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कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-10) : ओडिशा के अख़बार में कनपुरिया उड़ान

महेश शर्मा-

सारी जिंदगी संघर्ष और तनाव में बीतती रही। अखबारी दुनिया बाहर से भली दिखती जरूर थी पर वास्तव में ऐसी है नहीं। कतरब्यौंत तो हर मीडिया हाउस में थी। कहीं कम तो कहीं ज्यादा। दैनिक जागरण एक बेहतरीन ट्रेनिंग सेंटर था (अब पता नहीं)। कहा जाता था कि जागरण में काम करने वाले पत्रकार के पास काम की कमी नहीं रहती है। कुछ हद तक सही भी है।

खैर, एक मीडिया हाउस से उड़ते फड़फड़ाते, हालात के कारण कहीं और के लिए प्रयासरत रहने और मौका मिलते ही दूसरे में प्रवेश पा जाने की छटपटाहट लिए बंदा पहुंचा तो कहां पहुंचा ओडिशा। आगे नाथ न पीछे पगहा। अब इसका अर्थ सांड़ में भी ना लगा लीजिएगा। जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता दीपक मालवीय (इनसे बहुत ही सम्मानजनक मित्रता के रिश्ते हैं) ओडिशा की यात्रा फल गयी। पहला पड़ाव ही भुवनेश्वर होते हुए जगन्नाथ धाम था। दैविक या ईश्वरीय सत्ता का महत्व मन में परिभाषित था पर ईश्वर के स्वरूपों और उनके हजारों मंदिरों पर सवाल जब-तब मन में उठ जाते थे।

घरइतिन के भय से इन्हें पब्लिक डोमेन में नहीं ले जाता था। वह तो प्रातःकालीन ईश्वर वंदन, फिर संध्या वंदन। जितने में व्रत और सनातनी अनुष्ठान होते हैं शायद ही उनसे कोई बचे होंगे। जीवन में पत्रकारिता के जुनून के दौरान भले उन्होंने उपेक्षित महसूस किया होगा पर ऐसा नहीं था। वह हमारे सबसे करीबी इंसान हैं जिनका मैं बहुत सम्मान करता हूं। बाकी परिवार में टुन्न-फुस्स होती रहती है। वह मेरे जीवन में न होती तो शायद कहीं कटोरा लिए किसी फुटपाथ पर बैठा होता। प्रतिभा मेरे ईश्वर का वरदान हैं। पुरी प्रवास और महाप्रभु जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के कई-कई बार दर्शन शायद प्रतिभा की ही प्रेरणा से हो सके थे। चलो आस्था पर चर्चा फिर कभी। फिलहाल तो समाज पर ही चर्चा उचित होगी।

पुरी से सीधे कटक आया। यहां से ओडिशा का सबसे पुराना भाषायी अखबार समाज छपता है। हालांकि इस अखबार की खासियत यह थी कि यह ओडिया भाई बहनों का मीडिया के प्रति आस्था का प्रतीक था। अखबार का पर्याय था। लोग बच्चों से टाइम्स ऑफ इंडिया या अन्य अंग्रेजी अखबार मंगाते थे तो बच्चे विक्रेता के पास जाकर कहते थे कि अंग्रेजी वाला समाज दे दो। किसी भी अखबार की साख, लोकप्रियता उसकी पूंजी होती है। यह पूंजी समाज के पास थी।

कहने को तो सौम्यरंजन पटनायक का संवाद, मनोज नायक का प्रमेय, तथागत सत्पथी का धरित्री, मधु महंति का उडीसा भास्कर, अनुपम भारत और सकाल प्रमुख ओड़िया अखबार प्रकाशित होते हैं पर समाज इन सब पर भारी था। लेकिन रिच कंटेंट के साथ अखबार बिक्री का मैकेनिज्म का अभाव सा दिखा।

