जनसत्ता के संपादकजी अपना चंडीगढ़ का सरकारी मकान बचाने के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे हैं!

अपन एकदम सही थे। जो सलाह कभी भजनलाल को दी थी, इस पर अगर आज की सरकार भी अमल कर ले तो उसे पत्रकारों और पत्रकारिता की ओर से कभी कोई संकट पैदा नहीं होगा। अपना शुरू से मानना रहा है कि मकान ऐसी चीज है जिसे लेकर कोई भी इंसान कुछ भी कर गुजरने या कितना भी नीचा झुकने के लिए तैयार नजर आता है। उन दिनों भजनलाल पत्रकारों से बहुत परेशान थे। एक बार कहने लगे कि मैंने न जाने कितने पत्रकारों को अपने विवेकाधीन कोटे से प्लाट देकर उन्हें लखपति बनाया पर इन लोगों की आंख में तो सुअर का बाल है मतलब निकलते ही आंखें दिखाने लगते हैं। ऐसे लोगों का क्या क्या किया जाए?

मैंने उन्हें सुझाव दिया कि बेहतर होता कि आप उन्हें प्लाट बांटने की जगह उनके लिए सरकारी फ्लैट बनवाते और उसे उन्हें आवंटित कर देते। जब भी कोई आपके खिलाफ लिखता तो उसे प्यार से बुलाकर समझा देते। मैंने उन्हें एक बड़ी समाचार एजेंसी के मैनेजर का किस्सा सुनाया जो कि मंडी हाउस स्थित पंजाब सरकार के मकान में रहते थे। वे ज्ञानी जैल सिंह के काफी करीब थे। उन्होंने ही उनको दशकों पहले यह मकान आवंटित करवाया था। किराया कोई 70-75 रुपए रहा होगा। पर अगर वे किराया देते तो उन पर रेकेटियर होने का आरोप लग जाता क्योंकि जिस पत्रकार के घर में मीट मुरगा से लेकर सब्जी तक उपहार में आती हो वो पैसे देने या सरकार उससे किराया लेने का दुस्साहस कैसे कर सकती थी?

एक बार उन्होंने प्रकाश सिंह बादल सरकार को अपना निशाना बनाया। मुख्यमंत्री ने उन्हें समझाया। वे नहीं माने तो उन्होंने करीब डेढ़ करोड़ रुपए की रिकवरी का नोटिस भेज दिया। उस मकान का मार्केट रेंट लगाकर यह गणना की गई थी। नोटिस मिलते ही उनकी हवा खराब हो गई और अगले दिन वे उनके दरबार में शामिल होकर माफी मांग आए पर वह सब उन्होंने नितांत एकांत में किया। किसी ने उन्हें माफी मांगते या बादल की चंपूगिरी करते हुए नहीं देखा।

पर अब जो कुछ हो रहा है उसके लिए तो शर्मनाक शब्द कहने में भी शर्म आ जाए। कभी सबकी खबर लेने व देने वाले अखबार के संपादकजी अपना चंडीगढ़ का सरकारी मकान बचाने के लिए जो कुछ कर रहे हैं उसे सुन पढ़कर तो चुल्लू भर पानी में डूब मरने का मन करता है। बाहर से दिल्ली आने वाले तमाम पत्रकार लंबे अरसे तक अपने उस पुराने शहर से लगाव समाप्त नहीं कर पाते हैं जहां से उन्होंने पत्रकारिता शुरू की थी। ठीक वैसे ही जैसे कि एच डी देवगौड़ा व सीएम इब्राहीम प्रधानमंत्री व केबिनेट मंत्री होते हुए भी हर हफ्ते कर्नाटक भागते थे। यही हाल इन संपादक का भी है। दिल्ली में भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय में मान्यता के लिए आवेदन कर रखा है। चंडीगढ़ में अपना मकान किराए पर दिया हुआ है। परिवार पत्नी को मिले उनके दफ्तर के मकान में रहता है। जब कि वे वहां का सरकारी मकान बनाए रखना चाहते हैं।

