विजय सिंह ठकुराय-
17वीं शताब्दी आते-आते मनुष्यों को फिर भी एक आस थी कि भले ही पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं, पर एकमात्र “ग्रह” तो है, इसी नजरिये हम इंसानों के पास कुछ तो विशिष्ट हैं।
और जब गैलीलियो के टेलिस्कोप का रुख आसमान की ओर हुआ, तो इस गलतफहमी की खुरचने भी उतरने लगीं। जिन आसमानी रौशनियों को हम “देवता” समझ कर पूजते रहे, अपने मूल स्वरूप में वे चट्टान के टुकड़े मात्र थे – ग्रह कहलाने के उतने ही योग्य, जितना पृथ्वी – उबड़-खाबड़ भूमि की रेखाओं से गुहित, श्लाघा की दृष्टि से बेहद कुरूप और नूतन जिज्ञासा की दृष्टि से सुंदर…
चलिये, तब शायद सूर्य ही एकमात्र सितारा है, जिसका सामीप्य हमें प्राप्त हुआ है। पृथ्वी नहीं तो शायद सूर्य ही ब्रह्मांड का केंद्र हो, और हम केंद्र के निकट। खास नहीं तो “लगभग खास” तो हम कहे जा ही सकते हैं।
सूर्य ब्रह्मांड का एकमात्र सितारा नहीं, बल्कि खरबों-खरब अन्य सूर्यों की आभा से जगमगाते ब्रह्मांड की आभा के सामने एक महत्वहीन प्रतीत होता रौशनी पुंज निकला। आकाशगंगा तक के केंद्र में नहीं, बल्कि केंद्र से 26000 प्रकाशवर्ष दूर एक कोने में दुबका हुआ – उपेक्षित – और हमें ब्रह्मांड में केंद्रीय भूमिका उपलब्ध करा पाने में सर्वथा असफल।

हृदय फिर एक बार विदीर्ण हुआ पर श्लाघा ने हार न मानी। हो न हो, कम से कम मनुष्यों को तो ईश्वर ने अपने हाथों से गढ़ा है, अपनी दिव्य प्रतिलिपि के रूप में। मनुष्य ईश्वर का प्रिय पुत्र है – इतना भर ही मानव देह पर गर्व करने को पर्याप्त है।
इस बार नियति ने अहंकार पर सबसे तगड़ा प्रहार किया। मनुष्य ईश्वर की मूर्ति नहीं, बल्कि 60 लाख साल पहले वानरों की शाखा से अलग हुआ एक जीव साबित हुआ। अपने मूल में एक जानवर, जिसके पूर्वज पेड़ों पर कुलांचे भरा करते थे। कैसा वज्रपात हुआ होगा उन हृदयों पर, जो स्वयं को ईश्वर का पुत्र समझ कर स्वयं को प्रकृति के निर्माण का कारण समझते थे पर विज्ञान ने यह साबित किया कि ब्रह्मांड के निर्माण से लेकर तब तक के घटे समय के 99.99% कालखंड में मनुष्य नामक यह जीव धरती पर उपजा ही नहीं था। ब्रह्मांड नामक प्रहसन के अंतिम चरण तक जो मंच पर उतरा ही नहीं, वो अभागा जीव खुद को ब्रह्मांड का केंद्रीय नायक समझ कर जीता रहा? इतना भर संताप कम न था, हाय ये मुआ विज्ञान, काल और आकाश तक इसने सापेक्ष सिद्ध कर दिया। समय की विशिष्टता भी अंततः खंडित हुई।
देखा जाए तो मनुष्य की चेतना किसी बेलगाम घोड़े सी है। इसे जीवित रहने के लिए निरंतर श्लाघाओं का ईंधन चाहिए, ईश्वर के प्रिय पुत्र होने का आश्वासन चाहिए, ब्रह्मांड की महान योजनाओं में केंद्रीय भूमिका का अवलंबन चाहिए। खुद को कुछ “अनोखा” कुछ “अलग” सिद्ध करने के लिए मनुष्य तमाम कौतुक रचता है। एक श्लाघा भंग होती है तो लज्जित होने की बजाय दूसरे स्वांग का रचान कर देता है। कुछ नहीं तो यही मनौतियां मांगता है कि उसकी रचना में और कुछ नहीं तो किसी “एलियन” का ही हाथ सिद्ध हो जावे।
बहरहाल, इतिहास यही सिखाता है कि समय के साथ हर अहंकार का टूटना ही नियम है, जो शेष बचे, वो भी आगे टूटेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, न्यूराल नेटवर्क, वर्चुअल सिमुलेशन और क्लोनिंग तकनीक के भविष्य में “जीवात्मा और पुनर्जन्म” का खारिज होना भी अनिवार्य और प्रतीक्षित है।
एक बात जान लीजिये। जब मनुष्य नहीं था, यह भूमि न थी, आसमान में चमकता यह सूर्य न था – तब भी ब्रह्मांड था। और जब 5 अरब वर्ष पश्चात सूर्य “लाल दानव” का रूप धर कर अपना आकार बढ़ा कर पृथ्वी का भक्षण कर लेगा, उसके बाद भी ब्रह्मांड का अस्तित्व बना रहेगा, आकाशगंगा के तमाम सितारे जगमगाते रहेंगे, डार्क एनर्जी अनंतकाल तक ब्रह्मांड का विस्तार करती रहेगी, जब तक ब्रह्मांड के हर अशेष कण को विखंडित कर ब्रह्मांड को कागज की तरह फाड़ न दे।
ब्रह्मांड के आदि से लेकर अंत तक की किताब में मनुष्य की दास्तान हमेशा एक छोटे पन्ने में सिमटी रहेगी। हम क्यों हैं? किसलिए हैं? कहाँ से आये हैं – ये महान प्रश्न हैं और जानने की चेष्टा सर्वथा उचित है। पर जब तक श्लाघा की गठरी उतार कर भूमि पर न धरी जाएगी, तब तक देह में प्राण क्यों आये – इस परम सत्य से मेल न हो पावेगा। ब्रह्मांड की विराटता में मेरी कोई हैसियत नहीं और उस महान निर्माता के बारे में मैं कुछ भी जानता नहीं – इस तथ्य को लज्जित होने की बजाय विनम्रता से स्वीकार करना ही सत्य की खोज का प्रथम चरण है।
As Carl Sagan Famously Said, And Happy Birthday To Him – “Humility Is The First Step Towards Exploration.”
और जो हाथों में कोई “पवित्र पुस्तक” थामे कोई तुमसे ये कहता हो कि उसने तमाम अज्ञात जान लिए हैं, हर प्रश्न का उत्तर ढूंढ लिया है, सारे रहस्यों को भेद्य लिया है – वह या तो मूर्ख जानो, या लोभी, अथवा निरा धूर्त !!!