कटक के बाराबटी स्टेडियम के निकट ही समाज का दफ्तर था। जैसे ही समाज में प्रवेश किया तो वहां कर्माचिरयों ने बुके देकर स्वागत किया और एक माला थमा दी जिसे समाज संस्थापक संपादक उत्कलमणि पंडित गोपबंधु दास की पीतल की चमकती-दमकती प्रतिमा पर अर्पित करना था। प्रतिमा स्थल पर रखा 24 घंटे प्रज्ज्वलित दीपक आसपास पेड़ पौधे, एक ऐसा सुंगधित माहौल महसूस करा रहा था कि जैसे किसी देवस्थल पर आ गया हूं। माल्यार्पण के बाद एक माला और पकड़ाकर इशारा किया गया कि पद्मभूषण डॉ.राधानाथ रथ की प्रतिमा तक जाइए। श्रृद्धा से नमन करते हुए वहां माल्यार्पण किया। घूमा ही था कि तीसरा माला देकर एक अन्य प्रतिमा की तरफ इशारा किया गया। यह प्रतिमा थी विश्वनाथ दास की। जो उत्तर प्रदेश में राज्यपाल रह चुके थे। समाज के संचालक मंडल में ये भी थे। महान व्यक्तित्व के धनी विश्वनाथ जी ओडिशा के भी राज्यपाल रहे थे।

समाज संचालकों की संस्था लोक सेवक मंडल के महासचिव और समाज के बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट के चेयरमैन दीपक मालवीय का स्वागत सत्कार होता रहा। वह भी माल्पार्पण की परंपरा के बाद अधिकारियों और संपादकों से बातचीत करने लगे थे। संपादक थे गोपाल महापात्रा।

दीपक जी की व्यवस्तता के बीच मैं अकेला यह सोचने लगा कि देश दुनिया में शायद समाज ही ऐसा न्यूज पेपर होगा जिसके परिसर में संपादकों की प्रतिमा लगी है। ये प्रतिमा संपादकीय धर्म की तरफ प्रेरित करते हुए यह संदेश भी देती हैं कि समाज सेवा भी आपका धर्म है। आजकी भाषा में जिसे कॉरपोरेट रिसपांसबिल्टी कहा जाता है, समाज यह कार्य पंडित गोपबंधु दास के जीवनकाल से करता रहा है। ओडिया में समाज अखबार की स्थापना 1919 में हुई थी। यह अखबार गुलामी में जी रहे मजलूमों और समस्त जरूरी सुविधाओं से वंचित दीनहीनों की आवाज था।

समुद्री तूफान, बाढ़ विभीषका से अक्सर रूबरू होने वाला राज्य ओडिशा तब बिहार, पश्चिम बंगाल के साथ ही गिना जाता था। फिरंगी हुकूमत के दौर में अभाव में अखबार निकलाना उत्कलमणि पंडित गोपबंधु दास के बूते की ही बात थी। घर में जवान बेटे का शव रखा हुआ है। सूचना मिलने पर गोपबंधु जी कहते हैं कि मौत से संघर्ष करने वाले भी हमारे ही बेटे हैं। और सेवाकार्य पूरा करने के बाद पुरी स्थित अपने घर जाते हैं। यह उदाहरण किसी को भी प्रेरित करने के लिए पर्याप्त है। वह दूरदर्शी थे। शायद इसीलिए उन्होंने लाला लाजपतराय द्वारा 1921 में स्थापित संस्था लोक सेवक मंडल के नाम समाज की वसीयत कर दी थी और 1927 में परलोक सिधार गए।

संस्था में हिंदी भाषी के साथ ही पद्मभूषण डॉ.राधानाथ रथ जैसे दिग्गज भी थे जिनके हाथों समाज प्रगति पथ पर चल चुका था। इस संस्था में लाला लाजपतराय, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुरर शास्त्री, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन, बलवंत राय मेहता, कृष्णकांत जी जैसे दिग्गजों के कारण और डॉ. राधानाथ रथ के समर्पण के चलते समाज अखबार 106वीं साल में प्रवेश कर रहा है। लेकिन हाल में ही अंदरूनी उथल-पुथल ने झटका दिया। समाज संचालन बोर्ड ने मुझे सलाहकार के रूप में काम करने का मौका दिया।

