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सुख-दुख

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश श्रीवास्तव नहीं रहे

सुरेश प्रताप सिंह-

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश श्रीवास्तव का 3 सितम्बर को अस्पताल में निधन हो गया. पिछले कुछ दिनों से वह बीमार थे. उनकी उम्र 72 साल थी. अब उनकी स्मृतियां ही शेष रह गई हैं. हमेशा हंसते रहते थे. मिलनसार स्वभाव के थे.

पिछले कुछ सालों से वह अस्वस्थ थे. बीएचयू पत्रकारिता विभाग के गोल्ड मेडलिस्ट थे. कहीं भी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन सकते थे लेकिन जीवन भर संघर्ष करते रहे.

“दैनिक जागरण” अखबार में वह मेरे साथ काम किए थे. वहां से रिटायर होने के बाद बनारस से प्रकाशित सांध्यकालीन अखबार “काशीवार्ता” से जुड़े रहे लेकिन स्वास्थ्य साथ न देने के कारण वहां भी छोड़ दिए.

1980 के दौर में वह बीएचयू में पढ़ाई-लिखाई करते रहे. कोई भी पत्रकार अपने में एक इतिहास होता है. पत्रकारिता के प्रोफेशन में आने से पहले के उसके संघर्षों को कम लोग समझ पाते हैं. मित्रों के लिए वह “जेपी” थे.

संवेदनशीलता का गुण ही किसी व्यक्ति को पत्रकारिता के प्रोफेशन में आने के लिए प्रेरित करती है. संवेदना इसकी पहली शर्त है. उनकी स्मृतियां ही अब साथ रह गई हैं. उन्हें सादर श्रद्धांजलि..!

साथी जगनारायण नहीं रहे

15 अगस्त को फोटोग्राफर साथी जगनारायण का बनारस में निधन हो गया. इसकी जानकारी मुझे Muchkund Dwivedi की fb पोस्ट से हुई. बीएचयू कैम्पस में स्थित विश्वनाथ मंदिर के पास उनकी फोटोग्राफी की दुकान थी. वहीं मुचकुंद की भी किताब की दुकान है. जब भी मैं बीएचयू कैम्पस में जाता था तो उनसे जरूर मिलता था.

अक्सर Jagnarayan Shri से फोन पर बातें होती थीं. अभी 14 अगस्त को रात्रि में भी उनसे बात हुई थी. स्वास्थ्य के बारे में बात हुई और वे बोले कि मैं ठीक हूं.

वह संघर्षों के साथी थे और हमेशा मदद के लिए तैयार रहते थे. उनसे पहली मुलाकात अस्सी के दशक में बनारस से प्रकाशित “गांडीव” अखबार के दफ्तर में हुई थी. उसके बाद तो फिर मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा.

वह समाजवादी आंदोलन से जुड़े थे. अक्सर आंदोलनों में दिखते थे. इधर, उनकी गतिविधियां कुछ कम हो गई थीं. उम्र का असर था. उनकी उम्र 74+ थी. जिस समय उनके निधन के बारे में मुझे जानकारी मिली तभी 70+ के शहर के बूढ़े पत्रकारों को पराड़कर भवन में बनारस प्रेस क्लब की तरफ से सम्मानित किया जा रहा था.

सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उनका निधन हो गया है, क्योंकि उनसे अक्सर मेरी बातचीत होती थी. साथी जगनारायण नहीं रहे लेकिन उनकी स्मृतियां हमेशा मेरे साथ रहेंगी. उन्हें श्रद्धांजलि..!

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