वरिष्ठ पत्रकार जलेश्वर उपाध्याय जी का निधन हो जाने की खबर है। वह बनारस में किराए के मकान में रहते थे, वहीं अंतिम सांस ली। पहले उनकी पत्नी का निधन हुआ फिर इकलौती बिटिया भी चल बसी थी। और अब वह स्वयं परलोक सिधार गए। जलेश्वर जी बनारस अमर उजाला में भड़ास के संस्थापक संपादक यशवंत जी के भी इंचार्ज रहे थे। इक्कीस घंटा पहले उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट फेसबुक पर शेयर की थी, जिसमें सोनम वांगचुक पर एनएसए हटाये जाने संबंधी सूचना थी।
महेंद्र मिश्रा-
जलेश्वर भाई नहीं रहे। इसकी सूचना सुबह शशिकांत भाई की फेसबुक पोस्ट से मिली। एकाएक इस खबर ने भीतर तक परेशान कर दिया। फिर मैंने जलेश्वर भाई के फोन पर कॉल किया तो उधर से एक महिला ने फोन उठाया। शायद वह उनकी मकान मालकिन थीं, जहां जलेश्वर भाई बनारस स्थित इस मकान में किराए पर रहते थे। मेरे पूछने पर कि क्या कुछ लोग पहुंचे हैं तो उन्होंने बताया कि हां, एक दो लोग आए थे। उनके परिवार के लोग जो पटना में रहते हैं। उनको सूचना दी गयी है। भतीजे और परिवार के किसी और सदस्य के आने की बात कही गयी है। आपको बता दें कि जलेश्वर भाई प्रख्यात संस्कृतिकर्मी महेश्वर जी के छोटे भाई थे। वह पेशे से पत्रकार थे।
इलाहाबाद से लेकर लखनऊ और पटना से लेकर बनारस उनके कार्यक्षेत्र रहे। जिसमें वह अमर उजाला से लेकर दैनिक जागरण समेत तमाम अखबारों से जुड़े रहे। फिलहाल इस समय वह बनारस में अकेले रह रहे थे। पत्नी को गए काफी साल हो गए थे। अकेली एक बेटी थी जिसकी तकरीबन 3 साल पहले मौत हो गयी। उसी की मौत के बाद से जलेश्वर भाई बिल्कुल टूट गए थे। वह अकेलापन उन पर भारी पड़ रहा था। तकरीबन चार साल पहले बिहार से इलेक्शन कवरेज से लौटने के दौरान बनारस में उनसे मुलाकात हुई थी। मैं और सिद्धार्थ जी उनके कमरे पर गए थे। बिल्कुल एकाकी जीवन था। कमरे का माहौल उस उदासी और अकेलेपन का गवाह था। यही जलेश्वर भाई को अंदर से मार रहा था।
जलेश्वर भाई की इस दौर में बहुत जरूरत थी। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं उसके पीछे एक कारण है। मेरे आस-पास और परिचितों में और यहां तक कि तमाम बुद्धिजीवी जो फासीवाद की समझ रखते हैं उससे बेहतरीन समझ फासीवाद की जलेश्वर भाई में थी। उनके पास इस क्षेत्र का बेहद गहरा अध्ययन था। शायद ही उससे जुड़ी कोई ऐसी महत्वपूर्ण किताब रही हो जिसे उन्होंने न पढ़ रखा हो। लेकिन हम लोग उसका कोई उपयोग नहीं कर सके। कई बार सोचा और उनसे बात हुई लेकिन चीजें उस दिशा में आगे नहीं बढ़ सकीं। चूंकि वह वीडियो करना नहीं चाहते थे इसलिए उसके जरिये संभव नहीं हो पाया। उनसे मैंने लिखने के लिए कहा, जिससे लेखों के जरिये फासीवाद से जुड़ी चीजों को सामने लाया जा सके। लेकिन वह भी संभव नहीं हो सका।
जलेश्वर भाई का इस तरह से जाना खल गया। उनकी मकान मालकिन ने बताया कि रात में आठ बजे वह बाथरूम में खून से लथपथ पाए गए। उनके अनुमान के मुताबिक शायद वह शाम को चार बजे के आस-पास बाथरूम में गिरे होंगे। लेकिन चूंकि कोई और साथ रहता नहीं था और आस-पास भी कोई नहीं था, इसलिए उन्हें मौके से अस्पताल भी नहीं ले जाया जा सका। उनकी मौत काफी ब्लीडिंग होने से हुई है। विदा जलेश्वर भाई।
ओह बहुत दुखद। अपना भी बहुत पुराना नाता था जलेश्वर जी से। उनके करीबी लोग उन्हें “टुन्ना” कहते थे। BHU में मेरा एडमिशन फॉर्म जमा कराने वही ले गए थे। कई यादें हैं। बीच बीच में बात होती रहती थी। बेटी की मृत्यु से सचमुच टूट गए थे। -अमरेंद्र राय

अमिताभ श्रीवास्तव-
जलेश्वर जी के गुज़र जाने की ख़बर बहुत दुखद है। बेहद धीर, गंभीर व्यक्ति। बहुत पढ़े-लिखे। जनपक्षधर वैचारिक पत्रकारिता के लिए उनके जैसे समर्पित लोग वर्तमान में बहुत कम हैं। फेसबुक पर ही परिचय हुआ, क्लब हाउस पर चर्चाओं में उनके साथ शामिल होने का मौका मिला था।
बहुत तकलीफदेह है इस समाज में, समाज के लिए समर्पित किसी व्यक्ति का यूं अकेलेपन में ही चला जाना। विनम्र श्रद्धांजलि।
उर्मिलेश-
ओह! अभी कुछ देर पहले सोशल मीडिया से बहुत दुखद सूचना मिली. साथी Jaleshwar U नहीं रहे.