अमर उजाला से त्यागपत्र देकर मैं ओडिशा आ गया था। वहीं परिसर में गेस्ट हाउस में रुकने का ठिकाना मिल गया और वहीं पर किचन में खाने-पीने की व्यवस्था। सब कुछ ठीक-ठाक पर आजकल प्रबंधतंत्र की चल रही अंदरूनी कलह में एक उंगलीबाज मुझे जबतब तंग किया करते थे। ऊलजलूल के सवाल पूछकर न जाने क्या साबित करना चाहते थे। ये महानुभाव बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने की कहावत चरितार्थ करते हुए लोक सेवक मंडल से जुड़ गए थे। हाल ही में फेसबुक में रोना रोकर इन्होंने बुद्धिमत्ता का उदाहरण दिया है। थोड़ा भटकने लगा था। चलिए मूल विषय में आता हूं।

संपादकीय विभाग के साथ निरंतर बैठकों का दौर चलता रहा। संपादयीक प्लानिंग पर काम किया। 2014 के चुनाव में मैं ओडिशा में ही था। जो कुछ दैनिक जागरण, अमर उजाला, स्वतंत्र भारत, लोक भारती में सीखा था उसी के आधार पर चुनाव कवरेज का प्लान बनाकर लागू किया। कनपुरिया पत्रकार वैसे भी फेल नहीं होते हैं। ओडिशा में विधानसभा के साथ ही लोकसभा के भी चुनाव होते हैं। तो मैंने चुनाव कवरेज के लिए दो विशेष पेज बनावाने का प्लान स्वीकृत करा लिया। ओडिया भाषा टूटी-फूटी बोलने और समझने लगा था। मेरा लिखा ओडिया में अनुवाद हो जाया करता था।

दिल्ली के लाजपत नगर में मूलचंद मेट्रो स्टेशन के सामने विशाल भूभाग में लाजपत भवन बना है पर समाज का दिल्ली में ऑफिस था ही नहीं। यह बात बहुत अखरती थी। जिस अखबार के सरंक्षकों में देश के एक से एक दिग्गज वह आईईएनएस में एक ऑफिस तक नहीं खोल सका। समाज को विस्तार देने का इनके मन में ख्याल ही न आया होगा। तो चुनावी तैयारियों में इंटरनेट का बहुत बड़ा सहारा मिला। चुनाव शुरू होने तक संपादक गोपाल महापात्रा जा चुके थे। सुशांत महंति के नाम की अनुशंसा की तो वह कार्यकारी संपादक बनाए गए। सुशांत मेरे मित्र थे। उनके कारण काम करने की बहुत लिबर्टी थी। संपादकीय नीति के दायरे में रहते हुए निष्पक्ष अखबार निकालने की पूरी कोशिश की जो काफी हद तक सफल भी हुई।

प्रबंध मंडल के प्रियब्रत महंति, संजय मिश्रा, देवब्रत, मलय डे संपादकीय में सुशांत महंति और मैं। एक टीम की तरह काम करने में जुट गयी। नेटवर्किंग मीटिंग में संपादकीय, प्रसार, विज्ञापन और रिकवरी के लोग जाया करते थे। इसके चक्कर में ओडिशा के 28 जिलों में जाने का मौका मिला। ब्लाक और पंचायत स्तर तक पत्रकारों में मिलने के साथ ही राजनीतिक नेतृत्व के लोगों से मिला तो ब्यूरोक्रेट्स से भी रूबरू हुआ। अखबार बढ़ रहा था। इस सामूहिक प्रयास और प्रबंधन का सहयोग का नतीजा यह चार करोड़ की आबादी वाले राज्य में 3.53 लाख प्रसार संख्या पहुंच गयी।

