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जनसत्ता से NDTV तक अजय शर्मा की शख्सियत, जैसे- पर्दे के पीछे गुलजार, बेनेगल

संजय सिन्हा

संजय सिन्हा-

मेरी आज की कहानी के पात्र को आप नहीं जानते। लेकिन ये मेरी नैतिक जिम्मेदारी है कि मैं एनडीटीवी के आउटपुट एडिटर अजय शर्मा पर कुछ लिखूं, खास कर इसलिए कि मैंने एनडीटीवी की ही निधि कुलपति के रिटायर होने पर लिखा था। क्योंकि निधि एंकर थीं, सिर्फ इसलिए नहीं, इसलिए कि मैंने उनके साथ काम किया था, उनसे प्रभावित था।

निधि की कहानी आपने सुनी। आप में बहुत से लोग उन्हें भी नहीं जानते थे। हां, उन्हें पहचानते थे, सिर्फ इसलिए क्योंकि आपने उन्हें ज़ी न्यूज़ और फिर एनडीटीवी पर न्यूज़ पढ़ते देखा था।

आज कहानी उनकी जो कभी कैमरे के सामने नहीं आए। लेकिन आपने जिन निधि कुलपति को न्यूज पढ़ते देखा, सुना मुमकिन है, होंठ निधि के रहे हों, शब्द अजय शर्मा के रहे हों।

अजय शर्मा मेरे साथ (मुझसे पहले से) जनसत्ता में थे। जब मैं जनसत्ता में ट्रेनी उपसंपादक बन कर 1988 में एक्सप्रेस बिल्डिंग में घुसा था, तब अजय शर्मा वहां उप संपादक थे। वो Sanjaya Kumar Singh के समकक्ष रहे होंगे।

खूब लंबे बाल, शानदार कद काठी और बहुत गंभीर। वो कम उम्र के थे, लेकिन उन्हें कोई भी अधिकारी जिम्मेदारी का काम दे देता था, इसलिए कि वो सच में उस काम को जिम्मेदारी से निभाते थे।

वो बिना चीफ सब एडिटर हुए भी पूरी शिफ्ट संभालते थे और कभी उप संपादक बन कर मनोहर नायक, श्रीश चंद मिश्र, अभय कुमार दुबे के अंडर में सब एडिटर हो जाते थे।

काफी समय से मैं उनके संपर्क में नहीं। साल 1999 में जब मैंने ज़ी न्यूज़ ज्वाइन किया उसके बाद से ही। अभी एनडीटीवी के प्रियदर्शन (हमारे जनसत्ता के पूर्व साथी) की वाल पर मुझे अजय शर्मा के रिटायर होने की खबर मिली। मैंने उनकी तस्वीर देखी। बाल छोटे हो गए हैं, लेकिन हैरानी हुई कि सफेद भी हो गए हैं। मतलब बालों ने भी उनकी गंभीरता की भाषा को पढ़ा।

अजय शर्मा मध्य प्रदेश के थे। मैं दिल्ली नौकरी करने मध्य प्रदेश (भोपाल) से गया था। एक स्वाभाविक लगाव था। उनके रिटायर होने की खबर और उनकी तस्वीर देख कर लगा कि नियती चलती रहती है। लगता है कल की बात थी, जब अजय शर्मा दिल्ली अपनी आंखों में ज़िंदगी शुरू करने के सपने लेकर आए थे, अब वो रिटायर हो गए।

मैं हमेशा सोचता था कि एक दिन जब मैं रिटायर होऊंगा तो कैसा लगेगा? पर मैं रिटायर ही नहीं हो पाया। लगता है नियति ने बहुत पहले इस बात की तैयारी कर ली थी कि संजय सिन्हा रिटायर ही नहीं होंगे।

