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कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-9) : चढ़ जा बेटा शूली पे भला करेंगे राम

महेश शर्मा-

तुनकमिजाजी वाला स्वभाव निर्णय लेने में दिक्कतें उत्पन्न करता है। कभी मनःस्थिति नहीं बन पाती तो कभी लगता है कि जब सब कुछ सामने वाले पर छोड़ ही दिया है तो काहे को उम्मीदें रखें। जो उसका निर्णय होगा वही उचित होगा और मानने की बाध्यता भी। सच पूछिए तो उन्नाव जिला के थाना बारा सगवर क्षेत्र गांव कांटी से निकलकर यह गुनगुनाते हुए शहर आया मनयी, ‘नयी हवा में उड़ने देखो वन का मोर चला, अपना गांव संभालों मैं तो शहर की ओर चला’ पिता के सपोर्ट से संघर्ष करते हुए बिना गॉड फादर के पत्रकारिता जैसे पेशे में कूद पड़ा। जाहिर है कि इसमें स्थापित होने में काफी संघर्ष करना पड़ा।

जुनून के आगे घुटने टेकने वाले असहनीय दर्द का अनुभव कराने वाली संघर्ष गाथा फिर कभी। अब जब पत्रकारिता में घुसने का मन बना ही लिया है तो फिर वही वाली मिसाल कि चढ़ जा बेटा शूली पर भला करेंगे। राम ने भला किया। प्रमोद तिवारी के गीत की यह पंक्ति याद आ गयी कि ‘यह सोच के दरिया में मैं कूद गया यारों, वो मुझको बचा लेगा माहिर है बचाने में/मैं झूम के गाता हूं कमजर्फ जमाने में इक आग लगा ली है, इक आग बुछाने में।‘ फिलहाल अपनी तो पत्रकारीय जिंदगी कुछ ऐसे ही कटी, कभी इधर से फटी तो कभी उधर से फटी। हिम्मत नहीं हारी। और कोई होता तो चिया के बैठ जाता। कोई दूसरा काम कर लेता।

खैर, लग रहा थोड़ा भटक रहे हैं। चलिए लय पकड़ते हैं। अमर उजाला में दूसरी पारी शुरू करने पहुंच गया। काम के मामले में कभी न कंप्रोमाइज करने वाले प्रताप सोमवंशी से जुड़ गया। हां, याद दिला दें कि प्रतापजी जब इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से बदली पर कानपुर रिपोर्टिंग में आए तब संपादक प्रदीप कुमार ही थे जिनसे टुन्नफुस्स के चलते मैंने एक झटके में अमर उजाला छोड़ने क निर्णय ले लिया था। धीर-गंभीर व्यक्तित्व के धनी प्रताप सोमवंशी मेरे मित्र हो गए। स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि दोस्ती सबसे हो जाती है। जहां पर स्वार्थ नहीं होता है वहां दोस्ती हो जाती है तो लंबे समय कभी-कभी तो आजीवन चलती है। भले ही मुलाकात बहुत कम हो पर जब मिलते हैं खुलकर मिलते हैं। उनके साथ कुछ ऐसा ही रागमाला था। अभी भी मधुर संबंध हैं।

अमर उजाला में दूसरी पारी का अनुभव अच्छा रहा। शशिशेखरजी ने अमर उजाला का टेबलॉयड संस्करण कॉम्पैक्ट कानपुर से छपवाना शुरू कराया। कहा जाने लगा था कि दैनिक जागरण के आई-नेक्स्ट के मुकाबले कॉम्पैक्ट था। पर शशिजी के मस्तिष्क में तो कुछ और ही चल रहा था। आई-नेक्स्ट कहां तथाकथित भद्रलोक का अखबार जिसमें हिंदी और अंग्रेजी दोनों को न केवल हैडिंग बल्कि रनिंग मैटर में भी जगह मिल जाती थी। दैनिक जागरण में चीफ रिपोर्टरी के दौरान आई-नेक्स्ट की कोर मीटिंगों में जाने का अवसर मिलता था।