शराब, पान मसाला, अंडर गारमेंट, सेक्स संबंधी दवाओं आदि के विज्ञान छापना वर्जित होने के कारण समाज की हाउसहोल्ड रीडरशिप बढ़ती जा रही है। वहां एक परंपरा यह भी सालों साल से थी कि यदि कोई हस्ती कटक आता था तो उसे पंडित गोपबंधु दास की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने आना ही पड़ता था। उसके समर्थक समाज का महत्व बनाते हुए अतिथि को ले आते थे। पंडित गोपबंधु दास ओडिशा के ऐसे पहले पत्रकार थे जिनकी प्रतिमा पुरी में महाप्रभु जगन्नाथ मंदिर परिसर में लगी जिसका उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था। वही गांधी को ओडिशा लाए थे, उसके बाद गांधी आठ बार ओडिशा आए। समाज परिसर में रहने के कारण मेरी ड्यूटी थी कि उन्हें चाय पर बैठाकर चर्चा करूं। इससे सामाजिक दायरा और ज्ञान दोनों ही बढ़ा। बहरहाल चुनाव कवरेज में हम लोग यानी समाज नंबर वन पर था। लोगों ने सराहा भी। बाकी अखबारों से बेहतर कवरेज था।

राजनाथ सिंह का इंटरव्यू से मिला मुद्दा
उन दिनों (2014 के लोकसभा चुनाव में) राजनाथ सिंह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। हम लोग फुलफार्म काम कर रहे थे। चुनाव कवरेज हो या लेट नाइट कवरेज। मुद्दा आधारित अखबार की छवि बनती जा रही है। पाठकों से बढ़िया फीडबैक मिल रहा था। बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट का उंगलीबाज विघ्न संतोषी अभी भी अपने काम में सक्रिय था। पर क्या फर्क पड़ता। अखबार वही जो पाठक मन भाय। चुनाव अभियान की कमान भले ही नरेंद्र मोदी के हाथ में हो पर बतौर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को चुनावी सभाओं में जाना पड़ता था। उनका ओडिशा आना हुआ। कालाहांडी में उनकी जनसभा थी। उन दिनों प्रदेश अध्यक्ष केवी सिंहदेव हुआ करते थे।

भुवनेश्वर से राजनाथ जी का इंटरव्यू करने को कहा तो उनका कहना था कि कोशिश करते हैं। मेरा मन नहीं माना। कटक से केवी सिंहदेव को फोन किया। कहा, राजनाथ जी को संदेश दे दीजिए कि कानपुर वाले पत्रकार महेश शर्मा आपसे मिलना चाहते हैं। करीब आधा घंटे बाद केवी सिंहदेव का फोन आ गया। उन्होंने बताया कि अध्यक्षजी ने कहा है कि एयरपोर्ट सात बजे तक आ जाइए। समाज के ब्यूरो हेड तपन मिश्रा (अब संपादक) को फोन करके बताया कि राजनाथ जी से मिलने चलना है। हम दोनों लोग समय पर बीजू पटनायक इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंच गए। राजनाथ जी को वहीं से दिल्ली जाना था।

एयरपोर्ट में तत्कालीन भाजपा के प्रांतीय अध्यक्ष बसंत पंडा, धर्मेंद प्रधान (कैबिनेट मंत्री), केवी सिंहदेव, सज्जन शर्मा बुके (पुष्प गुच्छ) लिए खड़े थे। राजनाथ जी से कानपुर के नाते जान पहचान हो गयी थी। भाजपा में तब मुझे तीन नेता अच्छे लगते थे। कल्याण सिंह, कलराज मिश्रा और राजनाथ जी। तीनों नाम से पहचानते थे। एयरपोर्ट पर मुझे देखते ही बोले, शर्माजी ओडिशा में कैसे? उन्हें समाज का सलाहकार के रूप में परिचय दिया। इस बीच ओडिशा की भाजपा इकाई की ओर से आवभगत की रस्म अदायगी हुई। फिर वह मेरी और तपन मिश्रा की ओर मुखातिब होते हैं। चुनावी चर्चा और कानपुर के चुनाव पर बातचीत करने लगे। मुरली मनोहर जोशी के चुनाव का फीडबैक लिया। हमारे कंधे पर हाथ रखे वह वीआईपी लाउंज की तरफ बढ़े। इस बीच तपन मिश्रा का उनसे परिचय कराया।