हम लोग टीवी की दुनिया में मजाक में कहते थे कि रिपोर्टर (इनपुट) पति तरह होते हैं, वो बाजार से सामान लाते हैं और पत्नी के हवाले कर देते हैं। डेस्क के लोग (आउटपुट) पत्नी की तरह होते हैं, जो उस सामान से क्या बनाना है, कैसे बनाना है, ये तय करते हैं। पति बाजार से आटा ले आया। पत्नी चाहे तो उसके पराठे बना दे, चाहे पूरी तल दे या फिर गोल-गोल रोटी बना कर परोस दे। लाने वाला आटा लाया था, बनाने वाले ने अपनी मर्जी से उसे रूप दे दिया।

आप जिस एंकर को देख कर अचंभित होते हैं, जिस रिपोर्टर की रिपोर्ट पर तालियां बजाते नहीं अघाते वो असल में एक आउटपुट वाले का कमाल होता है। बिना डेस्क के लिखे सुंदर से सुंदर और काबिल से काबिल एंकर को सीधे न्यूज़ पढ़ने के लिए बिठा दिया जाए तो एक ही दिन में उनकी कलई उतर जाएगी। और रिपोर्टर? अगर डेस्क उनकी रिपोर्ट ठीक करके, अपनी भाषा, अपने ज्ञान, अपने संपादन को उसमें समाहित न करे और सीधे रिपोर्टर की कॉपी को ऑनलाइन चिपका दे तो पता नहीं अगले दिन मालिकों को कितने मुकदमे झेलने पड़ेंगे।

एनडीटीवी खबरों के मामले में लंबे समय तक अपनी निष्पक्ष छवि बनाए रखा तो मुझे लगता है कि अजय शर्मा के नेतृत्व में वो आउटपुट की टीम रही होगी, जिसने उसे एक ब्रांड बनने दिया। ये एनडीटीवी ही था, जिसकी टीआरपी चाहे सबसे कम रही हो, लेकिन उसकी विश्वसनीयता कभी संदिग्ध नहीं थी।

आज की तस्वीर में आप लंबे बाल वाले जिस साथी को देख रहे हैं, वो तस्वीर जनसत्ता न्यूज रूम की है और अजय शर्मा के बहाने मुझे बहुत सी पुरानी यादों ने खुद में समेट लिया।

फोटो में बाएं से बाला सुंदरम गिरि संजय सिन्हा अरिहन जैन खड़े और लंबे बालों में अजय शर्मा

धीरे-धीरे पुराने पत्रकारों की पीढ़ी जा रही है, नए आ रहे हैं। जनसत्ता में प्रभाष जोशी जी के साथ जितने लोगों ने काम किया उनमें थोड़े से प्रभाष जोशी सभी में समा गए हैं।

अजय शर्मा की सुंदर बड़ी-बड़ी लिखावट मुझे याद आई। मुझे याद आया कि वो कैसे मिनटों में सबसे शानदार हेडलाइन लगा दिया करते थे। कुल जमा बात इतनी है कि पर्दे के पीछे के हीरो रहे हैं अजय शर्मा। वैसे ही, जैसे किसी रुपहले पर्दे के पीछे गुलजार छिपे होते हैं, श्याम बेनेगल छिपे होते थे।

नोट- आज की कहानी सिर्फ आपको अपनी यादों से रुबरू कराने की एक कोशिश। तीन दशक में दुनिया बदल जाती है।

स्थान- जनसत्ता न्यूज रूम। तब हम एक ही टेबल पर साथ काम करते थे।

लगता है सिर्फ मुझे पता था कैमरा ऑन है। गिरी जी काम में लगे हैं, अरिहन और अजय शर्मा मस्ती में। तब रील वाले कैमरे होते थे, फोटो में जो आ गया, वही रहेगा। न संपादन, न दुबारा की गुंजाइश। बालों के रंग और प्रकार से पता चलता है कि सिर्फ खबरों का अंदाज नहीं बदला, पूरी पीढ़ी बदल गई है। रंगीन वाली फोटो ताजा है।

मूल खबर…

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