दरअसल आई-नेक्स्ट की अवधारणा मीडिया बाजार के नये बिजनेस टाईकून दैनिक जागरण के स्वामी मंडल के स्तंभ नरेंद मोहन जी के परलोकवासी होने के बाद ठीक ठाक गति पकड़ने वाले महेंद्र मोहन जी के पुत्र शैलेश जी लेकर आए थे। सो शैलेश जी मीटिंग लेते थे। उनमें शुरू से ही कारपोरेट कल्चर छाप थी। तो अमर उजाला में कॉम्पैक्ट संपादकीय दायित्व प्रताप जी ने मुझे सौंप दिया। परंपरागत हवन-पूजन के बाद अगली भोर को हम लोग पाठकों के बीच मैदान में कूदे। एक रुपये की कीमत वाला कॉम्पैक्ट का पाठकवर्ग आई-नेक्स्ट के पाठक वर्ग से बिल्कुल अलग था। हम निम्न और मध्यम आयवर्ग के लोगों के लिए अखबार निकाल रहे थे। उनकी बातें, उनकी खबरें, उनका दर्द ही हमारा टारगेट ग्रुप था।

नोएडा से आए सर्कुलेशन हेड देबू मिश्रा व उनके सहयोगी तथा कानपुर की सर्कुलेशन की टीम यानी कह लीजिए कि अमर उजाला सर्कुलेशन की पूरी फ्लीट सेंटरों पर जा-जाकर पत्र वितरकों से मिल रही थी। संपादकीय हेड होने के नाते मैं भी खुद को कॉम्पैक्ट का बाजार में पहला दिन देखने मोटर साइकिल से निकल पड़ा। हमारे जुझारू फोटो जर्नलिस्ट संजय लोचन पांडे की बाइक पर पीछे मैं बैठा था। देबू मिश्रा से हम लोग एक निश्चित दूरी बनाकर चल रहे थे। गोविंदनगर, जूही बारादेवी, किदवई नगर होते हम लोग घंटाघर पहुंचे जहां पर सर्कुलेशन वालों का स्वागत करने को पत्र वितरक यूनियन के लोग माला लिए इकट्ठे थे।

हम और संजय थोड़ा दूर जाकर खड़े हो गए। यूनियन लीडर सुरेंद्र यादव की नजर हम दोनों पर पड़ गयी। वह वहीं से जोर से बोले, अरे महेश भइया…यह कहते हुए हमारी तरफ लपके। उनके पीछे-पीछे बाकी यूनियन के साथी। तो देबू मिश्रा और उनकी टीम यह नजारा देखकर भौंचक रह गयी।

खैर, ना नुकुर करते-करते हम दोनों देबू के करीब पहुंच गए। चाय पीने के दौरान देबू मुझसे मुखातिब होते हुए बोले (मुझे सर्कुलेशन का स्टाफ समझ रहे थे) आप किस सेंटर के इंचार्ज हैं। मैंने भी संपादकीय हनक के साथ उन्हें जवाब दिया, ‘जी नहीं, मैं कॉम्पैक्ट एडिटोरियल इंचार्ज हूं। और ये (संजय की तरफ इशारा करते हुए) अमर उजाला के सीनियर फोटो जर्नलिस्ट हैं। ‘देबू बोले, ‘आप लोग सेंटरों पर भी जाते हैं।‘ यह कहते हुए उन्होंने अपनी चाय मेरी तरफ बढ़ाई। उन्हें भी अच्छा लगा और मुझे भी। पहले दिन की बिक्री 17 हजार की रही।

