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सच के बजाय झूठ परोसने लगे अखबार!

डॉ. सुभाष गुप्ता

कल शाम न्यूज 24 चैनल पर घूमर पर डांस करते बच्चों पर करणी सेना के लोगों के हमले की खबर देख रहा था। खबर पूरी होते- होते मन खिन्न हो उठा। कल कुछ अखबार पढ़कर भी ऐसा ही हुआ। न्यूज चैनल और अखबार दरअसल हमारी नया जानने की मानसिक जरूरत पूरी करने का एक अहम जरिया हैं। इन्हीं के जरिये हमें ताजातरीन सूचनाएं मिलती हैं, लेकिन अब अखबार से लेकर न्यूज चैनल तक बहुत से ऐसे लोग पहुंच गए हैं, जो या तो काम के इतने दबाव में हैं कि सही और गलत का फैसला करने की स्थिति में ही नहीं बचे हैं। या फिर सही और गलत को निर्णय करना उनकी क्षमता से बाहर है। खबर को सच माना जाता है, लेकिन अब कई बार पूरी खबर पढ़ने या देखने के बाद लगता है कि ये खबर तो सच हो ही नहीं सकती। ये आंशिक सच हो सकती है या फिर निरा झूठ।

डॉ. सुभाष गुप्ता

कल शाम न्यूज 24 चैनल पर घूमर पर डांस करते बच्चों पर करणी सेना के लोगों के हमले की खबर देख रहा था। खबर पूरी होते- होते मन खिन्न हो उठा। कल कुछ अखबार पढ़कर भी ऐसा ही हुआ। न्यूज चैनल और अखबार दरअसल हमारी नया जानने की मानसिक जरूरत पूरी करने का एक अहम जरिया हैं। इन्हीं के जरिये हमें ताजातरीन सूचनाएं मिलती हैं, लेकिन अब अखबार से लेकर न्यूज चैनल तक बहुत से ऐसे लोग पहुंच गए हैं, जो या तो काम के इतने दबाव में हैं कि सही और गलत का फैसला करने की स्थिति में ही नहीं बचे हैं। या फिर सही और गलत को निर्णय करना उनकी क्षमता से बाहर है। खबर को सच माना जाता है, लेकिन अब कई बार पूरी खबर पढ़ने या देखने के बाद लगता है कि ये खबर तो सच हो ही नहीं सकती। ये आंशिक सच हो सकती है या फिर निरा झूठ।

सबसे पहले बात न्यूज 24 चैनल की। आज शाम इस चैनल पर प्रसारित घूमर डांस से नाराज करणी सेना के लोगों के हमले की खबर की बात करता हूं। इस खबर के इंट्रो में बताया गया है कि करणी सेना के लोगों के स्कूल पर हमले में पांच बच्चे घायल हो गये। ये कुछ अटपटा लगा क्योंकि आज सुबह अखबारों में यह खबर आ चुकी थी। अखबारों में छपा था कि स्कूल में एक बच्ची के घूमर पर डांस करने के कुछ देर बाद इन लोगों ने वहां पहुंच कर तोड़फोड़ की। चैनल पर इस खबर के बीच उसी स्कूल के प्रिंसीपल की बाइट भी चल रही थी।

प्रिंसीपल बता रहे थे कि एक बच्चे के चोट आई है। स्कूल में तोड़फोड़ के लिए नाम लेकर करणी सेना को जिम्मेदार ठहराने वाले प्रधानाचार्य ने घायलों की संख्या गलत बताई है या चैनल के रिपोर्टर ने गलत रिपोर्ट कर दिया?  ये सवाल बहुत पीछे छूटता हुआ सा लगता है क्योंकि ये खबर जिस बाइट पर आधारित है, वही बाइट,  खबर के सच से टकरा रही है।

