प्रभाकर मणि तिवारी-
जनसत्ता का चंडीगढ़ बनाम कोलकाता संस्करण
जनसत्ता के चंडीगढ़ संस्करण के 25 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित बैठकी का ब्योरा हाल में तस्वीर के साथ देखा तो अपने कोलकाता संस्करण की बदहाली याद आ गई. कोलकाता संस्करण ने नवंबर, 2016 में जब 25 साल पूरे किए तो उसका महज कंकाल ही बचा था. अस्थि-पंजर ढीले हो चुके थे. स्थायी स्टाफ के नाम पर संपादकीय में सिर्फ दो-तीन लोग बचे थे.
मेरे अलावा बाकी दो लोग—मांधाता सिंह और जय नारायण प्रसाद डेस्क पर थे. जय नाराय़ण जी भी रिटायर होने वाले थे. ऐसे में अखबार निकालना और लोकल के दो पन्ने भरना ही आफत था.
रिपोर्टिंग में मेरे अलावा दो अन्य स्ट्रिंगर—रंजीत लुधियानवी और शंकर जालान थे. इसके अलावा डेस्क पर काम करने वाले रामाशीष भी अक्सर दो-एक खबरें लिख कर पेज भरने में मदद करते थे. संपादक के नाम पर कोई नहीं था, शैलेंद्र के रिटायर होने के बाद.
जब रोज का काम करना ही मुश्किल हो तो भला सालगिरह किसे और क्यों याद रहेगा. संस्थान ने कर्मचारियों के लिए याद रखने लायक कुछ किया भी नहीं था. न किसी को प्रमोशन औऱ न ही कोई दूसरी सुविधा. ऐसे में क्या सालगिरह मनाना? वो तो गनीमत थी कि मणिसाना आयोग काफी हील-हुज्जत औऱ कतर-ब्योंत के बाद तीन साल बाद लागू कर दिया गया था. इससे कम से कम आर्थिक पक्ष मजबूत हो गया था.
मैंने अक्तूबर, 1991 में ही जनसत्ता ज्वाइन कर सिलीगुड़ी में पोस्टिंग पाई थी. तब मेरे जिम्मे उत्तर बंगाल के अलावा, सिक्किम, भूटान और पूर्वी नेपाल की रिपोर्टिंग का जिम्मा था. छह साल सिलीगुड़ी और उसके बाद तीन साल गुवाहाटी में गुजारने के बाद साल 2000 में जब कोलकाता आया तो अखबार का पराभव शुरू हो चुका था और राजनीति भी चरम पर पहुंच गई थी. उसके बाद लोगों के अखबार छोड़ कर जाने का जो सिलसिला शुरू हुआ उसने रही-सही कसर भी पूरी कर दी.
कोलकाता में करीब 19 साल से ज्यादा गुजारने के बाद साल 2019 के आखिर में मुझे भी प्रबंधन की दरियादिली के कारण रिटायरमेंट की उम्र (58 साल) से दो साल पहले ही नौकरी छोड़नी पड़ी. वजह–कंपनी यहां से जनसत्ता का तामझाम समेटना चाहती थी और मेरा तबादला अचानक लखनऊ के लिए कर दिया गया. वह भी तब जब उस समय मैं अकेला स्थायी स्टाफ बचा था. इससे मंसूबा समझा जा सकता है.
जनसत्ता सालगिरह पर एक अदद केक के लिए भी तरसता रहा. 10वीं, 20वीं और 25वीं सालगिरह कब गुजर गई, किसी को भनक तक नहीं लगी.