धीरे-धीरे कॉम्पैक्ट ने गति पकड़ ली। कॉम्पैक्ट विशुद्ध कनपुरिया छाप के साथ बाजार में पहुंच रहा था जबकि आई-नेक्स्ट दैनिक जागरण ब्रांड का हिस्सा का लाभ ले रहा था। हम लोग 67 हजार सर्कुलेशन तक पहुंच गए। इस बीच शशिशेखर और प्रताप सोमवंशी हिंदुस्तान ज्वाइन कर चुके थे। हमारे पुराने मित्र दिनेश जुयाल को हिंदुस्तान देहरादून से संपादक बनाकर अमर उजाला कानपुर लाया गया। दरअसल हिंदुस्तान में मृणाल पांडेय की टीम की विदाई शुरू हो चुकी थी। मृणाल जी को प्रसार भारती का चेयरपर्सन बनाय दिया गया। कहा जाता है कि उनकी सोनिया गांधी से मित्रता काम आयी। मैने कुछ लोगों से सुना था कि बड़े मीडिया हाउस में संपादकीय प्रभार के निर्णय में सरकार का भी हस्तक्षेप होता है।

फिर एक दिन न जाने क्या हुआ, यशवंत व्यास ने कुछ कॉरपोरेट ऑफिस में ऐसा पांसा फेंका, मेरी केबिन में जयपुर से रवींद्र झा काबिज हो गए। मैं फिर वही रिपोर्टरों की फौज में शामिल हो गया। सर्कुलेशन बढ़ा, अखबार खबरों के कारण चर्चा में रहा, कॉम्पैक्ट के संपादक देवप्रिय अवस्थी और नवोन्मेषक अतुल जी के साथ नोएडा में बैठकों में भी जाने का अवसर मिला। तो फिर यह परिवर्तन क्यों? दिनेश जुयाल भी न चाहते हुए खामोश थे। वसीम बरेलवी का एक शेर याद आ गया। ‘जमीं की कैसी अदालत हो फिर नहीं चलती, जब कोई फैसला आसमां से उतरता है/जरा सा कतरा कहीं जो उभरता है समंदर के ही लहजे में बात करता है।’ तो मुझे कॉम्पैक्ट से हटाने निर्णय ऊपर से ही हुआ होगा।

दरअसल खबरों में दिलचस्पी और लेखन में उससे भी ज्यादा दिलचस्पी भी मेरे लिए काल ही साबित होती रही। चाहे दैनिक जागरण की चीफ रिपोर्टरी हो या कॉम्पैक्ट का संपादकीय प्रभार। जब तक खुद दो-तीन खबरें न लिख लूं तब तक चैन नहीं आता था। जबकि मूल काम था रिपोर्टरों से काम लेना, समय पर अखबार छोड़ना। इस बीच छह-सात महीने के लिए उन्नाव में काम करने को भेजा गया। मन नहीं लग रहा था। लखनऊ जाने के लिए टिप्पस भिड़ा रहा था पर फिर वही गॉडफादर न होने के संकट में मात खा जाता था।

इस दौरान पुराने साथी श्रीकांत त्रिपाठी के संपर्क में आया। कानपुर देहात के गजनेर के निकट शेरुआ गांव निवासी त्रिपाठी जी नवभारत टाइम्स में विशेष संवाददाता थे। उनकी छवि पूर्व मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी के खासुलखास पत्रकार की थी। पत्रकारिता का चस्का लगा था तो एक दिन फोन करके उनके साउथ एक्सटेंशन पार्ट-2 वाले निवास पर पहुंच गया। एक दिन रुका भी था। वह जब यह कहते थे कि आजकल तो लोग संवाददाता बनने के इतने आतुर हैं कि उन्हें अधिकृत कर दो वह खुद ही हर महीने पैसे पहुंचाते रहेंगे। यह सुनकर मुझे बहुत बुरा लगता था। यह तो किसी को हतोत्साहित करना ही हुआ।