बीते कुछ वर्षों से निजी जीवन के विषाद और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से जलेश्वर लगातार जूझते रहते थे. पर उनका इस तरह जाना बहुत अखर रहा है. बिटिया की बहुत दुखद मृत्यु के बाद वह काफी हद तक टूट गये थे. उनके चारों तरफ दुख, उदासी और निराशा का अंधेरा-सा था. बेटी की स्मृतियां और कुछ दोस्तों से फोन की बतकही ही उसका संबल थीं! पर सेहत साथ नहीं दे रही थी.घर में निपट अकेले थे. जैसा साथी पत्रकार महेंद्र मिश्र की पोस्ट से पता चल रहा है कि बनारस स्थित अपने निवास के बाथरूम में गिरने और लंबे समय तक वहां पड़े रहने से उनकी मृत्यु हुई.
जहां तक याद आ रहा, जलेश्वर से मेरी पहली मुलाकात सन् 78 और 79 के बीच कभी हुई रही होगी. हम कुछ मित्र इलाहाबाद से बनारस गये थे. उनके बड़े भाई, लेखक और वामपंथी कार्यकर्ता महेश्वर जी के यहां जलेश्वर से मिले थे.
साथी जलेश्वर से मेरी आखिरी मुलाकात कुछ साल पहले बनारस के लंका से अस्सी की तरफ जाने वाली सड़क के एक चौराहे के पास की एक दुकान पर हुई थी. किसी कार्यक्रम में मैं बनारस गया हुआ था. दोनों ने फोन पर चर्चा के बाद सुबह-सुबह वहीं मिलना तय किया था. मार्निंग वाॅक के बाद मैं खोजते-खोजते जलेश्वर की बताई दुकान तक पहुंच गया..वह कुछ मिनट बाद पहुंचा!
उस दिन पता नहीं क्या मौका था, बनारस के उस हलके में भगवा ध्वज लिये बहुत सारे मोटर साइकिल सवारों का सुबह-सुबह जुलूस भी निकला था. उस दिन हम दोनों के बीच बदलते बनारस की भी चर्चा हुई थी!
संभवत: उस दुकान की मालकिन एक बूढी औरत थी. हमने वहां कुछ साथ-साथ खाया भी. तब से हम फिर कभी नहीं मिल सके. यदा-कदा फोन पर बातचीत होती थी. उसकी फेसबुक पोस्ट जब भी दिखती मैं जरूर पढ़ता था. उसने अपनी आखिरी पोस्ट में TOI की एक खबर को उद्धृत किया है; जो सोनम वांगचुक की रिहाई के फैसले से सम्बन्धित है. अब उसकी कोई नयी पोस्ट नहीं दिखेगी. पर उसकी आवाज और उसके तेवर की गूंज कभी खत्म नहीं होगी! जब भी उसकी याद आयेगी, उसकी आवाज भी सुनाई देगी!
उसके जीवन का आखिरी दौर बहुत दुख-तकलीफ में बीता. पर निजी दुखों और समाज में निराशाजनक माहौल के बावजूद उसके अंदर युवा दिनों का धारदार और जानदार जलेश्वर कभी मरा नहीं! इसलिए उसके इस तरह चले जाने पर मैं सिर्फ यही कह सकता हूं: साथी जलेश्वर जिंदाबाद!




arun srivastava
March 15, 2026 at 12:41 pm
यूं तो यह सबके साथ होना है पर अपनों का चले जाना अंदर तक हिला कर रख देता है। इलाहाबाद में पत्रकारिता के दौरान अक्सर उनसे मुलाकात होती,हम सामयिक मुद्दों पर बहस और जोरदार बहस होती। वे माले के करीब थे और मैं सीपीएम के। बावजूद इसके उनके अपनत्व में कमी नहीं आती थी। इलाहाबाद छूट जाने के सालों बाद रामशिरोमणि जी के घर उनसे मुलाकात हुई और कई दिनों तक साथ रहना हुआ। वे इलाज के लिए आये थे। इसके बाद सोशल मीडिया पर दुआ सलाम होता। आज उनके निधन का समाचार भी सोशल मीडिया से मिला। श्रद्धांजलि