मकान बनाए रखने के लिए क्या-क्या कर रहे है, यह सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है। कभी संघ से जुड़े नेता का इंटरव्यू लेने के लिए उसके दफ्तर पहुंच जाते हैं। तो कभी अखबार के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार का 6 कालम में इंटरव्यू महज इसलिए छाप देते हैं क्योंकि उनका परिचित राज्यपाल का सलाहकार है। तो कभी गृहमंत्री के करीबी लोगों की चंपूगीरी करते हैं। हाल ही में तो तब हद हो गई जब इसी कड़ी के चलते एक अपराधी छवि वाले नेता का लंबा चौड़ा लेख छाप दिया गया क्योंकि वह सत्ता के गलियारों के काफी करीब है। इससे ज्यादा घटिया काम और क्या हो सकता है कि जिस अखबार में कभी केंद्रीय मंत्री अपने बारे में दो पैरे छपने पर अनुग्रहीत महसूस किया करते थे वहीं आज अपराधिक छवि वाले नेताओं के लेख सिर्फ इसलिए छापे जा रहे हैं ताकि घर बचाया जा सके।

उफ! ये वही पत्रकार है जो कि सरकार के सामने सीना चौड़ा करके कहते हैं कि पत्रकारिता की नैतिकता के मानदंड तैयार करने की जिम्मेदारी हम पर छोड़ दीजिए। हम खुद तय करेंगे कि क्या नैतिक व अनैतिक है। पर जब सरकारी मकान बनाए रखने की बात आती है तो बिना कहे अपना पायजामा खोल कर खड़े हो जाते हैं। कई बार तो लगता है कि मैं बहुत अच्छे समय रिटायर हो गया वरना आज न जाने क्या दिन देखने पड़ते। जो अखबार कभी सर्कुलेशन और धमक में देश का सबसे अग्रणी था आज उसका दोनों ही मानकों पर इतना पतन हो चुका है कि वह नीचे से नंबर वन है। यों अपना मानना है कि सर्कुलेशन और विश्वसनीयता में कोई संबंध नहीं होता है। अक्सर कम प्रसार संख्या वाले अखबारों की भी विश्वसनीयता बड़ी होती है। विश्वसनीयता तो उस हाथी की तरह होती है जो कि पूरे जीवन में दो बच्चे देता है। इसलिए हर हफ्ते हजारों अंडे देने वाली मक्खी से उसकी संख्या के आधार पर तुलना करना उसे नीचा दिखाने जैसा होगा।

यह सब इसलिए लिखना पड़ा कि अभी जनसत्ता से रिटायर हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है। आज भी जनसत्ता पढ़ रहा हूं। यह जानते हुए भी कि उसमें क्या छप रहा है। वह तो जीवन का एक अभिन्न अंग समान है। वह तो भैंस के मरे हुए उस पड़वे की ठठरी की तरह है जिसे चाटे बिना उसके थनों में दूध नहीं उतरता है। यह शायद पूजा पाठ का ही फल है कि जनसत्ता ने पत्रकारिता में दबंगई और निष्पक्ष लेखन की जो दौड़ शुरू की थी वह आज भी जारी है। जब जनसत्ता दौड़ से अलग हुआ तो ‘नया इंडिया’ ने रेस का मौका दे दिया। अपनी किस्मत भी ऐसी रही कि कभी किसी की चंपूगीरी करने के लिए न तो मजबूर किया गया और न ही खुद को दिल्ली प्रेस से लेकर आज तक जहां भी नौकरी की सब के मालिक, पत्रकारों को सिर्फ पत्रकारिता करने के लिए रखते थे। रामनाथ गोयनका ने एक बार किसी इंटरव्यू में कहा था कि मैं संपादक अखबार निकालने के लिए रखता हूं क्योंकि मेरे निजी काम तो मेरे अपने फोन से ही हो जाते हैं। आज उस प्रकाशन समूह में संपादक की इतनी दुर्गति हो चुकी है कि संपादक का अपना काम ही नहीं हो पा रहा है। बेचारा पत्रकारिता क्या खाक करेगा? अच्छा हुआ कि गोयनकाजी नहीं रहे वरना यह सब देखकर वे आत्महत्या कर लेते!

प्रभाष जोशी से लेकर व्यासजी तक ने कभी सरकार से किसी तरह का काम करवाने को नहीं कहा। कभी किसी रिपोर्टर से यह नहीं कहा गया कि हमें खबर लिखते समय किन लोगों का विशेष ध्यान रखना है। हालांकि यही परंपरा बाद में अखबार के साथ डूबने लगी। बाद में संपादक तो मुगलिया शासक हो गए जो कि जबरन खबरों की सुन्नत करवाने पर आमादा नजर आते थे। उनके ईष्ट के खिलाफ कही गई बात उनके रिपोर्टर को काफिर करार कर देती थी।

‘नया इंडिया’ में प्रकाशित विवेक सक्सेना के लेख का सम्पादित अंश.

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