देहरादून में दो कारों की मामूली सी टक्कर के बाद एक युवा इंजीनियर भूपेश की सीने में पेंचकस घोंसकर हत्या कर दी जाती है। 15 जनवरी के अखबारों में यह खबर सुर्खियों में छपी है। अमर उजाला में खबर पढ़कर पता चलता है कि जिस युवक की हत्या हुई है, वह अपने दो दोस्तों के साथ कार से जा रहा था। मामूली टक्कर के बाद झगड़ा हुआ और ट्रांसपोर्टर ने पेंचकस से भूपेश के दिल के पास वार कर दिया गया। इसके बाद भूपेश के साथी उसे तड़पता छोड़कर घटनास्थल से भाग गए।

इसी दिन दैनिक जागरण में इस खबर को दूसरे ढंग से प्रकाशित किया गया है। जागरण में छपा है कि भूपेश के शरीर में कोई हरकत न होते देखकर आरोपी भागने लगा, तो भूपेश के दोस्तों ने उसे पकड़ लिया। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर हमलावर को हिरासत में लिया और भूपेश को अस्पताल पहुंचाया।

जागरण के दूसरे अखबार आईनेक्स्ट में इस खबर के तथ्य कुछ और अलग हैं। आई नेक्स्ट ने छापा है कि अचेत अवस्था में भूपेश को उसके दोस्त रात ही अस्पताल ले गए। फरार होने का प्रयास कर रहे आरोपी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। आई नेक्सट ने लिखा है कि भूपेश ने देहरादून के एक विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की थी, जबकि अमर उजाला, हिंदुस्तान और जागरण ने लिखा है कि भूपेश ने पिथौरागढ़ से इंजीनियरिंग की थी।

एक ही घटना के ये एक दूसरे से विपरीत तथ्य किसी भी तरह सही नहीं हो सकते। प्रमुख अखबारों के दफ्तरों से एक किलोमीटर से भी कम फासले पर यह हत्या हुई है। पाठकों को किस अखबार ने सच परोसा है और किस अखबार ने झूठी और काल्पनिक बातों को सच के मुलम्मे में लपेट का खबर के रूप में परोस दिया ? यह एक ऐसा सवाल है जो दरअसल आज के अखबारों और उनके पत्रकारों की कार्य शैली और कार्य के प्रति ईमानदारी पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

अखबारों के शब्द और शैलियां अलग-अगल हो सकती हैं। खबरों का प्रस्तुतिकरण भी अलग हो सकता है। हैडिंग, इंट्रो और न्यूज की बॉडी अलग हो सकती हैं। तथ्य कम या ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन तथ्य एक दूसरे के विपरीत नहीं हो सकते।

आजकल जिस तरह तथ्य एक दूसरे के उलट नजर आ रहे हैं, यह स्थिति अखबारों पर पाठकों के उस विश्वास के लिए खतरनाक हो सकती है, जिस पर अखबारों का अस्तित्व टिका हुआ है। लोग अखबारों पर भरोसा करना ही छोड़ देंगे, तो पोस्टरों और अखबारों में अन्तर ही कहां बचेगा?

लेखक डॉ. सुभाष गुप्ता 26 वर्ष तक प्रमुख अखबारों और न्यूज चैनलों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद अब एक विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफेसर हैं.

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2 Comments

2 Comments

  1. Vikram Rautela

    January 17, 2018 at 12:33 pm

    Your opinion piece throws light on an issue which is the very foundation of journalism sir. Common people trust news papers like Gita, Bible and Quran. They trust every work that they read in newspapers of their choice every morning. If all newspaper owners do not find a solution to this issue unanimously, journalism will be more be considered a profession that brings out truth and newspapers will be just like any other piece of paper….

  2. shoorveer singh bhandari

    January 19, 2018 at 2:27 pm

    डॉ, सुभाष गुप्ता जी उत्तराखंड मे पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ है उनकी सरपरस्ती मे सैकड़ो पत्रकारों ने पत्रकारिता सीखी है , उनका अनुभव और समझ खबर के इंट्रो से ही पता लग जाता है, डॉ गुप्ता जी के कमेंट को आजकल के पत्रकारों को प्रसाद रूप मे ग्रहण करना चाहिए, अखबार और चैनल मे अब प्रोफेशनल पत्रकार के बजाय विज्ञापन बटोरने वालो का जमघट है, उनसे सची और तथ्यपरक खबर की आस करना भी बेईमानी है

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