सुरेश प्रताप सिंह-
पत्रकार जलेश्वर नहीं रहे… 14 मार्च, 2026 को वरिष्ठ पत्रकार जलेश्वर का निधन हो गया. खबर है कि वह किसी समय कल बाथरूम में गिर गए थे. कब गिरे, यह किसी को नहीं पता. शाम को वहां रहने वाले बीएचयू के शोधछात्रों से लोगों को पता चला कि वह बाथरूम में गिर गए थे. उनकी उम्र 74+ थी. वह अकेले महामनापुरी कालोनी में लंका के पास रहते थे.
बनारस में उनका अंतिम संस्कार हरिश्चन्द्र घाट पर हुआ. उनके बड़े भाई महेश्वर के पुत्र निखिल ने मुखाग्नि दी. हरिश्चन्द्र घाट पर उन्हें चाहने वाले लोग बैठे थे.

यह तस्वीर तीन माह पहले मैंने उनके घर पर खींची थी. उन्हें सादर श्रद्धांजलि..!
सौमित्र राय-
बनारस से हृदयविदारक ख़बर आ रही है कि Jaleshwar U जी नहीं रहे। आज छुट्टी के दिन उनसे लंबी बात करने की तमन्ना थी। उनका न होना मेरे यकीन को भी यकीन नहीं दिला पा रहा है।

पहले उनकी वॉल देखी। 21 घंटे पहले भी वे लोगों को मेरी तरह ही सूचनाएं दे रहे थे, जगा रहे थे। लोग जागे हों या नहीं, पर वे सो गए। हमेशा के लिए। भीतर एक वीराना सा महसूस हो रहा है। एक पूरी पीढ़ी चली जा रही है। किसी दिन मैं भी निकल जाऊंगा।
अफ़सोस रहेगा कि भारत में लोगों को जगा नहीं सका। फ़िर भी लड़ाई जारी रहेगी। यकीन है और रहेगा। श्रद्धांजलि जलेश्वर भाई। आपका आखिरी सांस तक मोर्चे पर डटे रहना याद रहेगा। ॐ शांति।
मेरे फेसबुक के शुरुआती दिनों से एक व्यक्ति मुझे बिना मिले ही प्रेरणा देते रहे। घंटों फोन पर बात होती थी… जीवन, विचार और समाज पर। आज जलेश्वर जी नहीं गए हैं। आज एक शिक्षक चला गया है। नुकसान मेरा निजी है… जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। लेकिन मैं दुःख व्यक्त नहीं करूंगा। क्योंकि उनके विचार हमेशा अमर रहेंगे। उनके लिए व्यक्ति से बड़े विचार थे…और मेरे लिए भी। सादर श्रद्धांजलि -अपूर्व भारद्वाज
एस के यादव-
नहीं रहे जलेश्वर जी! अभी-अभी बेहद दुखद सूचना सोशल मीडिया से मिली। उनकी पत्नी और बेटी पहले ही इस दुनिया से रुखसत हो चुके थे। जीवन के अंतिम समय वह बेहद एकाकी जीवन जी रहे थे। तमाम बीमारियों से जूझते हुए वह समाज, देश, दुनिया और मानवता की भलाई के लिए अपने दृढ़ विचारों के साथ अंतिम समय तक डटकर खड़े रहे।
जलेश्वर जी से पहली मुलाकात इलाहाबाद में लीडर रोड स्थित दैनिक आज अखबार के कार्यालय में हुई थी, जब वहां मैंने पत्रकारिता की पहली नौकरी ज्वाइन की थी। शशि शेखर जी स्थानीय संपादक थे, जबकि पूरे डेस्क की जिम्मेदारी जलेश्वर जी के हाथ थी। जिस आज अखबार को हिंदी पत्रकारिता का सर्वश्रेष्ठ स्कूल माना जाता था, उसमें जलेश्वर जी जैसे संपादकीय स्तम्भ अग्रिम पंक्ति में गिने जाएंगे। मुझे अच्छी तरह याद है डेस्क से लेकर रिपोर्टिंग तक के हर सदस्य को उन्होंने जैसे कुम्हार की चाक पर रखकर कच्ची मिट्टी की तरह गढ़ा था और एक पूरी पीढ़ी तैयार की थी।
अपने पत्रकारिता के करियर को आगे बढ़ाने और जीवन को सार्थक बनाने के लिए मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। धीरे-धीरे कब मैं उनके परिवार के सदस्य की तरह हो गया पता ही नहीं चला। जब वह इलाहाबाद आए तो आज अखबार के दफ्तर में ही एक कमरे में ही उनका बिस्तर लगा रहता था, वही उनका घर था। वह अख़बार नवीसी में इतने रमें थे कि अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में सोचने के लिए उनके पास वक्त ही नहीं था। हम मित्रों सहकर्मियों के दबाव में और खोज पड़ताल के फलस्वरुप उन्हें रूबी भाभी के रूप में एक सुंदर, सुसंस्कृत बंगाली जीवन संगिनी मिलीं। और एक सुंदर बेटी जिसे वह प्यार से टूबी कहते थे।
जलेश्वर जी खैनी और चूना रखने के लिए मुझसे फिल्म की डिब्बी लिया करते थे। टूबी उस फिल्म की डिब्बी से खेलती थी और उसने मेरा नाम “डिब्बा काकू” रखा था। शादी के बाद वह जॉर्ज टाउन स्थित बड़े घर में शिफ्ट हो गए थे।
वामपंथी जुड़ाव के कारण उनके घर और दफ्तर में तमाम कामरेड लोगों का आना-जाना लगा रहता था। 1988 में मैंने अमृत प्रभात ज्वाइन किया तो वहां भी जलेश्वर जी का सानिध्य मिलता रहा। पत्रिका अमृत प्रभात की बंदी के दौरान कर्मचारियों के संघर्ष में वह पूरी शिद्दत से कर्मचारियों के साथ डटे रहे।
बनारस से आए जलेश्वर जी पुनः सपरिवार बनारस वापस चले गए थे। भौगोलिक दूरी और व्यावसायिक तथा पारिवारिक व्यस्तता के कारण मिलना जुलना कम हो पाता लेकिन दिल का जुड़ाव गहरा था। कई बार बनारस में मुलाकात भी हुई, पिछले दिनों बेटी के असामयिक निधन के बाद वह पूरी तरह टूट गए थे। उनका पूरा जीवन बेहद संघर्ष में बीता, लेकिन कभी उन्होंने अपनी पीड़ा ज़ाहिर नहीं की। बल्कि इसके उलट वह बेहद जिंदा दिल इंसान थे और सेंस ऑफ़ ह्यूमर उनके भीतर कूट-कूट कर भरा था।
आज उनके निधन की खबर सुनकर ऐसा लगा जैसे दिल का एक टुकड़ा निकल गया हो। उनके साथ बिताए गए सुख दुख के एक एक पल याद आ रहे हैं।
जलेश्वर जी आप हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगे। विनम्र श्रद्धांजलि। ओम शांति
मूल खबर…