वीआईपी लाउंज में विस्तार से साक्षात्कार संपन्न हुआ। फोटो जर्नलिस्ट मनोज स्वैं ने ताबड़तोड़ फोटो लिए। उनने खास बात यह कही जिसे आठ कॉलम का बैनर छापा था। वह यह कि केंद्र में सरकार बनीं तो ओडिशा को विशेष दर्जा देंगे। बस यही बैनर न्यूज थी। इस चुनाव में लोकसभा में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली। विधानसभा में 147 सीटों में से 10 सीटें भाजपा के खाते में गिरी।

2014 के चुनाव में बाकी देश के मुकाबले ओडिशा की जनता ने भाजपा को निराश किया। राजनाथ सिंह के बयान के आधार पर ओडिशा को विशेष दर्जा की मांग समय-समय पर उठायी जाती रही। पर नतीजा वही ढाक के तीन पात।

सन 2019 में लोकसभा की सात सीटें भाजपा के खाते में आईं जबकि बीजू जनता दल को 12 व एक कांग्रेस को मिली। विधानसभा में 25 सीटें भाजपा को मिलीं। लेकिन 2024 में जनता की झोली भर दी। कुल 21 में से 20 सीटें भाजपा को दे दी। राज्य में भी सरकार बनवा दी। अब बारी भाजपा की है। देखिए राजनाथ सिंह का ओडिशा को विशेष दर्जा का बयान सरकार अमल में लाती है कि नहीं। हालांकि, बिहार और आंध्र में भी यही पेच फंसा है जिनके बूते मोदी जी की लंगड़ी सरकार टिकी है।

56 इंच की छाती और 56 एकड़ में रैली
ओडिशा प्रवास के दौरान दिल्ली और राजस्थान से कनेक्शन का मौका मिला। इंडिया टुडे और राजस्थान पत्रिका में काम का मौका मिला जिसका भरपूर उपयोग किया। ओडिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रायः मैं ही कवर करता था। बरगढ़ जिला में किसान रैली आयोजित की गयी। भाजपा नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों की आवाजाही होने लगी। दो दिन पहले मैं भी पहुंच गया। लोकल रिपोर्टर को साथ लेकर रैली स्थल पर गया। बहुत बड़ा मैदान दिखा मुझे। किसान रैली में यह भर भी पाएगा इसको लेकर दुविधा सी लगी। राज्य के अध्यक्ष बसंत पंडा और ओडिशा के प्रभारी राष्टीय महामचिव अरुण सिंह से मिला। दावा किया गया कि तीन लाख से ज्यादा लोग आएंगे।

मैंने एक स्टोरी फाइल की कि ’56 एकड़ में रैली के लिए चाहिए 56 इंच की छाती’ लोगों ने स्टोरी लाइक की। लेकिन देखता हूं कि रैली वाले दिन मैदान भर गया। हां एक कोने में कृषि प्रदर्शनी लगायी गयी थी। ताज्जुब वाली बात थी। वहीं संकेत मिलने लगे कि ओडिशा में भाजपा के दिन आना शुरू हो गया है। पीएम भाषण की शुरुआत में जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ पंडित गोपबंधुदास की पावन धरती कहना नहीं भूलते। भाजपा के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने में पश्चिमी ओडिशा का बड़ा हाथ रहा। 2019 के चुनाव में कालाहांडी, सुंदरगढ़, बलंगीर, बरगढ़, संबलपुर, भुवनेश्वर, मयूरभंज लोकसभा सीट भाजपा की झोली में जनता ने डाल दी।

दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।

पिछला भाग…

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