें खरीदें और जेएनयू जाकर इंटरव्यू भी दे आएं. यह सब तब जबकि आपको पता हो कि आपकी पीएचडी पूरी नहीं होगी. ऐसे समय में अगर आप अपना दूसरा एमए कर लें, यूजीसी नेट परीक्षा निकाल लें और किताबें लिख लें, तो आप आर. अनुराधा हैं.

दरवाजे खड़ी निश्चित मौत से अगर आप ऐसी भिड़ंत कर सकते हैं तो आप हैं आर. अनुराधा.

जब फेफड़ा जवाब दे रहा हो और तब अगर आप कविताएं लिख रहें हैं तो आप बेशक आर. अनुराधा हैं. आप आर अनुराधा हैं अगर कैंसर के एडवांस स्टेज में होते हुए भी आप प्रतिभाशाली आदिवासी लड़कियों को लैपटॉप देने के लिए स्कॉलरशिप शुरू करते हैं और रांची जाकर बकायदा लैपटॉप बांट भी आते हैं. अगर आप सुरेंद्र प्रताप सिंह रचना संचयन जैसी मुश्किल किताब लिखने के लिए महीनों लाइब्रेरीज की धूल फांक सकते हैं तो आप आर अनुराधा हैं.

अगर आप अपने जीवन के 100 साल में भी ऐसे शानदार 47 साल जीने की सोचते हैं तो आप आर अनुराधा हैं.

और हां, अगर आप कार चलाकर मुंबई से दिल्ली दो दिन से कम समय में आ सकते हैं तो आप आर अनुराधा हैं. थकती हुई हड्डियों के साथ अगर आप टेनिस खेलते हैं और स्वीमिंग करते हैं तो आप हैं आर अनुराधा. अगर महिला पत्रकारों का करियर के बीच में नौकरी छोड़ देना आपकी चिंताओं में हैं और यह आपके शोध का विषय है तो आप आर. अनुराधा हैं. अपना कष्ट भूल कर अगर कैंसर मरीजों की मदद करने के लिए आप अस्पतालों में उनके साथ समय बिता सकते हैं, उनको इलाज की उलझनों के बारे में समझा सकते हैं, उन मरीजों के लिए ब्लॉग और फेसबुक पेज बना और चला सकते हैं तो आप आर. अनुराधा हैं.

आप में से जो भी अनुराधा को जानता है, उसके लिए अनुराधा का अलग परिचय होगा. उसकी यादें आपके साथ होंगी. उन यादों की सकारात्मकता से ऊर्जा लीजिए.

अलविदा मेरी सबसे प्रिय दोस्त, मेरी मार्गदर्शक.
तुम्हारी मौत पहाड़ से भारी है.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.


मूल खबर….

आर. अनुराधा का निधन

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आर. अनुराधा का निधन

नई दिल्ली । भारतीय सूचना सेवा की वरिष्ठ अधिकारी और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग में संपादक आर. अनुराधा नहीं रहीं। वे लम्बे समय से कैंसर से जूझ रही थी। 2005 में अनुराधा ने कैंसर से अपनी पहली लड़ाई पर आत्मकथात्मक पुस्तक लिखा था, “इंद्रधनुष के पीछे-पीछे : एक कैंसर विजेता की डायरी”। यह किताब राधाकृष्ण प्रकाशन से 2005 में प्रकाशित हुई थी। उनकी एक और महत्वपूर्ण कृति है- “पत्रकारिता का महानायकः सुरेंद्र प्रताप सिंह संचयन” जो राजकमल से जून 2011 में प्रकाशित हुआ था।  वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की पत्नी होने के वावजूद आर. अनुराधा की अपनी अलग लेखकीय पहचान थी।

केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाह ने आर. अनुराधा के निधन पर शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा- भारतीय सूचना सेवा की अधिकारी, सामाजिक मुद्दों पर प्रखर-बेबाक आर.अनुराधा नहीं रहीं। उनके निधन की खबर से काफी मर्माहत महसूस कर रहा हूँ। अनुराधा जी की लेखनी के कारण एक अपनी खास पहचान है पर उनको वरिष्ठ पत्रकार और मेरे अनन्यतम छोटे भाई के समान दिलीप मंडल जी की पत्नी होने की वजह से भी जानता हूँ ।  दिलीप मंडल ने हाल ही में इंडिया टुडे में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर अपना काम इसीलिये छोड़ दिया था ताकि आर. अनुराधा की सेवा कर सकें और उनके साथ ज्यादा वक्त गुजार सकें। मै इस दुख की घड़ी में अनुराधा और दिलीप के परिवार के साथ खड़ा हूँ। यह मेरे लिये पारिवारिक क्षति की तरह है। उनके तमाम सहयोगियों, शुभचिंतकों से भी मैं अनुराधा जी के असामयिक निधन पर अपना दुख और हार्दिक संवेदना प्रकट करता हूँ ।

एच एल दुसाद ने आर. अनुराधा के निधन पर फेसबुक पर लिखा, मंडल साहब ने जब इंडिया टुडे से इस्तीफा दिया तभी से हम इस दुखद घटना का सामना करने की मानसिक प्रस्तुति लेने लगे थे। इस बीच अनुराधा जी से मिलने के लिए मंडल साहब के समक्ष एकाधिक बार अनुरोध किया, पर वह मिलने की स्थिति में नहीं रहीं। बहरहाल, इस दुखद स्थित के लिए लम्बे समय से मेंटल प्रिपरेशन लेने के बावजूद आज जब उनके नहीं रहने की खबर सुना, स्तब्ध रह गया। अनुराधा जी विदुषी ही नहीं, बेहद सौम्य महिला थीं। उनके नहीं रहने पर एक बड़ी शून्यता का अहसास हो रहा है। बहुजन डाइवर्सिटी मिशन की ओर से उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।

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