हालांकि लखनऊ में नवभारत टाइम्स के ब्यूरो हेड रहे ब्रह्मदत्त विद्यालंकार जी से भी मिला था पर बात नहीं बनीं। तो त्रिपाठी जी शुक्रवार साप्ताहिक मैगजीन छोड़कर राजस्थान के किन्हीं आरडी शर्मा के कालिंद्री मीडिया कारोबार में पोलिटकल मैगजीन इतवार के संपादक हो गए। उन्होंने मुझे अमर उजाला से बुलाकर दिल्ली में मैगजीन का एसोसिएट एडीटर बना दिया। पारिवारिक दिक्कतों के कारण शर्माजी का मीडिया हाउस नहीं चल पाया। जैसे तैसे रगड़घिस्स करते कराते फिर अमर उजाला जा पहुंचे। अखबार में काम करने का वह आनंद नहीं आया जो पहले आया करता था।

पुरानी स्मृतियां मस्तिष्क पटल पर तैरती रहती थी। काफी कुछ बदला हुआ माहौल था। हरिश्चंद्र सिंह जैसे संपादक और भूपेंद्र दुबे जैसे महाप्रबंधक का साथ मिला। आ तो गया था पर कार्य की मनःस्थिति नहीं बन पा रही थी। निकलने के रास्ते तलाशता रहा। इसी उहापोह के दौरान लाला लाजपतराय की संस्था लोक सेवक मंडल के महासचिव रहे दीपक मालवीय से मेलजोल बढ़ता रहा। मुझसे मित्रता तो थी पर उनके ओडिशा कनेक्शन की बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी। रुचि भी नहीं थी। बेहद शरीफ मालवीय जी ने मुझसे ओडिशा चलने को कहा। उन्होंने कहा कि पुरी में महाप्रभु जगन्नाथ के दर्शन करना। वहां अपना अखबार भी है देखो उसमें क्या कुछ कर सकते हो। लगा कि चलो कोई रास्ता खुलता दिख रहा है।

मेरे मन के भीतर पत्रकारिता का हिरन एक बार फिर कुलांचे मारने लगा। गैर हिंदी भाषी राज्य ओडिशा में कुछ नया करने का अवसर मिलेगा। मालकिन से अनुमति मांगी तो जगन्नाथ के नाम पर वह भी राजी हो गयीं। बहरहाल, एक उत्सव में भागीदारी के लिए दीपक मालवीय के साथ मैं, श्रद्धेय रामकिशोर त्रिपाठी (हम सब उन्हें दादा कहते हैं), नौशाद आलम मंसूरी, राकेश मिश्रा, योगेंद्र जी राजधानी एक्सप्रेस से भुवनेश्वर के लिए प्रस्थान कर गए। भुवनेश्वर प्रेस क्लब में हमारे ठहरने की व्यवस्था की गयी। वहां पर हिंदी का सन्मार्ग, नवभारत, दैनिक जागरण, अंग्रेजी का टेलीग्राफ, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, दि हिंदू, पायनियर, टाइम्स ऑफ इंडिया, ओडिशा पोस्ट और ओडिया का समाज, संवाद, घरित्री, ओडिशा भास्कर, बांग्ला, आनंद बाजार पत्रिका और तेलगू, तमिल भाषा के एक दो अखबार आते थे।

हिंदी, अंग्रेजी के अखबारों की खबरें पढ़ लेता था। ओडिया, बांग्ला, तेलगू भाषा का ज्ञान नहीं है फिर भी उनका ले-आउट काफी संजीदगी से देखता था। खबरों का डिस्प्ले आदि देखता था। ओडिशा के सीमावर्ती राज्यों में पश्चिम बंगाल, आंध्र, तेलंगाना होने के कारण इनकी भाषा वाले अखबार ओडिशा में आते थे। सीमावर्ती राज्यों की आबादी ओडिशा में होने के कारण इन अखबारों की रीडरशिप थी। भुवनेश्वर में कुछ पत्रकारों से मुलाकात हुई। लोग हिंदी में कम सहज थे। बताया गया कि करीब एक लाख से भी कम हिंदी अखबारों का सर्कुलेशन ओडिशा में है। पत्रकारिता की संभावनाएं टटोलने का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ। फिर तो सात साल के करीब वहां रहा जो पत्रकारीय दृटिकोण से काफी उपयोगी साबित हुआ।

दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।

पिछला भाग…

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